नवजोत सिंह सिद्धू क्या फिर से बीजेपी का दरवाज़ा खटखटाएंगे
कर्नाटक और गोवा में संकट से जूझती कांग्रेस में अब नवजोत सिंह सिद्धू ने अमरिंदर सिंह मंत्रिमंडल से इस्तीफ़ा दे दिया है.
सिद्धू ने रविवार को ट्विटर पर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को भेजे अपने इस्तीफ़े की कॉपी पोस्ट की और लिखा, ''10 जून 2019 को राहुल गांधी को सौंपा गया मेरा इस्तीफ़ा.''
सिद्धू ने अब मुख्यमंत्री को भी इस्तीफ़ा भेज दिया है. पंजाब में मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह और नवजोत सिंह सिद्धू के बीच लंबे समय से अनबन चल रही है.
लोकसभा चुनावों में ख़राब प्रदर्शन के बाद से ये अनबन खुलकर सामने आई. अमरिंदर सिंह ने पंजाब में कांग्रेस के प्रदर्शन के लिए सिद्धू को ज़िम्मेदार ठहराया. इसके बाद उनका मंत्रालय भी बदल दिया गया.
शहरी निकाय के साथ पर्यटन-सांस्कृतिक विभाग वापस लेकर उन्हें ऊर्जा नवीकरणीय विभाग का प्रभार सौंपा गया था.
नवजोत सिंह सिद्धू ने विरोध स्वरूप नए मंत्रालय का कार्यभार नहीं संभाला था और अब इस्तीफ़ा सौंप दिया.
कांग्रेस पहले ही दो राज्यों में अपने विधायक बचाने की कोशिश में जुटी है. कर्नाटक में कांग्रेस-जेडीएस गठबंधन की सरकार पर ख़तरा मंडरा रहा है.
पंजाब में चल रहा ये टकराव अब इस्तीफ़े तक पहुंच गया है. कांग्रेस में सिद्धू जनवरी 2017 में आए थे. लगभग ढाई साल की पारी में सिद्धू इस्तीफ़े तक पहुंच गए.
कांग्रेस पर क्या पड़ेगा असर
वरिष्ठ पत्रकार जगतार सिंह कहते हैं, ''पंजाब में ये संकट पार्टी का नहीं है बल्कि दो लोगों का व्यक्तिगत टकराव का है. यहां नवजोत सिंह सिद्धू अकेले ही रहे हैं. उनका पार्टी में कोई बड़ा समर्थन आधार या समूह नहीं है. ऐसे में उनके इस्तीफ़े का पंजाब में कांग्रेस पर कोई ख़ास असर नहीं पड़ेगा. ''
''दरअसल, वो हमेशा से कांग्रेस में नहीं रहे. पहले बीजेपी में थे, फिर आम आदमी पार्टी से नाम जुड़ा, अपना अलग मोर्चा भी बनाया और फिर कांग्रेस में आ गए. उनका कांग्रेस में कोई समर्थन आधार नहीं बन सका. पंजाब के नेताओं से ज़्यादा उन्हें दिल्ली में राहुल गांधी और प्रियंका गांधी का समर्थन रहा है. अब राहुल गांधी भी इस मामले में कोई दख़ल नहीं दे रहे हैं.''
जगतार सिंह कहना है कि एक तरह से पार्टी में एक व्यक्ति अपनी लड़ाई लड़ रहा था जिसमें उन्हें राहुल गांधी का सपोर्ट था लेकिन अब वो भी चला गया है. ये निजी संकट है और इससे आगे कभी ये बात गई नहीं.
लेकिन, राजनीतिक विश्लेषक हरजेश्वर पाल सिंह इस बात से कुछ हद तक असहमति जताते हैं. उनका मानना है कि इस्तीफ़े का कांग्रेस पर असर पड़ सकता है.
हरजेश्वर पाल सिंह कहते हैं, ''सिद्धू एक लोकप्रिय नेता हैं और अकाली दल के ख़िलाफ़ भी खुलकर बोलते रहे है. यहां पर लोगों की ऐसी धारणा बनी हुई है कि कांग्रेस की अकाली दल से अंदरूनी सांठगांठ है. वहीं, सिद्धू को समझा जाता है कि वो अकाली के ख़िलाफ़ बोलते हैं और लोगों की आवाज़ हैं. ऐसे में सिद्धू के इस्तीफ़े से पार्टी में अंदरूनी तौर पर तो कोई नुकसान नहीं होगा लेकिन लोकप्रियता पर असर पड़ सकता है.''
''ये भी सच है कि उनके साथ नए एमएलए तो देखे गए हैं लेकिन संकट के समय कोई सामने नहीं आया है. उन्हें अंदरूनी तौर पर समर्थन हो सकता है लेकिन खुलकर कोई सामने नहीं आएगा. ''
क्यों देना पड़ा इस्तीफ़ा
पंजाब में दोनों नेताओं की तल्ख़ी किसी से छुपी नहीं है. अमरिंदर सिंह ने ये भी मान लिया था कि सिद्धू की राजनीतिक महत्वाकांक्षा मुख्यमंत्री पद पर बैठने की है.
लेकिन, सिद्धू के लिए हालात इतने कैसे बदल गए कि उन्हें इस्तीफ़ा देने की ज़रूरत पड़ गई.
जगतार सिंह कहते हैं, ''उनके पास कोई रास्ता नहीं बचा था. उनका मंत्रालय बदल दिया गया और अमरिंदर सिंह ने खुलकर उनके विरोध में आ गए. वो ज़रूर अपनी शिकायत लेकर राहुल गांधी के पास गए होंगे.''
''लेकिन, ये इस्तीफ़ा 10 जून का है और राहुल गांधी को अगर कुछ करना होता तो वो कर चुके होते. फिर पोर्टफोलियो बदलना मुख्यमंत्री के अधिकार क्षेत्र में आता है. दरअसल, पहले उन्हें केंद्रीय नेतृत्व से जो समर्थन था और वो भी अब नहीं मिल रहा है. ऐसे में उन्होंने इस्तीफ़ा देकर थोड़ा और बड़ा कदम बढ़ाया है.''
सिद्धू के पास विकल्प
नवजोत सिंह सिद्धू बीजेपी में रह चुके हैं और आम आदमी पार्टी से भी उनकी अनबन हुई है. ऐसे में कांग्रेस में स्थिति कमज़ोर होने पर उनके पास क्या विकल्प बचे हैं.
हरजेश्वर पाल सिंह का कहना है कि कांग्रेस में चाहे जो हालात हों लेकिन उनका बीजेपी और अकाली दल में जाने का सवाल नहीं उठता. उन्होंने दोनों दलों का इतना विरोध किया है कि अगर वो वापस जाते हैं तो उनका सियासी करियर बुरी तरह से प्रभावित हो जाएगा.
हरजेश्वर कहते हैं कि ऐसे में लगता है कि वो कांग्रेस में रहकर ही अंदरूनी लड़ाई लड़ेंगे. अगर केंद्र में कोई भूमिका मिलने की बात करें तो उस पर अभी कुछ कहना संभव नहीं, इंतज़ार करना होगा.
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