राहुल गांधी क्या अब 'ब्रांड राहुल' बन पाएंगे?

राहुल गांधी, नरेन्द्र मोदी
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राहुल गांधी, नरेन्द्र मोदी

तीन राज्यों के विधानसभा चुनाव जीतने के बाद जब बात कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की प्रेस कांफ्रेस करने की आई, तो मीडिया वालों को मंगलवार को घंटों इंतज़ार करना पड़ा.

वैसे तो हर जीत-हार के बाद दोनों पार्टी के अध्यक्षों के लिए ये एक रस्म-अदाएगी जैसी होती है, जहां पार्टी अध्यक्ष पार्टी के कार्यकर्ताओं का उनकी मेहनत के लिए धन्यवाद करते हैं, लेकिन इस बार राहुल गांधी ने इस प्रेस कांफ्रेस को केवल एक प्रेस कांफ्रेस की तरह नहीं लिया.

लगभग तीन घंटे के इंतज़ार के बाद वो पार्टी मुख्यालय 24 अकबर रोड पहुंचे. प्रेस कांफ्रेस की शुरूआत, उन्होंने कार्यकर्ताओं और वोट देने वालों को धन्यवाद देते हुए ही की थी, लेकिन वो सवालों से बचकर वापस जाने की जल्दबाज़ी में नहीं दिखे.

राहुल गांधी अलग ही तेवर और अंदाज़ में दिखे. मानों तीन राज्यों की जीत ने कांग्रेस से ज़्यादा उत्साह उन में भर दिया हो.

कांग्रेस अध्यक्ष के इस नए तेवर की चर्चा प्रेस कांफ्रेस ख़त्म होते ही टीवी स्डूडियो के साथ-साथ पार्टी दफ़्तर और सोशल मीडिया में भी छाई रही.

पत्रकार वार्ता के दौरान राहुल से एक सवाल पूछा गया, बीजेपी हमेशा 'कांग्रेस मुक्त भारत' की बात करती है, क्या कांग्रेस की वापसी के बाद 'बीजेपी मुक्त भारत' की शुरूआत होगी?

दो अलग अलग ब्रांड

राहुल ने बड़े ही सधे अंदाज़ में जवाब दिया, "हमारी अप्रोच अलग है. बीजेपी की एक विचारधारा है. हम उस विचारधारा के ख़िलाफ़ लड़ेंगे. उनको हम हराएंगे. हमने आज हराया है. उनको हम 2019 में हराएंगे. मगर हम किसी को भारत से मुक्त नहीं करना चाहते हैं. अगर लोगों की सोच हमसे अलग है तो हम उस सोच से लड़ेंगे, हम उन्हें देश से मिटाना नहीं चाहते."

ब्रांड कंसल्टेंट हरीश बिजूर के मुताबिक़, "राहुल गांधी के इस जवाब में उनकी सबको साथ लेकर चलने की सोच और विचारधार साफ़ झलकती है, जो किसी भी लोकतंत्र के लिए ज़रूरी है. बिना विपक्ष के लोकतंत्र नहीं हो सकता, ये बात राहुल गांधी समझते हैं और यही उनके जवाब में दिख रहा है. यही उनको ब्रांड मोदी से अलग करता है."

हरीश बिजूर के मुताबिक़ एक ही तरह के दो ब्रांड बाज़ार में एक-दूसरे से तभी प्रतिस्पर्धा कर पाते हैं, जब दोनों में बुनियादी फ़र्क़ हो. साल 2019 के लिहाज़ से देखें तो भारतीय राजनीति में दो अलग, बुनियादी फ़र्क़ वाले ब्रांड साफ़ देखने को अब मिल रहे हैं.

राहुल की पार्टी के भीतर स्वीकार्यता बढ़ी

राहुल गांधी
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राहुल गांधी

वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी हरीश बिजूर की बात से पूरी तरह सहमत नहीं हैं, लेकिन राहुल को पूरी तरह ख़ारिज भी नहीं करतीं.

उनके मुताबिक़ कोई ब्रांड तब बनता है जब वो जनता की नब्ज़ पकड़ ले. इस बार राहुल ऐसा करने में थोड़े कामयाब हुए. राफ़ेल की बात उन्होंने की जिससे लोगों ने ज़्यादा कनेक्ट नहीं किया, लेकिन किसानों की बात करके उन्होंने किसानों के बीच अपनी पहचान ज़रूर बना ली. पिछले कुछ वर्षों में यही उनकी उपलब्धि रही है. हालांकि मोदी की तरह उन्होंने अभी भी जुमलेबाज़ी नहीं सीखी है, पर वो बेहतर ज़रूर हुए हैं.

लेकिन नीरजा चौधरी अपनी बात में ये भी जोड़ती हैं कि इस जीत ने पार्टी के भीतर, नेता के तौर पर उनकी स्वीकार्यता बढ़ा दी है.

हरीश बिजूर कहते हैं, "राहुल गांधी में राजनीति के शुरूआती अमृत मंथन के बाद एक ठहराव आया है. जैसे अमृत मंथन के बाद अमृत और विष का अंतर साफ़ हुआ था, राहुल ने भी अच्छी बातों को अपने में समाहित किया है और बुरी बातों से तौबा कर लिया है. ये जीत उनके लिए संजीवनी का काम करेगी."

कांग्रेस अध्यक्ष, राहुल गांधी से अलग 'ब्रांड राहुल' बनकर तभी उभरेंगे, जब उनमें 'ब्रांड मोदी' से अलग कोई बात हो.

वो कहते हैं, "मोदी 'सबका साथ सबका विकास' का नारा तो देते हैं लेकिन पार्टी में सब जानते हैं कि विकास किसका हो रहा है. लेकिन राहुल ने इन चुनावों में ये साफ़ दिखा दिया कि युवा-जोश, जातिगत-समीकरण और पार्टी के अनुभवी नेताओं को साथ लेकर कैसे चला जा सकता है."

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'पप्पू वाली छवि' से निकले राहुल

अशोक गहलोत, सचिन पायलट, कमलनाथ, ज्योर्तिआदित्य सिंधिया
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अशोक गहलोत, सचिन पायलट, कमलनाथ, ज्योर्तिआदित्य सिंधिया

नीरजा चौधरी भी कहती हैं कि राहुल अपनी 'पप्पू वाली छवि' से अब निकल गए हैं.

पत्रकार के तौर पर अपने चुनावी दौरों का ज़िक्र करते हुए नीरजा कहती हैं, ''अब ग्राउंड पर उन्हें कोई पप्पू नहीं कहता. लोग उन्हें अब 'सीरियस प्लेयर' मानने लगे हैं. ब्रांड राहुल के तौर पर ये उनकी बहुत बड़ी जीत है.''

कांग्रेस मुख्यालय में राहुल गांधी के प्रेस कांफ्रेस के दौरान उनके हावभाव का ज़िक्र करते हुए हरीश बिजूर कहते हैं, ''हार को गरिमा के साथ हर कोई स्वीकार करता है, लेकिन जीत को गरिमा के साथ कैसे स्वीकार किया जाता है, वो राहुल गांधी ने अपनी प्रेस कांफ्रेस के साथ दिखाया. उनके अंदाज़ में एक ठहराव था, समग्रता की बात थी, अकड़ नहीं थी और परिपक्वता साफ़ झलक रही थी.

कुछ ख़ेमों में इस बात पर भी बहस हो रही है कि राहुल गांधी प्रश्नोत्तर के दौरान ज़्यादातर असरदार दिखे या शुरूआती पांच मिनट में?

राहुल गांधी
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इस पर हरीश बिजूर का जवाब थोड़ा अलग है. उनके मुताबिक़ सवाल-जवाब से ज़्यादा असरदार उनका शुरूआती भाषण था. उन्होंने कार्यकर्ताओं के साथ साथ मतदाताओं का धन्यवाद तो किया ही, लेकिन पिछली सरकारों को उनके काम के लिए शुक्रिया भी अदा किया.

लेकिन नीरजा चौधरी कहती हैं कि सवाल-जवाब को उन्होंने जिस तरह हैंडल किया वो ये बताता है कि राहुल अब माहिर नेता बन गए हैं. मोदी की तरह विपक्ष को दरकिनार करने की ग़लती उन्होंने नहीं की, ये अपने आप में बताता है कि राहुल अपनी ग़लतियों से ही नहीं दूसरों की ग़लतियों से भी सीख रहे हैं. असली ब्रांड की पहचान भी यही है.

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