Women Reservation Bill: लोकसभा में पास नहीं हुआ 131वां संशोधन बिल, पक्ष में सिर्फ 298 वोट, समझिए नंबर गेम

Women Reservation Bill: लोकसभा में महिला आरक्षण को लागू करने से जुड़े परिसीमन संशोधनों पर जारी बहस के बीच शुक्रवार (17 अप्रैल) को बड़ा राजनीतिक मोड़ देखने को मिला। संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026 पर हुई वोटिंग में सरकार को झटका लगा और बिल पास नहीं हो सका। कुल 543 सांसदों वाली लोकसभा में वोटिंग के दौरान 489 सांसद मौजूद रहे, जिनमें से 298 ने समर्थन किया जबकि 230 ने विरोध में वोट डाला। हालांकि संविधान संशोधन के लिए जरूरी दो-तिहाई बहुमत का आंकड़ा 352 था, जिसे सरकार हासिल नहीं कर सकी। इस तरह बहुमत नहीं मिलने से ये बिल 54 वोट से गिर गया।

संविधान (131वां संशोधन) विधेयक को पास कराने के लिए दो तिहाई बहुमत की जरूरत होती। 543 सांसदों में के हिसाब से बिल को पास कराने के लिए 360 वोटों की जरूरत थी। लेकिन अगर आज के सांसदों की संख्या देखें तो 528 सांसदों ने ही वोट किया था। 528 सांसदों का दो तिहाई बहुमत 352 है। जबकि पक्ष में सिर्फ 298 सांसदों ने वोट किया है। लोकसभा 18 अप्रैल 11 बजे तक के लिए स्थगित कर दिया है।

Women Reservation Bill lok sabha Voting

कौन से तीन बिल पर संविधान में चर्चा?

केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल द्वारा पेश तीन प्रमुख बिल-संविधान संशोधन विधेयक, परिसीमन विधेयक और केंद्र शासित प्रदेश कानून संशोधन विधेयक-संसद की संरचना और चुनावी नक्शे में बड़े बदलाव का प्रस्ताव रखते हैं। इनमें लोकसभा सीटों को बढ़ाकर 850 करने, 2011 की जनगणना के आधार पर परिसीमन करने और उसी प्रक्रिया के जरिए महिला आरक्षण लागू करने की बात शामिल है।

सरकार ने इन बदलावों को लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व मजबूत करने की दिशा में जरूरी कदम बताया, लेकिन विपक्ष ने इसके पीछे राजनीतिक मंशा पर सवाल उठाए। विपक्षी दलों का कहना है कि वे महिला आरक्षण के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन इसे परिसीमन से जोड़ना एक "बैकडोर रणनीति" हो सकती है। उनका आरोप है कि सरकार इस कानून के जरिए चुनावी सीमाओं को अपने हिसाब से बदलने की कोशिश कर रही है। यही वजह है कि संसद में महिला आरक्षण के साथ-साथ परिसीमन का मुद्दा सबसे बड़ा विवाद बनकर उभरा है।

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"शर्मनाक कानून" क्यों बोले राहुल गांधी? लोकसभा में महिला आरक्षण बिल पर तीखा हमला

कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने शुक्रवार को लोकसभा में महिला आरक्षण बिल को लेकर कड़ा रुख अपनाया। उन्होंने कहा कि यह कानून महिलाओं को सशक्त बनाने के बजाय उन्हें कमजोर करेगा। राहुल ने इसे "शर्मनाक कानून" बताते हुए कहा कि सरकार को पुराना बिल लाना चाहिए, जिसे विपक्ष पूरा समर्थन देगा। उन्होंने आरोप लगाया कि यह बिल असल में महिलाओं के हित के लिए नहीं, बल्कि देश के निर्वाचन क्षेत्रों के नक्शे को बदलने की रणनीति का हिस्सा है।

राहुल गांधी ने अपने भाषण में सामाजिक न्याय का मुद्दा भी जोर-शोर से उठाया। उन्होंने कहा कि यह बिल ओबीसी और दलित समुदायों के लिए "क्रूर" साबित हो सकता है। उनका आरोप था कि सरकार इस कानून के जरिए ओबीसी वर्ग के अधिकारों को कमजोर करना चाहती है। राहुल ने कहा कि देश में इन वर्गों और महिलाओं के साथ क्या होता है, यह सबको पता है, लेकिन सरकार उनकी वास्तविक भागीदारी सुनिश्चित करने के बजाय उन्हें नजरअंदाज कर रही है।

बहस के दौरान राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री का नाम लिए बिना "ऑपरेशन सिंदूर-नोटबंदी का जादूगर" वाला बयान दिया, जिस पर सदन में जोरदार हंगामा हो गया। एनडीए सांसदों ने इस पर कड़ा विरोध जताते हुए आरोप लगाया कि राहुल प्रधानमंत्री का अपमान कर रहे हैं। स्थिति को संभालने के लिए लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने हस्तक्षेप किया और राहुल के विवादित शब्दों को कार्यवाही से हटाने का आदेश दिया।

महिला आरक्षण बिल पर जारी बहस अब सिर्फ कानून तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह राजनीतिक टकराव का बड़ा मुद्दा बन गई है। राहुल गांधी के बयान के बाद सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी नोकझोंक देखने को मिली, जिससे साफ है कि इस बिल पर सहमति बनना आसान नहीं होगा।

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