टेंशन वाली खबर: इस वजह से 5 करोड़ टन पानी वायुमंडल में पहुंचा, बढ़ाएगा पृथ्वी का तापमान

नई दिल्ली: ग्लोबल वार्मिंग की वजह से पूरी दुनिया परेशान है। साथ ही इसका जलवायु पर भी बहुत बुरा असर पड़ रहा। वहीं दूसरी ओर इस साल की शुरुआत में दक्षिण प्रशांत महासागर में स्थित देश टोंगा में एक ज्वालामुखी विस्फोट हुआ। जिसका असर अब भी पृथ्वी पर पड़ रहा है। वैज्ञानिकों ने जब इसको लेकर शोध किया तो उनके सामने कई हैरान कर देने वाली जानकारियां सामने आईं। जिसकी रिपोर्ट अब सार्वजनिक की गई है।

 नमी भी बढ़ा दी

नमी भी बढ़ा दी

लाइव साइंस की रिपोर्ट के मुताबिक 14 जनवरी 2022 को टोंगा में पानी के अंदर ज्वालामुखी विस्फोट हुआ। इसकी वजह से भारी मात्रा में राख और गैस वायुमंडल में फैल गई। इसके अलावा 50 मिलियन टन (5 करोड़ टन) पानी भी वाष्प बनकर वायुमंडल में फैल गया। इस बड़े पैमाने पर हुए वाष्प इंजेक्शन से वैश्विक समताप मंडल में नमी की मात्रा में लगभग 5% की वृद्धि हुई। इस घटना को लेकर ही वैज्ञानिक परेशान हैं।

दो दिन में चरम पर पहुंचा ज्वालामुखी

दो दिन में चरम पर पहुंचा ज्वालामुखी

नेशनल ओशनिक एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन के मुताबिक 13 जनवरी 2022 को ज्वालामुखी विस्फोट शुरू हुआ था, जो 2 दिन बाद अपने चरम पर पहुंच गया। इसका असर 260 किलोमीटर तक नजर आया, जबकि इसकी भाप, राख और गैस 20 से ज्यादा ऊपर तक हवा में उड़े। वैज्ञानिकों का मानना है कि ज्वालामुखी की वजह से जो पानी हवा में गया, वो पृथ्वी को गर्म कर रहा है।

सौर विकिरण को फिल्टर नहीं करने दे रहा पानी

सौर विकिरण को फिल्टर नहीं करने दे रहा पानी

दरअसल बड़े ज्वालामुखी विस्फोट आमतौर पर सल्फर डाइऑक्साइड को पृथ्वी के वायुमंडल की ऊपरी परतों में धकेल कर पृथ्वी को ठंडा कर देते हैं, जो एक तरह से सौर विकिरण को फिल्टर करता है, लेकिन टोंगा ज्वालामुखी के मामले में सारा मामला उल्टा हो गया। इस ज्वालामुखी ने 5 करोड़ टन पानी वायुमंडल में भेज दिया, जो पृथ्वी की सतह से लगभग 50 किलोमीटर ऊपर 6 से 20 किलोमीटर के दायरे में फैला हुआ है। वायुमंडलीय जलवाष्प, सौर विकिरण को अवशोषित करता है और इसे गर्मी के रूप में दोबारा उत्सर्जित करता है, ऐसे में इस जलवाष्प से पृथ्वी के गर्म होने की आशंका है।

1991 में तापमान हुआ था कम

1991 में तापमान हुआ था कम

वैज्ञानिकों के मुताबिक 1991 में जब फिलीपींस में माउंट पिनातुबो ज्वालामुखी फटा था, तो उसकी वजह से तापमान करीब 0.9 डिग्री फारेनहाइट कम हो गया। इसका प्रभाव करीब एक साल तक था। टोंगा ने करीब 441,000 टन सल्फर डाइऑक्साइड का उत्सर्जन किया, जो 1991 के विस्फोट की तुलना में केवल 2 प्रतिशत ही है। इसके अलावा पानी के नीचे फटने से टोंगा ने काफी ज्यादा पानी को वायुमंडल में पहुंचा दिया, वर्ना इसका सल्फर डाइऑक्साइड भी तापमान को कम करने में सहयोग करता।

समुद्र के अंदर से निकला द्वीप

समुद्र के अंदर से निकला द्वीप

वहीं हाल ही में नासा को पता चला कि ज्वालामुखी की वजह से टोंगा में एक द्वीप भी समुद्र के अंदर से बाहर आ गया। 13 सितंबर को नासा के शोधकर्ताओं ने इस द्वीप का इलाका 4000 स्क्वायर मीटर यानि लगभग 1 एकड़ बताया था और इसकी ऊंचाई समुद्र तल से 10 मीटर थी, लेकिन 20 सितंबर को शोधकर्ताओं ने जानकारी दी कि इस द्वीप का आकार बढ़कार 24000 स्क्वायर मीटर यानी लगभग 6 एकड़ का हो गया है। वैज्ञानिकों ने ये भी अनुमान लगाया कि ये द्वीप ज्यादा समय तक कायम नहीं रहेगा।

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