टोक्यो ओलंपिक डायरी: मुंबई की लड़की के लिए टोक्यो में रहना औरों की तुलना में क्यों है आसान?
टोक्यो में तीन दिन के कड़े और सख़्त क्वॉरंटीन का समय बीत जाने के बाद बहुतअच्छा महसूस हो रहा है.
बीते साल शुरू हुए लॉकडाउन के बाद से हम सब लोगों का जीवन जैसे घरों में बंद हो गया है, लेकिन टोक्यो जैसे सुंदर शहर में पूरा दिन होटल के कमरे में बंद रहना कचोटने वाला अनुभव था.
टोक्यो काफ़ी भीड़ भाड़ वाला शहर है. यहां होटल के कमरे औसत भारतीय होटल के कमरों की तुलना में छोटे हैं. होटल में मेरा कमरा आठ गुना बारह फ़ीट का है. बाथरूम और एक छोटी सी पैंट्री भी साथ में अटैच्चड है. मेरे कुछ सहकर्मियों के मुताबिक़, इन कमरों में उन्हें जकड़न या बंधे होने जैसा एहसास हो रहा है, लेकिन मुंबई से होने की वजह से सीमित जगह में तालमेल बिठाने में मुझे आसानी हुई.
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वैसे होटल में महज़ कमरे ही छोटे नहीं हैं, बल्कि बुनियादी ज़रूरत के सारे सामान भी औसत आकार से छोटे हैं- चाहे वो माइक्रोवेव हो या केटल, फ़्रीज हो या वॉशिंग मशीन, डेस्क हो या कुर्सी, सबकुछ. वॉर्डरोब भी छोटा है, लेकिन उसमें कुछ हैंगर हैं. आप पूछें उससे पहले मैं बता दूं कि यहां जापानी स्मार्ट टॉयलेट उपलब्ध है.
मेरे कमरे में खिड़की तो पूरब दिशा में है, लेकिन यह खुलती नहीं है. खिड़की के सामने कुछ बहुमंजिला इमारतें दिखाई देती हैं. क्वॉरंटीन के तीन दिनों के दौरान मैंने अपना समय कमरे में बैठकर काम करते हुए बिताया, इस दौरान खिड़की से आकाश के बदलते रंगों को देखती भी रही.
यह देखना सुंदर तो था, लेकिन ऐसा लग रहा था कि मैं किसी सुविधायुक्त जेल में क़ैद हूं. मैं बाहर निकलकर काम करना चाहती थी.
इसलिए जब क्वॉरंटीन की अवधि पूरी हुई और हमलोगों ने उन वैन्यूज़ को देखने का फ़ैसला किया, जहां ओलंपिक के मुक़ाबले होने हैं. हमने अपनी टीम के अंदर बायो बबल क्रिएट किया है- मतलब एक समूह में भी लोग एक दूसरे के संपर्क में ना आ पाएं, एक साथ यात्रा ना करें और बबल से बाहर किसी से बात करते वक्त हमेशा मास्क में हों.
मैं और अरविंद अलग अलग ग्रुप में हैं. मेरे बबल में बीबीसी की नैरोबी स्थित टीम की क्लेस्टाइन कारोने हैं. क्लेस्टाइन मेरी तरह ही स्पोर्ट्स लवर हैं. ऐसे में निश्चित तौर पर हम दोनों सबसे पहले जापानी नेशनल स्टेडियम यानी ओलंपिक स्टेडियम देखना चाहते थे.
ओलंपिक स्टेडियम मुख्य स्टेडियम है और यहीं उद्घाटन और समापन समारोह होना है. साथ में एथलेटिक्स की प्रतियोगिताएं भी यहीं होंगी.
जब हम स्टेडियम पहुंचे तो मालूम हुआ कि यह पत्रकारों के लिए अभी तक नहीं खोला गया है. इसके बाद भी हमें यहां एक दिलचस्प नजारा देखने को मिला, जिससे जापान के लोगों में इस खेल को लेकर मौजूद उत्साह और चिंता का पता चलता है.
स्टेडियम के बाहर ही, ओलंपिक मूवमेंट को दर्शाने वाला एक म्यूज़ियम बना हुआ है. इसके ठीक बगल में जूडो खेल की शुरुआत करने वाले जिगोरो कानू की प्रतिमा है. साथ ही पांच छल्लों वाला ओलंपिक निशान भी मौजूद है.
जब हम यहां पहुंचे तो हमें बैरिकेड के सामने कतारें दिखीं. कई लोग अपने परिवार यानी छोटे-छोटे बच्चों के साथ नज़र आए. सब ओलंपिक निशान के सामने अपनी तस्वीरें लेना चाहते थे.
यहां मुझे पहली बार एहसास हुआ कि मैं ओलंपिक शहर में हूं, यह एहसास जश्न मनाने से कम नहीं था.
इसी दौरान हमने देखा कि गले में ओलंपिक पहचान पत्र लगाए कई लोग ये सुनिश्चित कर रहे थे कि यहां लोग आपस में एक दूसरे से पर्याप्त दूरी बनाए रखें.
कोविड संक्रमण के दौरान जापान में ओलंपिक आयोजन को लेकर कई लोगों में चिंता भी दिखी है. ओलंपिक विलेज में कोविड संक्रमण के मामले की पुष्टि होने के बाद इन सबकी चिंताएं बढ़ गई हैं.
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नियमों के चलते हम इन लोगों से बातचीत नहीं कर सके, लेकिन बच्चों का उत्साह निश्चिंत करने वाला दिखा.
मुख्य प्रेस सेंटर की ओर जाने के लिए मशहूर रेनबो ब्रिज से जब हम गुज़र रहे थे तभी खूबसूरत क्षितिज उभरता नजर आया. मैंने नया उत्साह महसूस किया.
साफ़-साफ़ कहूं तो ओलंपिक के शुरू होने और खेलों पर बात शुरू करने के लिए मैं अब और इंतज़ार नहीं करना चाहती, काफ़ी समय हो गया है.
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