Get Updates
Get notified of breaking news, exclusive insights, and must-see stories!

तालिबान के ख़िलाफ़ अफ़ग़ान महिलाओं ने चलाई #DoNotTouchMyClothes की मुहिम

सोशल मीडिया पर इस कैम्पेन की शुरुआत डॉक्टर बहार जलाली ने की है
Dr Bahar Jalali
सोशल मीडिया पर इस कैम्पेन की शुरुआत डॉक्टर बहार जलाली ने की है

महिला छात्राओं के लिए तालिबान के नए और सख़्त ड्रेस कोड के ख़िलाफ़ अफ़ग़ान महिलाओं ने एक ऑनलाइन कैम्पेन शुरू किया है. वे इस कैम्पेन के लिए #DoNotTouchMyClothes और #AfghanistanCulture जैसे हैशटैग चला रही हैं.

अफ़ग़ान महिलाएं सोशल मीडिया पर रंगीन और पारंपरिक परिधानों में अपनी तस्वीरें शेयर कर रही हैं. बीबीसी ने ऐसी ही कुछ महिलाओं से बात की और उनके मुद्दे को समझने की कोशिश की है.

आप गूगल पर 'अफ़ग़ानिस्तान के पारंपरिक परिधान' टाइप कीजिए और आप रंगों से भरे उनके सांस्कृतिक पहनावे को देखकर दंग रह जाएंगे. उनका हरेक लिबास आपको ख़ास लगेगा.

हाथ की कढ़ाई, भारी-भरकम डिज़ाइन, सीने के पास करीने से लगे छोटे-छोटे शीशे जिनमें आप अपना अक्स देख सकते हैं, लंबे घाघरे जो अफ़ग़ानिस्तान के राष्ट्रीय नृत्य अट्टन के लिए फ़िट लगते हैं.

कुछ महिलाएं कढ़ाईदार टोपी भी पहनती हैं. कुछ के स्कार्फ़ भारी भरकम होते हैं. लेकिन ये इस बात पर निर्भर करता है कि पहननेवाली अफ़ग़ानिस्तान के किस इलाके से ताल्लुक़ रखती है.

पिछले 20 सालों से अफ़ग़ान महिलाएं रोज़मर्रा की ज़िंदगी चाहे वो कामकाज की जगह हो या फिर कॉलेज या यूनिवर्सिटी में, ऐसे ही लिबास पहनती रही हैं.

तालिबान ने महिलाओं के काम करने को लेकर अपनी राय दी

'भारत की मदद से चल पड़ी थी ज़िंदगी, अब आगे क्या होगा मालूम नहीं'

काबुल यूनिवर्सिटी में एक तालिबान समर्थक रैली के दौरान अफ़ग़ान महिलाएं, तस्वीर इसी 11 सितंबर की है
EPA
काबुल यूनिवर्सिटी में एक तालिबान समर्थक रैली के दौरान अफ़ग़ान महिलाएं, तस्वीर इसी 11 सितंबर की है

सोशल मीडिया पर कैम्पेन

लेकिन इसी बीच एक अजीब बात भी हुई है. पूरे जिस्म को ढंकने वाले काले रंग की अबाया पहनी महिलाओं ने पिछले हफ़्ते तालिबान के समर्थन में काबुल में एक रैली निकाली.

काबुल में इस रैली में भाग लेने वाली एक महिला ने कहा कि आधुनिक कपड़े पहनने और मेकअप करने वाली अफ़ग़ान महिलाएं देश की मुस्लिम औरतों का प्रतिनिधित्व नहीं करती हैं.

कैमरे के सामने वो ये कह रही थीं कि "हम महिलाओं के लिए ऐसे अधिकार नहीं चाहते हैं जो विदेशी हों और शरिया क़ानून से मेल नहीं खाते हों."

लेकिन इसके बाद दुनिया भर की अफ़ग़ान महिलाओं ने तालिबान को अपना जवाब देने के लिए सोशल मीडिया का सहारा लिया.

अफ़ग़ानिस्तान: महिलाओं पर हिंसा का इस्तेमाल प्रोपेगैंडा के लिए?

अफ़ग़ानिस्तान में बदले हालात पर क्या बोलीं मलाला?

अफ़ग़ानिस्तान में एक अमेरिकन यूनिवर्सिटी में इतिहास की प्रोफ़ेसर रहीं डॉक्टर बहार जलाली के शुरू किए गए सोशल मीडिया कैम्पेन में अन्य अफ़ग़ान महिलाओं ने अपने पारंपरिक परिधानों को सामने लाते हुए #DoNotTouchMyClothes और #AfghanistanCulture जैसे हैशटैग का इस्तेमाल किया.

बहार जलाली कहती हैं कि उन्होंने ये मुहिम इसलिए शुरू की क्योंकि अफ़ग़ानिस्तान की पहचान और उसकी संप्रभुता पर हमला हुआ था.

हरे रंग के अफ़ग़ान लिबास में उन्होंने अपनी तस्वीर शेयर करते हुए दूसरी अफ़ग़ान महिलाओं से 'अफ़ग़ानिस्तान का असली' चेहरा दिखाने की अपील की.

उन्होंने कहा, "मैं दुनिया को ये बताना चाहती थी कि मीडिया में तालिबान समर्थक रैली के दौरान जो तस्वीरें आपने देखीं वो हमारी संस्कृति नहीं है. वो हमारी पहचान नहीं है."

तालिबान का 1996 से 2001 तक अफ़ग़ानिस्तान में कैसा शासन था?

अफ़ग़ानिस्तान को पश्चिमी देशों की मौजूदगी से क्या हासिल हुआ

https://twitter.com/RoxanaBahar1/status/1436845110906478592

पहचान को लेकर मुहिम

इस तालिबान समर्थक रैली में महिलाओं ने जिस तरह के कपड़े पहने थे, उसे देखकर कई लोग चकित रह गए.

पारंपरिक रूप से रंगीन कपड़े पहनने वाले अफ़ग़ानों के लिए पूरे बदन को ढंकने वाले कपड़े एक विदेशी अवधारणा की तरह थे.

तीन सितंबर को महिलाओं ने अपने हक़ और अधिकारों की आवाज़ उठाने के लिए तालिबान के ख़िलाफ़ रैली निकाली थी
EPA
तीन सितंबर को महिलाओं ने अपने हक़ और अधिकारों की आवाज़ उठाने के लिए तालिबान के ख़िलाफ़ रैली निकाली थी

अफ़ग़ानिस्तान के हर इलाके के अपने पारंपरिक परिधान हैं. इतनी विविधता के बावजूद जो बात कॉमन है, वो ये है कि उनमें रंगों, शीशों और एम्ब्रॉयडरी का ख़ूब इस्तेमाल किया जाता है. ये सभी महिलाएं इस बात पर यक़ीन करती हैं कि उनके कपड़े ही उनकी पहचान हैं.

वर्जीनिया में एक मानवाधिकार कार्यकर्ता स्पोज़मे मसीद ने ट्विटर पर लिखा, "ये हमारी असली अफ़ग़ान ड्रेस है. अफ़ग़ान महिलाएं इतने रंगीन और सलीकेदार कपड़े पहनती हैं. काले रंग का बुर्का कभी भी अफ़ग़ानिस्तान का पारंपरिक परिधान नहीं रहा है."

https://twitter.com/spozhmey/status/1437022301069922305

मसीद कहती हैं, "हम सदियों से एक इस्लामिक मुल्क रहे हैं और हमारी नानी-दादी सलीके से अपने पारंपरिक परिधान पहनती रही हैं. वे न तो नीली चदरी पहनती थीं और न ही अरबों का काला बुर्का."

"हमारे पारंपरिक परिधान पांच हज़ार साल की हमारी समृद्ध संस्कृति और इतिहास का प्रतिनिधित्व करती हैं. हर अफ़ग़ान को इस पर गर्व होता है."

अफ़ग़ानिस्तान: तालिबान के डर के साये में जीते अफ़ग़ान लोग

अफ़ग़ानिस्तान में महिलाएं क्यों कर रही हैं आत्महत्या

'चरमपंथी गुट हमारी पहचान नहीं तय कर सकता'

यहां तक कि अफ़ग़ानिस्तान के रूढ़िवादी इलाकों में रहने वाले लोग भी ये कहते हैं कि उन्होंने कभी भी महिलाओं को काले रंग का नक़ाब पहने कभी नहीं देखा था.

37 वर्षीय अफ़ग़ान रिसर्चर लीमा हलीमा अहमद कहती हैं, "मैंने अपनी तस्वीर इसलिए पोस्ट की क्योंकि हम अफ़ग़ान औरते हैं. हमें अपनी संस्कृति पर गर्व है और हमारा मानना है कि कोई चरमपंथी गुट हमारी पहचान नहीं तय कर सकता है. हमारी संस्कृति स्याह नहीं है. ये रंगों से भरी है. इसमें ख़ूबसूरती है. इसमें कला है और इसी में पहचान है."

https://twitter.com/tahmina_aziz/status/1437155213685653506

अफ़ग़ानिस्तान में पिछले 20 साल से काम कर रही लीमा हलीमा अहमद कहती हैं, "महिलाओं के पास एक विकल्प था. मेरी अम्मी लंबा और बड़ा सा नक़ाब पहना करती थीं और कुछ महिलाएं उससे थोड़ा छोटा नक़ाब पहनती थीं. महिलाओं पर कोई ड्रेस कोड थोपा नहीं जाता था."

काबुल में हुई तालिबान समर्थक रैली का ज़िक़्र करते हुए हलीमा बताती हैं, "हम अफ़ग़ान औरतें हैं और हमने ये कभी नहीं देखा कि हमारी महिलाएं पूरी तरह से शरीर को ढंकने वाले कपड़े पहनती हों. प्रदर्शन में आई महिलाओं ने जिस तरह के काले दस्ताने और बुर्के पहन रखे थे, उससे ऐसा लग रहा था कि ये रैली के लिए ख़ास तौर पर सिलवाये गए हैं."

तालिबान के क़ब्ज़े वाले काबुल से कैसे बाहर निकली भारतीय महिला? मिनट दर मिनट की कहानी

अफ़ग़ानिस्तानः मुल्क़ जहां औरत बदन भी ढके और नाम भी छुपाए

https://twitter.com/MalaliBashir/status/1382773687280140295

अफ़ग़ानिस्तान का राष्ट्रीय नृत्य 'अट्टन'

इस सोशल मीडिया कैम्पेन में भाग लेने वाली एक अन्य महिला मलाली बशीर प्राग में पत्रकार हैं. वे ख़ूबसूरत कपड़ों में अफ़ग़ान महिलाओं की पेंटिंग बनाती हैं ताकि दुनिया को अपने मुल्क की ख़ूबसूरती दिखा सकें.

वो बताती हैं, "गांव में कोई काले या नीले रंग का बुर्का नहीं पहना करता था. लोग पारंपरिक अफ़ग़ानी परिधान ही पहनते थे. बुज़ुर्ग औरतें सिर पर स्कार्फ़ बांधा करती थीं जबकि कम उम्र की लड़कियां रंगीन शॉल ओढ़ा करती थीं. औरतें हाथ हिलाकर मर्दों का अभिवादन करती थीं."

"हाल में अफ़ग़ान महिलाओं पर अपने सांस्कृतिक पहनावे को बदलने के लिए दबाव बढ़ा है. उनसे कहा जा रहा है कि वो पूरे कपड़े पहनें ताकि लोग उन्हें देख नहीं सकें. मैंने अपनी बनाई एक पेंटिंग पोस्ट की है जिसमें अफ़ग़ान महिलाएं अपना पारंपरिक परिधान पहनी हुई हैं. पेंटिंग में वे अफ़ग़ानिस्तान का राष्ट्रीय नृत्य 'अट्टन' कर रही हैं."

अफ़ग़ानिस्तान: प्रेज़ेंटर की हत्या से उठे सवाल

अफ़ग़ानिस्तान: बरसती गोलियां, चिल्लाते सैनिक और नन्हे बच्चों के लिए गुहार लगाते लोग

क्या कहना है तालिबान का?

तालिबान का कहना है कि महिलाओं को शरिया क़ानून और स्थानीय परंपराओं के अनुसार पढ़ाई करने और काम करने की इजाज़त होगी. लेकिन इसके साथ ही सख़्त ड्रेस कोड के नियम भी लागू होंगे.

कुछ अफ़ग़ान महिलाओं ने पहले ही इसका ख़्याल रखना शुरू कर दिया है और वे चदरी पहनने लगी हैं. नील रंग के इस लिबास से महिलाओं के सिर और उनकी आंखें ढंकी रहती हैं.

काबुल और दूसरे शहरों में महिलाएं ये चदरी पहने हुए बड़ी संख्या में दिखने लगी हैं.

अफ़ग़ानिस्तान के उच्च शिक्षा मंत्री अब्दुल बाक़ी हक़्क़ानी ने कहा है कि यूनिवर्सिटियों में महिलाओं और पुरुष छात्रों को अलग-अलग बिठाया जाएगा और महिलाओं के लिए नक़ाब पहनना ज़रूरी होगा.

हालांकि उन्होंने ये स्पष्ट नहीं किया है कि उनका मतलब सिर पर बांधे जाने वाले स्कार्फ़ से है या फिर चेहरे को पूरी तरह से ढंकने से.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

More From
Prev
Next
Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+