IAF Airstrip Scam: मां-बेटे ने मिलकर कैसे बेच दी एयरफोर्स की जमीन? 28 साल बाद हुआ एयरस्ट्रिप स्कैम का खुलासा
IAF Airstrip Scam: आपने अब तक बहुत सारे स्कैम के बारे में सूना होगा लेकिन हाल में जो स्कैम सामने आया है उसके बारे में जानकार आप भी सिर पकड़ लेंगे। दूसरे विश्व युद्ध के दौरान बनाई गई एक एयरस्ट्रिप, जो आजादी के बाद भी तीन बड़े युद्धों में भारतीय वायुसेना की रणनीतिक ताकत बनी रही, वह जमीन एक मां-बेटे की जोड़ी ने बेच दी!
ऐसा कैसे हुआ अब यह सवाल पंजाब में बड़ा राजनीतिक और प्रशासनिक मुद्दा बन चुका है। 1945 में ब्रिटिश सरकार द्वारा अधिग्रहित यह जमीन दशकों तक भारतीय वायुसेना के नियंत्रण में रही, लेकिन 1997 में इसे फर्जीवाड़े से बेच डाला गया। मामला 28 साल तक दबा रहा, लेकिन अब पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट के दखल के बाद इस पर कार्रवाई शुरू हुई है।

आरोप है कि इस घोटाले में कुछ राजस्व अधिकारी भी शामिल थे। यह जमीन पाकिस्तान सीमा के करीब है और सुरक्षा के लिहाज से बेहद संवेदनशील मानी जाती है। अब इस जमीन को रक्षा मंत्रालय को वापस सौंप दिया गया है और जांच के दायरे में कई बड़े नाम हैं।
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28 साल बाद दर्ज हुआ केस
इस मामले में अब 28 साल बाद FIR दर्ज हुई है। आरोपियों के नाम हैं उषा अंसल और उनका बेटा नवीन चंद। दोनों ने कथित तौर पर फर्जी दस्तावेजों के जरिए यह जमीन बेच दी। अब पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के आदेश के बाद पंजाब विजिलेंस ब्यूरो ने जांच शुरू की है।
किन धाराओं में मामला दर्ज?
मामला भारतीय दंड संहिता (IPC) की कई गंभीर धाराओं में दर्ज किया गया है:
- 419: पहचान छुपाकर धोखाधड़ी
- 420: धोखाधड़ी और संपत्ति का गलत हस्तांतरण
- 465: जालसाजी
- 467: कीमती दस्तावेज़ों की जालसाजी
- 471: नकली दस्तावेज़ का असली के रूप में इस्तेमाल
- 120बी: आपराधिक साजिश
DSP करन शर्मा इस केस की जांच कर रहे हैं और यह पता लगाने में जुटे हैं कि इस घोटाले में और कौन-कौन शामिल था।
हाईकोर्ट के दखल से मिली रक्षा मंत्रालय को जमीन
फत्तूवाला गांव की यह जमीन पाकिस्तान सीमा के काफी करीब है और रणनीतिक दृष्टि से बेहद अहम मानी जाती है। साल 2025 में हाईकोर्ट के हस्तक्षेप के बाद यह जमीन फिर से रक्षा मंत्रालय को सौंप दी गई।
कैसे हुआ फर्जीवाड़ा?
जांच में सामने आया है कि आरोपी उषा और नवीन (गांव डुमनी वाला के निवासी) ने कुछ राजस्व अधिकारियों की मिलीभगत से यह जमीन अपनी बताकर बेच दी। उन्होंने जमीन के रिकॉर्ड में हेरफेर कर फर्जी कागजात बनाए और सौदा कर दिया।
शिकायत करने वाले कौन थे?
इस घोटाले की शुरुआत की जानकारी रिटायर्ड राजस्व अधिकारी निशान सिंह ने दी थी। उन्होंने ही पहली शिकायत दर्ज करवाई थी, लेकिन उस समय कोई कार्रवाई नहीं हुई। 2021 में हलवाड़ा एयरफोर्स स्टेशन के कमांडेंट ने फिर इस मामले को लेकर फरीदकोट के डिप्टी कमिश्नर को पत्र लिखा, लेकिन बात वहीं अटक गई।
कौन-कौन दिखाया गया था मालिक?
याचिका में बताया गया कि असली मालिक मदन मोहन लाल की मौत 1991 में हो चुकी थी। इसके बावजूद 1997 में फर्जी बिक्री कर दी गई। 2009-10 तक जमीन के रिकॉर्ड (जमाबंदी) में सुरजीत कौर, मनजीत कौर, मुख्तियार सिंह, जगीर सिंह, दारा सिंह, रमेश कांत और राकेश कांत को मालिक दिखाया गया, जबकि सेना ने यह जमीन कभी किसी को ट्रांसफर ही नहीं की थी।
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