Women Reservation Bill पर NDA की राह हुई आसान? शरद पवार की NCP और DMK के सॉफ्ट स्टैंड से INDIA गठबंधन में हलचल
Women Reservation Bill: संसद के मानसून सत्र से पहले महिला आरक्षण बिल एक बार फिर देश की राजनीति के केंद्र में आ गया है। अप्रैल में बजट सत्र के दौरान विपक्ष के भारी हंगामे के कारण सरकार इसे संसद में पार नहीं करा सकी। लेकिन अब INDIA गठबंधन के विपक्षी पार्टियों का सुर बदला बदला नजर आ रहा है।
इसके साथ ही बंगाल में टूट के बाद BJP नंबर गेम में भी काफी मजबुत दिख रही है। इससे एक बार फिर इस बिल को लेककर एनडीए की उम्मीदें बढ़ गई हैं।

पश्चिम बंगाल में TMC की टूट, DMK के बदले राजनीतिक समीकरण और शरद पवार की पार्टी NCP (SP) की ओर से मिले संकेतों ने इस बिल को लेकर नई चर्चा शुरू कर दी है। हालांकि विपक्ष अब भी पूरी तरह बिखरा नहीं है, लेकिन पहले जैसी एकजुटता भी दिखाई नहीं दे रही।
अप्रैल में क्यों अटक गया था महिला आरक्षण बिल?
अप्रैल 2026 में जब केंद्र सरकार ने संविधा के 131वां संशोधन विधेयक संसद में पेश किया तो इसे परिसीमन बिल और अन्य संशोधन विधेयकों के साथ जोड़ा गया था। सरकार चाहती थी कि संसद और विधानसभाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण लागू किया जाए। इसके लिए लोकसभा की सीटों की संख्या बढ़ाकर करीब 850 करने और नए परिसीमन के आधार पर सीटों का पुनर्गठन करने का प्रस्ताव रखा गया था।
चूंकि यह संविधान संशोधन था, इसलिए इसे पारित कराने के लिए दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत जरूरी था। केंद्र सरकार के पास बहुमत तो था, लेकिन विपक्ष के हंगामे के कारण संसद में विशेष बहुमत नहीं जुट पाया और विधेयक गिर गया।
अब क्यों बदले-बदले नजर आ रहे हैं राजनीतिक समीकरण?
सवाल ये है कि BJP जिस विधेय को बजट सत्र में पारित नहीं करा पाई थी उसे मानसून सत्र से पहले एक बार फिर लाने की तैयारी क्यों हो रही है। इसका सीधा सा जवाब विपक्ष की एकजुटता है। पहले इंडिया ब्लॉक एक सुर में इसका विरोध कर रहा था। लेकिन 5 राज्यों के चुनावी नतीजों ने विपक्ष को संख्या बल में कमजोर कर दिया।
बंगाल में ममता दीदी की हार के बाद से ही TMC बागियों की टूट से गुजर रही है, तमिलनाडु में कांग्रेस का DMK को साथ ना देना, और शरद पवार की पार्टी की सॉफ्ट स्टैंड विपक्ष की ताकत पर सवाल खड़ा कर रहा है। सबसे ज्यादा चर्चा शरद पवार की पार्टी NCP (SP) को लेकर है।
NCP (SP) नेता सुप्रिया सुले ने महिला आरक्षण बिल पर क्या कहा?
पिछले दो दिनों से सियासी गलियारे में इस बात की चर्चा थी कि केंद्र सरकार महिला आरक्षण बिल पर एनसीपी (एसपी) का समर्थन चाहती है। इस पर पार्टी की कार्यकारी अध्यक्ष सुप्रिया सुले ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर साफ किया कि उनकी पार्टी ने अभी तक किसी भी बिल का समर्थन नहीं किया है। उन्होंने कहा, हमारे सामने अभी तक बिल नहीं आया है। जब बिल आएगा, तब हम 24 घंटे के भीतर अपना पक्ष रखेंगे।"
हालांकि सुप्रिया सुले ने महिला आरक्षण का खुलकर समर्थन किया। उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी चाहती है कि संसद में महिलाओं को 33%आरक्षण जल्द से जल्द मिले। लेकिन उन्होंने सरकार के सामने एक अहम शर्त भी रखी। सुप्रिया सुले के मुताबिक, केंद्रीय कानून मंत्री किरण रिजिजू के साथ बातचीत में यह प्रस्ताव रखा है कि देश के सभी राज्यों में लोकसभा सीटों की संख्या समान रूप से 50 % बढ़ाई जाए। उन्होंने कहा, अगर सरकार यह प्रस्ताव लिखित रूप में देती है, तब हम इस पर चर्चा करेंगे। यानी NCP (SP) ने फिलहाल समर्थन का ऐलान नहीं किया है, लेकिन बातचीत का दरवाजा खुला रखा है।
INDIA गठबंधन छोड़ने से भी किया इनकार
सुप्रिया सुले ने यह भी साफ कर दिया कि उनकी पार्टी NDA में शामिल होने नहीं जा रही है। उन्होंने कहा, हम INDIA गठबंधन का हिस्सा हैं और कहीं नहीं जा रहे हैं। हालांकि राजनीतिक जानकार मानते हैं कि उनका बयान यह जरूर संकेत देता है कि अगर सरकार सभी राज्यों के लिए समान सीट बढ़ोतरी का फार्मूला लाती है तो पार्टी उस पर विचार कर सकती है।
तो क्या अब नंबर गेम से संसद में BJP पलटेगी बाजी?
महिला आरक्षण बिल को लेकर बीजेपी की उम्मीदें इसलिए भी बढ़ी हैं क्योंकि पश्चिम बंगाल में टीएमसी के भीतर बड़ी टूट देखने को मिलू है। विधानसभा चुनाव में हार के बाद टीएमसी के कई सांसद NDA खेमे में हैं। माना जा रहा है कि 28 में से करीब 20 लोकसभा सांसद एनडीए का समर्थन कर सकते हैं।
राज्यसभा में भी TMC के कई नेताओं के इस्तीफे ने सरकार की स्थिति मजबूत की है। यदि विपक्ष के कुछ सांसद सरकार के पक्ष में वोट देते हैं या मतदान से दूर रहते हैं तो संविधान संशोधन पारित कराने के लिए जरूरी आंकड़ा सरकार के लिए आसान हो सकता है।
DMK अब भी अपने रुख पर कायम
दूसरी ओर दक्षिण भारत की सबसे बड़ी पार्टी DMK अभी भी अपने पुराने रुख पर कायम है। DMK का कहना है कि उसे महिला आरक्षण से कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन वह इसे परिसीमन से जोड़ने के खिलाफ है। पार्टी का तर्क है कि नई जनसंख्या के आधार पर सीटों का बंटवारे में दक्षिण भारत के उन राज्यों के साथ अन्याय होगा जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर काम किया है। DMK चाहती है कि महिलाओं को आरक्षण मौजूदा 543 लोकसभा सीटों पर ही लागू किया जाए और परिसीमन को इससे अलग रखा जाए।
समाजवादी पार्टी भी बदल सकती है अपना रुख?
मीडिया रिपोर्टस में माना जा रहा है कि आगामी विधानसभा चुनाव 2027 को ध्यान में रखते हुए समाजवादी पार्टी भी अपना रुख बदल सकती है। हो सकता है कि यदि सभी राज्यों में समान रूप से सीटें बढ़ाने का लिखित प्रस्ताव आता है तो पार्टी खुलकर विरोध करने की बजाय तटस्थ रुख अपना सकती है। हालांकि इस पर अभी तक कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है।
सरकार के सामने कितनी बड़ी चुनौती?
अप्रैल में जब यह विधेयक लोकसभा में मतदान के लिए आया था, तब सरकार के पक्ष में 298 वोट पड़े थे, जबकि 230 सांसदों ने विरोध किया था। संविधान संशोधन पारित कराने के लिए उस समय लगभग 352 वोटों की जरूरत थी। यानी सरकार करीब 50 से ज्यादा वोटों से पीछे रह गई थी।
अब बीजेपी की कोशिश है कि विपक्ष में टूट और कुछ दलों के नरम रुख का फायदा उठाकर यह आंकड़ा हासिल किया जाए। इसा बार विपक्ष भी खास मजबुत नजर नहीं आ राहा है ऐसे में भाजपा इस मौके को हांथ से नहीं जाने देना चाह रही है। हालांकि DMK, वाम दल और कांग्रेस जैसे दल अभी भी परिसीमन को लेकर सवाल उठा रहे हैं।














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