अपने ही तो नहीं बो रहे अपने ही तो नहीं बो रहे येदियुरप्पा की राह में कांटा?की राह में कांटा?

जब ऐसा लगने लगा था कि कर्नाटक में बीजेपी के कद्दावर नेता बीएस येदियुरप्पा के सितारे थोड़े कमज़ोर पड़ रहे हैं तभी उन्होंने एक एलान कर पार्टी में सबको हैरान कर दिया.

येदियुरप्पा ने मैसूर के नंजनगुड में एक रैली के दौरान अचानक ही एलान कर दिया कि उनके बेटे विजेंद्र वरुणा से चुनाव नहीं लड़ेंगे बल्कि उनकी जगह पार्टी के किसी आम सदस्य को मौका दिया जाएगा.

वरुणा सियासी रूप से एक अहम सीट है क्योंकि 12 मई को होने वाले विधानसभा चुनाव में येदियुरप्पा के बेटे विजेंद्र मौजूदा मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के बेटे डॉ. यतीन्द्र से मुकाबला करने जा रहे थे.

सिद्धारमैया ने ये सीट ख़ास तौर पर अपने बेटे के लिए खाली की थी और ख़ुद पड़ोस के चामुंडेश्वरी और बादामी से चुनावी मैदान में उतरे हैं.

ऐन मौके पर मुश्किल भरा फ़ैसला

ऐसे में येदियुरप्पा के अपने बेटे को वरुणा से हटाने का फ़ैसला मुश्किल वक़्त में आया है. नामांकन भरने की आख़िरी तारीख़ को उन्होंने अचानक ही ये एलान कर दिया.

नरेंद्र मोदी
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हालांकि आनन-फ़ानन में लिए गए इस फ़ैसले से एक बात तो साफ़ है कि 2013 की हार के बाद सत्ता में आने की क़ोशिश कर रही पार्टी के भीतर सब ठीक नहीं है.

ये फ़ैसला उस घड़ी में सुनाया गया जब विजेंद्र नामांकन दाख़िल करने जा रहे थे और ख़ुशी के इस मौके पर उनके समर्थकों का हुजूम उनके साथ जाने वाला था.

इस एलान के बाद तो विजेंद्र के समर्थक गुस्से में बेकाबू हो गए और पुलिस को उन्हें तितर-बितर करने के लिए लाठी चार्ज का सहारा लेना पड़ा.

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येदियुरप्पा ने रैली में कहा कि ये सच है कि उन्होंने विजेंद्र को पिछले 20 दिनों से वरुणा में काम करने को कहा था ताकि वो लोगों की नब्ज़ पकड़ सकें.

येदियुरप्पा ने अपने भाषण में कहा, "आप लोगों ने विजेंद्र को इतना प्यार दिया कि वो यहां से पर्चा भरने जा रहे थे. लेकिन अब जो मैं कहने जा रहा हूं कृपया उसे ध्यान से सुनिए. विजेंद्र वरुणा से चुनाव नहीं लड़ेंगे. हालांकि वो यहां रहेंगे और पार्टी उम्मीदवारों के लिए काम करेंगे. अब वरुणा से पार्टी का एक आम कार्यकर्ता चुनाव लड़ेगा."

एक फ़ोन कॉल और सब बदल गया

कर्नाटक बीजेपी के एक नेता ने नाम ज़ाहिर न होने की शर्त पर बताया, "ये सच है कि येदियुरप्पा को दिल्ली से एक फ़ोन आया था. उनसे पूछा गया कि विजेंद्र पर्चा भरने की तैयारी में क्यों हैं जबकि उनके नाम पर अभी अंतिम मुहर ही नहीं लगी है."

वो मौके, जब बीजेपी ने खुद को ही दी अड़ंगी

बीजेपी ने उम्मीदवारों के नाम की चौथी लिस्ट तो जारी कर दी, लेकिन इसमें वरुणा और बादामी समेत चार जगहों से उम्मीदवारों के नाम रोक लिए गए थे. लेकिन विजेंद्र का नाम अचानक हटने और फ़ोन आने से येदियुरप्पा बेशक़ ऐसी स्थिति में डाल दिया है जहां वो कुछ कह पाने में असहज नज़र आ रहे हैं.

75 वर्षीय जिस येदियुरप्पा ने 2008 में पार्टी का नेतृत्व करके दक्षिण भारत में बीजेपी के लिए दरवाजे खोले थे आज उनके लिए पार्टी में खुद की स्थित को सहज बनाए रख पाना मुश्किल नज़र आ रहा है.

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एक वक़्त ऐसा था जब येदियुरप्पा जो मर्जी आदेश देते थे और उसका पालन किया जाता था. हालांकि इसके कुछ अपवाद भी हैं.

बीजेपी पर आफ़त

वरिष्ठ पत्रकार कृष्ण प्रसाद कहते हैं, "मैसूर में हाल के दिनों में जो कुछ हुआ है वो बीजेपी के जनमत के लिए किसी आफ़त से कम नहीं है. इसकी कई परतें हैं. इनमें से एक है कर्नाटक जनता पक्ष (जिसे येदियुरप्पा ने बनाया था) और बीजेपी के बीच दुश्मनी.

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प्रसाद आगे बताते हैं, "चुनावी मुहिम की शुरुआत से ही, यानी जब से बीजेपी ने परिवर्तन यात्रा शुरू की थी, येदियुरप्पा ने तुमकुर से उम्मीदवारों की घोषणा कर दी थी और वो सारे उम्मीदवार कर्नाटक जनता पक्ष के थे. इस वजह से भी विरोध हुए. अब ऐसा लगने लगा है कि गुटबाज़ी की ये पूरी कवायद शायद येदियुरप्पा का सियासी कद घटाने के लिए है."

उन्होंने ये भी कहा कि सियासी गलियारों में इस बात की भी चर्चा थी कि संघ और बीजेपी नेताओं ने ही मिलकर ये तय किया था येदियुरप्पा अकेले ही सब तय नहीं कर सकते.

ऐसी ख़बरें भी हैं कि पार्टी आलाकमान ने ख़ुद विजेंद्र को वरुणा से हटाने का फ़ैसला किया क्योंकि उनके वरुणा से जीतने की उम्मीदें कम थीं.

फ़िलहाल लग यही रहा है कि पार्टी आलाकमान और येदियुरप्पा के बीच और पार्टी के विभिन्न धड़ों के बीच सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है. देखना होगा कि समय की बिसात पर राजनीति क्या चाल चलती है और येदुयुरप्पा उसमें क्या भूमिका निभाते हैं.

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