औरतों का दर्द: 'इसे टीबी है, इससे दूर रहो'

डब्ल्यूएचओ के मुताबिक हर साल भारत में टीबी के 28 लाख नए मामले सामने आते हैं.

नंदिता
Rohit Saha
नंदिता
26 साल की नंदिता कहती है, "मैंने अपनी ज़िंदगी कभी भी समाज के तयशुदा नियमों के हिसाब से नहीं जी. टीबी को मैं अपनी ज़िंदगी बर्बाद करने नहीं दे सकती थी. वो भी तक ज़िंदगी में बहुत कुछ करना बाकी हो."

भारत टीबी की वैश्विक राजधानी है. विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक़ हर साल भारत में टीबी के 28 लाख नए मामले सामने आते हैं. इनमें से एक लाख मामले दवा प्रतिरोधक वाले होते हैं.

हर साल 4,85,000 टीबी के मरीज़ भारत में मौत के मुंह में समा जाते हैं. टीबी के मरीज़ो के इलाज पर सरकार का सलाना 24 अरब अमरीकी डॉलर खर्च होता है.

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुमान के मुताबिक़ करीब चालीस फ़ीसदी भारतीयों में छुपे हुए टीबी के लक्षण पाए गए हैं. ये लोग एम ट्यूबरक्यूलोसिस वायरस से संक्रिमत होते हैं और ये प्रत्यक्ष तौर पर टीबी के मरीज नहीं होते हैं.

इस तरह के टीबी के मरीज संक्रमण फैलाने वाले नहीं होते हैं लेकिन भविष्य में इनके टीबी के ग्रसित होने की संभावना बनी रहती है.

ज़ूनोटिक टीबी इंसानों के लिए बड़ा ख़तरा

दोबारा क्यों जकड़ती है टीबी?

टीबी का असर लोगों के जीवन पर व्यापक रूप से पड़ता है.

अव्वल तो इसके इलाज में होने वाले खर्च की वजह से परिवार पर आर्थिक दबाव पड़ता है.

दूसरी बात यह है कि इसका इलाज लंबे समय तक चलता है और कई बार दवा प्रतिरोधक टीबी की वजह से ग़लत इलाज़ चलता रहता है.

मरीज को भेदभाव वाली नज़र के साथ देखा जाता है. उन्हें समाज से काट दिया जाता है.

औरतों के लिए तो यह स्थिति और भी कठिन हो जाती है. पोषक तत्वों और स्वास्थ्य सेवाओं की कमी की वजह से उनके लिए हालात और बदतर हो जाते हैं.

भावनात्मक और मानसिक रूप से अकेले पड़ने के वजह से उनके लिए टीबी के साथ जंग और भी मुश्किल हो जाती है.

कई बार तो उनके परिवार वाले उन्हें अकेला छोड़ देते हैं.

ऐसी ही नौ महिलाओं की कहानी चपल मेहरा ने अपनी नई किताब नाइन लाइव्स में बताई है.

मानसी
Shampa Kabi
मानसी

मुंबई की 22 साल की मानसी बताती है, "टीबी आपकी ज़िंदगी को खा जाती है. जब तक टीबी का पता नहीं चला था और उसका इलाज नहीं शुरू हुआ था तब तक मैं जीवन में अपने लक्ष्यों को लेकर पूरी तरह समर्पित थी. ऐसा लगता था कि मुझे अपने जीवन के मकसद में कामयाब होने से कोई नहीं रोक सकता. लेकिन टीबी होने के बाद ऐसा लगा कि सब कुछ ख़त्म होता जा रहा है."

दुर्गावती
Rohit Saha
दुर्गावती

दिल्ली में रहने वाली 32 साल की दुर्गावती बताती है, "हमें सहारे, सहानुभूति और हौसले की जरूरत है. यह शारीरिक और मानसिक दोनों स्तरों पर लड़े जाने वाली लड़ाई है जिसमें परिवार और दोस्तों की अहम भूमिका होती है."

दीप्ति चव्हाण
BBC
दीप्ति चव्हाण

मुंबई की 32 साल की दीप्ति चव्हाण कहती हैं, "क्या यह चिंता की बात नहीं है कि हमें आज भी सटीक तौर पर यह पता नहीं है कि इस देश में वाकई में कितने दवा प्रतिरोधक क्षमता वाले टीबी के मरीज हैं? सबसे ख़राब बात तो यह है कि भारत में ज्यादातर टीबी के मरीजों का ना ही सही इलाज होता है और ना ही सही दवा दी जाती है. हम क्यों एक इलाज हो सकने वाले बीमारी को इतना ताकतवर बनने दे रहे हैं?"

तेजल
Manasi Khade
तेजल

गुजरात की तेजल जो 26 की हैं, कहती हैं, "अगर मैं कहीं जाती हूं तो लोग वहां से चले जाते हैं या फिर जोर-जोर से बोलने लगते हैं कि इसे टीबी है. दूर रहों. हटो यहां से."

नूर जहां
Rohit Saha
नूर जहां

पश्चिम बंगाल के एक कस्बे कटवा की नूर जहां 29 साल की हैं. वो कहती हैं, "मुझे वो लम्हा याद आता है जब मैं यह सोचती थी कि अगर मैंने इलाज बंद किया तो मेरा बच्चा बिना मां के कैसे रहेगा. कौन उसकी देखभाल करेगा?"

देबाश्री
Rohit Saha
देबाश्री

पुणे में रहने वाली 29 साल की देबाश्री का कहना है, " क्या होता है जब आप चारदीवारी के अंदर बंद रहते हैं. आप अवसाद ग्रसित हो जाते हैं. आपके अंदर इतनी ताकत भी नहीं रहती है कि आप खिड़की से किसी आने-जाने वाले को देखे. इलाज़ के दौरान उन दो-तीन महीनों में मैं वाकई में पागल हो चुकी थी."

सारिका
Prachi Gupta
सारिका

सरिका मुंबई में रहती हैं. 32 साल की सरिका बताती हैं, "मैं बेहतर इलाज़ का खर्चा उठा सकती थी. इसलिए मैंने अपना बेहतर इलाज करवाया. लेकिन मैं उन लाखों भारतीयों के बारे में सोच कर परेशान हूं जिन्हें टीबी है और उनका हर दिन कैसे गुजरता है?"

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