5 हजार साल पहले दुनिया में प्लेग से हुई थी पहली मौत, खोपड़ी में मिले स्ट्रेन के अजीब सबूत

वैज्ञानिकों को दुनिया का सबसे पुराना प्लेग स्ट्रेन एक इंसानी खोपड़ी से मिला है।

नई दिल्ली, जून 30: कोरोना वायरस पिछले 2 सालों से पूरी दुनिया को परेशान कर रहा है। इन बीच वैज्ञानिकों ने दुनिया में प्लेग से सबसे पहले मरने वाले शख्स का पता लगा लिया है और ये पता चला है उस शख्स की खोपड़ी से। वैज्ञानिकों ने यर्सिनिया पेस्टिस का सबसे पहला स्ट्रेन खोजने में कामयाबी हासिल कर ली है। वैज्ञानिकों ने उस बैक्टीरिया को खोजने में कामयाबी हासिल कर ली है, जो ब्लैक डेथ का कारण बना था, और जिसकी वजह से 14 वीं शताब्दी में एक विनाशकारी बुबोनिक प्लेग महामारी पूरी दुनिया में फैल गई थी।

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    दुनिया में फैली थी विनाशकारी प्लेग महामारी

    दुनिया में फैली थी विनाशकारी प्लेग महामारी

    वैज्ञानिकों के मुताबिक RV 2039 नाम के एक नर शिकारी की खोपड़ी से यर्सिनिया बैक्टीरिया पाया गया है। यह लातविया के रिनुकलन्स इलाके से पाया गया है। जेनेटिक विश्लेषण से पता चला है कि प्लेग का यह प्राचीन स्ट्रेन मध्ययुगीन प्लेग जितना संक्रामक और घातक नहीं था। माना जाता है कि RV 2039 की मृत्यु 3000 ईसा पूर्व में प्लेग फैलने के शुरुआती दिनों में हुई थी। हालांकि, धीरे धीरे प्लेग का ये स्ट्रेन इंसानों के लिए घातक बनता गया और करीब 4 हजार सालों के बाद प्लेग के इस स्ट्रेन ने भीषण रूप अख्तियार कर लिया था। जिसकी वजह से यूरोप और अफ्रीका में ब्लैक डेथ हुई थी। ब्लैक डेथ की वजह से अफ्रीका और यूरोप में भारी संख्या में लोग मारे गये थे।

    यूरोप की आधी आबादी हुई थी शिकार

    यूरोप की आधी आबादी हुई थी शिकार

    वैज्ञानिकों के मुताबिक उस समय यह महामारी बहुत धीमी गति से फैल रही थी और ज्यादा संक्रामक नहीं थी। लेकिन, अगले 4300 सालों में प्लेग महामारी का बैक्टीरिया अपने स्वरूप में परिवर्तन करता गया और फिर ये भयानक जानलेवा हो गया। इस बीमारी की वजह से यूरोप, अफ्रीका और भारत में लाखों लोगों की जान चली गई थी।। कहा जाता है कि 1346 से 1353 के बीच यूरोप की आधी आबादी प्लेग की महामारी का शिकार हो गई। आरवी-2039 का जेनेटिक विश्लेषण जर्मनी के काइल विश्वविद्यालय के पुरातत्वविद् बेन क्रॉस-क्योरा द्वारा किया गया है। उन्होंने कहा कि सबसे ध्यान देने वाली बात ये है कि प्लेग वायरस की उत्पत्ति अब 2,000 साल या उससे भी अधिक समय पहले की जा सकती है। बेन ने कहा कि ऐसा लगता है कि हम अब बैक्टीरिया की उत्पत्ति का पता लगाने के बहुत करीब हैं। वैज्ञानिकों ने कहा कि जब आरवी 2039 शिकारी की मौत हुई, तो उसकी उम्र 20 से 30 साल के बीच रही होगी।

    खोपड़ी से चला प्लेग का पता

    खोपड़ी से चला प्लेग का पता

    वैज्ञानिकों ने प्लेक स्ट्रेन का पता लगाने के लिए सभी चार व्यक्तियों की हड्डियों और दांतों का डीएनए टेस्ट किया और फिर बैक्टीरिया और वायरस को लेकर उनका परीक्षण किया गया। परीक्षण के दौरान उस वक्त वैज्ञानिक काफी आश्चर्यचकित हो गये, जब उन्हें पता चला कि जिस शख्स की खोपड़ी का वो परीक्षण कर रहे हैं, उसके ऊपर वैक्टीरिया का हमला हुआ था। उसके अंदर वैज्ञानिकों को प्लेग का नया स्ट्रेन का निशान मिला है। वैज्ञानिकों का मानना है कि प्लेग महामारी का वो बैक्टीरिया ज्यादा खतरनाक नहीं था, लेकिन उस शख्स की मौत उसी बैक्टीरिया से हो गई थी। वैज्ञानिकों का मानना है कि उस शख्स को चूहों ने काटा होगा, इसी वजह से उसके अंदर प्लेक का बैक्टीरिया गया होगा और वो इन्फेक्शन का शिकार हो गया होगा। वैज्ञानिकों ने अंदाजा लगाया है कि संक्रमण फैलने के एक या दो दिनों के बाद ही उसकी मौत हो गई होगी।

    7 हजार साल पहले स्ट्रेन की उत्पत्ति

    7 हजार साल पहले स्ट्रेन की उत्पत्ति

    रिसर्चर्स का मानना है कि प्लेग महामारी के इस स्ट्रेन की उत्पत्ति करीब 7 हजार साल पहले हुई होगी, जब सेन्ट्रल यूरोप में खेती का काम शुरू हो चुका था। वैज्ञानिकों का मानना है कि खेती-बारी के साथ ही धीरे धीरे इंसानों का जानवरों से संपर्क होना शुरू हो गया होगा और चूहों का दखल इंसानी जिंदगी में काफी बढ़ने लगा होगा। वैज्ञानिकों का मानना है कि चूहों की वजब से शुरूआती संक्रमण इंसानों में तेजी से नहीं फैला होगा। हालांकि, धीरे धीरे इस स्ट्रेन ने इंसानों के शरीर को नुकसान पहुंचाना शुरू कर दिया होगा। वहीं कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि ब्लैक सी के पास सबसे पहले ये स्ट्रेन फैला था, जिसमें करीब 10 हजार से ज्यादा लोगों की मौत हो गई थी। लेकिन, वैज्ञानिक इस बात पर पूरी तरह से सहमत हैं कि करीब 5 हजार साल पहले प्लेग का स्ट्रेन इंसानों के लिए जानलेवा बनना शुरू हो चुका था, मगर ये बैक्टीरिया करीब 7 हजार सालों से मौजूद है।

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