औरतों का दर्द: 'इसे टीबी है, इससे दूर रहो'
डब्ल्यूएचओ के मुताबिक हर साल भारत में टीबी के 28 लाख नए मामले सामने आते हैं.
भारत टीबी की वैश्विक राजधानी है. विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक़ हर साल भारत में टीबी के 28 लाख नए मामले सामने आते हैं. इनमें से एक लाख मामले दवा प्रतिरोधक वाले होते हैं.
हर साल 4,85,000 टीबी के मरीज़ भारत में मौत के मुंह में समा जाते हैं. टीबी के मरीज़ो के इलाज पर सरकार का सलाना 24 अरब अमरीकी डॉलर खर्च होता है.
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुमान के मुताबिक़ करीब चालीस फ़ीसदी भारतीयों में छुपे हुए टीबी के लक्षण पाए गए हैं. ये लोग एम ट्यूबरक्यूलोसिस वायरस से संक्रिमत होते हैं और ये प्रत्यक्ष तौर पर टीबी के मरीज नहीं होते हैं.
इस तरह के टीबी के मरीज संक्रमण फैलाने वाले नहीं होते हैं लेकिन भविष्य में इनके टीबी के ग्रसित होने की संभावना बनी रहती है.
ज़ूनोटिक टीबी इंसानों के लिए बड़ा ख़तरा
टीबी का असर लोगों के जीवन पर व्यापक रूप से पड़ता है.
अव्वल तो इसके इलाज में होने वाले खर्च की वजह से परिवार पर आर्थिक दबाव पड़ता है.
दूसरी बात यह है कि इसका इलाज लंबे समय तक चलता है और कई बार दवा प्रतिरोधक टीबी की वजह से ग़लत इलाज़ चलता रहता है.
मरीज को भेदभाव वाली नज़र के साथ देखा जाता है. उन्हें समाज से काट दिया जाता है.
औरतों के लिए तो यह स्थिति और भी कठिन हो जाती है. पोषक तत्वों और स्वास्थ्य सेवाओं की कमी की वजह से उनके लिए हालात और बदतर हो जाते हैं.
भावनात्मक और मानसिक रूप से अकेले पड़ने के वजह से उनके लिए टीबी के साथ जंग और भी मुश्किल हो जाती है.
कई बार तो उनके परिवार वाले उन्हें अकेला छोड़ देते हैं.
ऐसी ही नौ महिलाओं की कहानी चपल मेहरा ने अपनी नई किताब नाइन लाइव्स में बताई है.
मुंबई की 22 साल की मानसी बताती है, "टीबी आपकी ज़िंदगी को खा जाती है. जब तक टीबी का पता नहीं चला था और उसका इलाज नहीं शुरू हुआ था तब तक मैं जीवन में अपने लक्ष्यों को लेकर पूरी तरह समर्पित थी. ऐसा लगता था कि मुझे अपने जीवन के मकसद में कामयाब होने से कोई नहीं रोक सकता. लेकिन टीबी होने के बाद ऐसा लगा कि सब कुछ ख़त्म होता जा रहा है."
दिल्ली में रहने वाली 32 साल की दुर्गावती बताती है, "हमें सहारे, सहानुभूति और हौसले की जरूरत है. यह शारीरिक और मानसिक दोनों स्तरों पर लड़े जाने वाली लड़ाई है जिसमें परिवार और दोस्तों की अहम भूमिका होती है."
मुंबई की 32 साल की दीप्ति चव्हाण कहती हैं, "क्या यह चिंता की बात नहीं है कि हमें आज भी सटीक तौर पर यह पता नहीं है कि इस देश में वाकई में कितने दवा प्रतिरोधक क्षमता वाले टीबी के मरीज हैं? सबसे ख़राब बात तो यह है कि भारत में ज्यादातर टीबी के मरीजों का ना ही सही इलाज होता है और ना ही सही दवा दी जाती है. हम क्यों एक इलाज हो सकने वाले बीमारी को इतना ताकतवर बनने दे रहे हैं?"
गुजरात की तेजल जो 26 की हैं, कहती हैं, "अगर मैं कहीं जाती हूं तो लोग वहां से चले जाते हैं या फिर जोर-जोर से बोलने लगते हैं कि इसे टीबी है. दूर रहों. हटो यहां से."
पश्चिम बंगाल के एक कस्बे कटवा की नूर जहां 29 साल की हैं. वो कहती हैं, "मुझे वो लम्हा याद आता है जब मैं यह सोचती थी कि अगर मैंने इलाज बंद किया तो मेरा बच्चा बिना मां के कैसे रहेगा. कौन उसकी देखभाल करेगा?"
पुणे में रहने वाली 29 साल की देबाश्री का कहना है, " क्या होता है जब आप चारदीवारी के अंदर बंद रहते हैं. आप अवसाद ग्रसित हो जाते हैं. आपके अंदर इतनी ताकत भी नहीं रहती है कि आप खिड़की से किसी आने-जाने वाले को देखे. इलाज़ के दौरान उन दो-तीन महीनों में मैं वाकई में पागल हो चुकी थी."
सरिका मुंबई में रहती हैं. 32 साल की सरिका बताती हैं, "मैं बेहतर इलाज़ का खर्चा उठा सकती थी. इसलिए मैंने अपना बेहतर इलाज करवाया. लेकिन मैं उन लाखों भारतीयों के बारे में सोच कर परेशान हूं जिन्हें टीबी है और उनका हर दिन कैसे गुजरता है?"












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