आखिर कैसे पहुंचे 1.5 डिग्री सेल्सियस जलवायु लक्ष्य तक
वॉशिंगटन, 04 अक्टूबर। धरती इस समय 1.1 डिग्री सेल्सियस की रफ्तार से गर्म हो रही है. 1.5 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचने के लिए हमें कार्बन प्रदूषण को 2030 तक घटा कर मौजूदा स्तर के आधे तक और 2050 तक शून्य तक लाना होगा. लेकिन यह होगा कैसे? पेरिस समझौते के इस बेहद जरूरी लक्ष्य का हमारी अर्थव्यवस्थाओं और हमारी रोजमर्रा की जिंदगी के लिए क्या मतलब है?
फ्रांसीसी थिंक टैंक आईडीडीआरआई में कम उत्सर्जन विकास के विशेषज्ञ हेनरी वाइसमैन कहते हैं कि इसके लिए हमने "सब कुछ" बदलना होगा. वाइसमैन संयुक्त राष्ट्र की 2018 की उस रिपोर्ट के मुख्य लेखक भी हैं जिसने पहली बार 1.5 डिग्री सेल्सियस के लक्ष्य को हासिल करने का रास्ता बताया था.
सब कुछ एक साथ
वो कहते हैं, "और यह आमूलचूल बदलाव होगा. हमें ऊर्जा के उत्पादन और खपत के अपने तरीके, महत्वपूर्ण औद्योगिक उत्पादों को बनाने के तरीके, एक जगह से दूसरी जगह जाने के तरीके, खुद को गर्म रखने के तरीके और खाने के तरीके को पूरी तरह तरह से बदलना होगा."

इतने बड़े लक्ष्य को देखते हुए मुमकिन है कि एक बार में एक क्षेत्र पर काम करने का ख्याल आए, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि हमारे पास उसके लिए पर्याप्त समय बचा नहीं है. डेनमार्क के तकनीकी विश्वविद्यालय में शोधकर्ता ऐन ओलहॉफ कहती हैं, "अगर हमें 1.5 डिग्री सेल्सियस वाले रास्ते पर आगे बढ़ना है तो हमें सब कुछ तुरंत और एक साथ करने की जरूरत है."
ओलहॉफ इस लक्ष्य को हासिल करने में हमारी तरक्की पर नजर रखने वाली संयुक्त राष्ट्र की "उत्सर्जन गैप" रिपोर्ट के लेखकों में से एक हैं. जानकार इस बात पर सहमत हैं कि अगर ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को 2030 तक 60 से 25 अरब टन तक लाना है तो ऊर्जा, कृषि, निर्माण, यातायात, उद्योग और फॉरेस्ट्री वो छह क्षेत्र हैं जिन पर ध्यान देने की जरूरत है.
ऊर्जा उत्पादन अकेले 70 प्रतिशत उत्सर्जन का जिम्मेदार है और माना जाता है कि इसी क्षेत्र में सबसे ज्यादा तरक्की की उम्मीद की जा सकती है. इसमें भी बिजली उत्पादन का विशेष स्थान है क्योंकि आधा उत्सर्जन इसी क्षेत्र में होता है.
राजनीतिक इच्छाशक्ति
ओलहॉफ कहती हैं, "अगर आपको एक क्षेत्र को चुनना है तो वो ऊर्जा है, ना सिर्फ इसलिए क्योंकि इस क्षेत्र में उत्सर्जन को कम करने की संभावना सबसे ज्यादा है बल्कि इसलिए भी क्योंकि इसमें कुछ ऐसी उपलब्धियां हैं जो आसानी से हासिल की जा सकती हैं."

उन्होंने यह भी कहा, "हमें यह करने के लिए जिस तकनीक की जरूरत है वो हमारे पास है, मुख्य रूप से यह राजनीतिक इच्छाशक्ति का मामला है." जिस जीवाश्म ईंधन पर सबसे ज्यादा ध्यान केंद्रित किया जा रहा है और जो सबसे ज्यादा गंदा भी है वो है कोयला.
क्लाइमेट एनालिटिक्स एनजीओ में उत्सर्जन कम करने की योजनाओं पर काम करने वाली टीम के प्रमुख मैथ्यू गिड्डेन मानते हैं, "कोयले से चलने वाले ऊर्जा संयंत्र आज कुल बिजली आपूर्ति के 40 प्रतिशत हिस्से के लिए जिम्मेदार हैं और इन्हें दो दशकों के अंदर खत्म करने की जरूरत है."
उन्होंने कहा कि अमीर देशों को अग्रणी भूमिका निभाने की जरूरत है और उन सबके कार्बन उगलने वाले कोयल संयंत्रों को 2030 तक बंद कर देना चाहिए. यूरोपीय संघ में इसका मतलब होगा अगले 10 सालों तक हर दो हफ्तों पर तीन संयंत्रों को बंद करना.
सौर और वायु ऊर्जा पर ध्यान
अमेरिका में इसका मतलब होगा हर 14 दिनों पर एक संयंत्र को बंद करना. लेकिन दुनिया में कोयले की जितनी कुल खपत होती है उसमें से चीन अकेले आधा कोयला जलाता है, इसलिए अगर चीन इस राह पर आगे नहीं बढ़ेगा तो 1.5 डिग्री सेल्सियस का लक्ष्य हासिल नहीं हो पाएगा.

गिड्डेन कहते हैं, "अगर आप कोयले से चलने वाले चीन के 1,082 संयंत्रों को पेरिस समझौते के हिसाब से बंद करना शुरू करेंगे तो हर हफ्ते एक संयंत्र बंद करना पड़ेगा" और ऐसा 2040 तक करते रहना पड़ेगा. यह समय सीमा अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आईईए) ने कार्बन न्यूट्रल बनने के लिए वैश्विक ऊर्जा क्षेत्र के लिए तय की थी.
इस लक्ष्य के लिए सौर और वायु ऊर्जा के उत्पादन की क्षमता को भी 2030 तक चार गुना बढ़ाने की जरूरत है. लेकिन सिर्फ बिजली को कार्बन न्यूट्रल बनाना पर्याप्त नहीं है. हर क्षेत्र को अपने उत्सर्जन को खत्म करना होगा. यातायात में आईईए ने कहा है कि 2035 के बाद इंटरनल कंबशन इंजन नहीं बेचे जाने चाहिए.
कृषि में उत्पादन के ऐसे तरीकों पर ध्यान केंद्रित करने के लिए कहा जा रहा है जिनमें नाइट्रस ऑक्साइड (एन20) का उत्सर्जन ना होता हो. एन20 कार्बोन डाइऑक्साइड और मीथेन के बाद तीसरी सबसे ज्यादा जरूरी ग्रीनहाउस गैस है.
रोजमर्रा के बदलाव
उत्सर्जन कम करने के लिए गोमांस के उत्पादन और खपत को भी कम करने की जरूरत है क्योंकि यह सबसे ज्यादा कार्बन उत्सर्जन करने वाला मांस है. इसके अलावा आवासीय और व्यावसायिक इमारतों के नवीनीकरण की जरूरत है क्योंकि या यातायात जितना ही उत्सर्जन करती हैं.

सीमेंट और इस्पात जैसे भारी कार्बन वाले उद्योगों के लिए उत्पादन के नए तरीके ईजाद करने की भी जरूरत है. अंत में, हमें पृथ्वी के ट्रॉपिकल वर्षा वनों के विनाश को भी रोकना होगा, क्योंकि वो भारी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड को सोख लेते हैं.
इम्पीरियल कॉलेज लंदन के ग्रंथम इंस्टीट्यूट में शोध की निदेशक जोरि रोगेल्ज ने बताया, "यह विकल्पों का सवाल है. ऐसा कोई रास्ता नहीं हैं जहां हम किसी विकल्प को चुनते ना हों."
ना सिर्फ आम लोगों द्वारा चुने गए विकल्पों पर ध्यान दिए जाने की जरूरत है, बल्कि परमाणु ऊर्जा, बायो ऊर्जा की भूमिका से जुड़े विकल्पों को भी चुनने की जरूरत है. रोगेल्ज का कहना है कि सबसे ज्यादा हमें "दूरदर्शिता वाले नेतृत्व की जरूरत है. सरकार बहुत जरूरी हैं."
सीके/एए (एएफपी)
Source: DW
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