नवीन पटनायक मोदी के साथ गठबंधन करेंगे या नहीं?

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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सोमवार को ओडिशा पहुंच रहे हैं. एक दिन के इस दौरे में मोदी कई नई परियोजनाओं का उद्घाटन करेंगे, जिनके लिए केंद्र सरकार लगभग 15 हज़ार करोड़ रुपये ख़र्च करेगी .

केंद्रीय पेट्रोलियम और कौशल विकास मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान ने रविवार को बताया कि प्रधानमन्त्री 5 जनवरी को और 16 जनवरी को फिर ओडिशा दौरे पर आएँगे.

यही नहीं, अगले कुछ हफ़्तों में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह, गृहमंत्री राजनाथ सिंह, सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जैसे पार्टी के कई बड़े नेता भी ओडिशा का रुख करेंगे.

ज़ाहिर है 2019 चुनाव के मद्देनज़र भाजपा को राज्य से काफ़ी अपेक्षाएं हैं और इन अपेक्षाओं को वोटों में भुनाने कि मुहिम सोमवार को मोदी के दौरे के साथ शुरू होगी.

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भाजपा को लगता है कि 'हिंदी हार्टलैंड' में पिछले आम चुनाव के मुक़ाबले घटने वाली सीटों की संख्या में कुछ की भरपाई ओडिशा और बंगाल जैसे पूर्वी राज्यों से हो सकती है. खासकर ओडिशा में लोकसभा चुनाव के संभावित परिणामों को लेकर पार्टी काफी उत्साहित है क्योंकि उसे लगता है कि लगातार 18 साल से भी अधिक सत्ता में रहने के बाद ओडिशा में नवीन पटनायक सरकार के ख़िलाफ़ 'एंटी-इन्कम्बेसी' पनप रही है .

भाजपा का आकलन है की जैसे मध्य प्रदेश और पड़ोसी राज्य छत्तीसगढ़ में शिवराज चौहान और डॉ रमन सिंह जैसे लोकप्रिय मुख्यमंत्रियों के बावजूद 15 साल से सत्ता में बैठी उनकी सरकारों को हार का मुहं देखना पड़ा, ओडिशा में भी वही होगा.

भाजपा के इस आकलन के पीछे एक कारण यह भी है कि इन दो राज्यों के सरकारों के मुकाबले में नवीन सरकार ने किसानों के लिए बहुत कम काम किया है, जिसके कारण ओडिशा में किसानों की स्थिति केवल एम.पी. और छत्तीसगढ़ ही नहीं बल्कि देश के अन्य कई राज्यों की तुलना में बुरी है. नवीन की चौथी इनिंग्स में सैकड़ों किसान आत्महत्या कर चुके हैं .

नवीन का 'ट्रंप कार्ड'

लेकिन प्रेक्षकों का मानना है कि भाजपा बस रंगीन सपने देख रही है और ख्याली पुलाव पका रही है . इस आकलन के कुछ मुख्य कारण हैं . पहला: मध्य प्रदेश तथा छत्तीसगढ़ और ओडिशा कि राजनैतिक स्थिति में काफी फर्क है. इन दो राज्यों में भाजपा का सीधा मुक़ाबला कांग्रेस से था, जबकि ओडिशा में बीजू जनता दल (बीजद), भाजपा और कांग्रेस के बीच त्रिकोणीय मुकाबला होने जा रहा है, जिसका सीधा फ़ायदा सत्तारूढ़ दल को मिलना तय है क्योंकि भाजपा और कांग्रेस एक दूसरे का हाथ थामना असम्भव है. और यही नवीन का सबसे बड़ा 'ट्रंप कार्ड' है.

पिछले वर्ष पंचायत चुनाव में अप्रत्याशित सफलता और कांग्रेस के दयनीय प्रदर्शन के बाद भाजपा यह मानकर चल रही थी कि उसका सीधा मुकाबला बीजद से है . लेकिन जब से निरंजन पटनायक पीसीसी अध्यक्ष बने हैं, कांग्रेस पार्टी उनके नेतृत्व में अपनी खोई हुई साख वापस लाने कि कोशिश में जी जान से जुट गयी है और ज़मीनी स्तर पर इसका असर देखने को भी मिल रहा है .

दूसरा कारण है कि ओडिशा में किसान या अन्य किसी भी वर्ग या समुदाय ने आज तक अपने समुदाय की प्रतिनिधि के रूप में वोट नहीं दिया . अगर 2019 में एक साथ होनेवाले लोकसभा और विधानसभा चुनाव में किसान या राज्य सरकार से नाराज़ अन्य वर्गों ने ऐसा किया, तो यह अनहोनी होगी.

बनी हुई है नवीन की लोकप्रियता

तीसरा और सबसे बड़ा कारण है कि ओडिशा में जब मोदी आंधी 2014 में नहीं चल पाई जब वह अपनी चोटी पर थी, तो इस बार मोदी मैजिक चल जाएगा ऐसा सोचने का कोई आधार नहीं है क्योंकि 2014 के मुकाबले में मोदी की लोकप्रियता घटी है, बढ़ी नहीं है, जबकि उनकी सरकार की सारी कमियों और विफलताओं के बावजूद नवीन की लोकप्रियता में कुछ ख़ास गिरावट नहीं आई है . इसलिए लगता है कि पिछले चुनाव की तरह इस बार भी मोदी लहर नवीन चट्टान से टकराकर वापस चली जाएगी .

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पिछले साल फरवरी में पंचायत चुनाव में बीजद के अनपेक्षित प्रदर्शन के बाद नवीन ने कई 'प्रोएक्टिव' कदम उठाए हैं. अपनी पार्टी संगठन को संवारा है, आम लोगों से दूरी बनाये रखने की अपनी आदत को पूरी तरह से बदल डाला है और दर्ज़नों जनहितकर योजनाओं की घोषणा की है.

पिछले कुछ महीनों में शायद ही कोई हफ्ता गया होगा जब सरकार ने किसी नई परियोजना का ऐलान न किया हो . इन बदलावों का नतीजा यह हुआ है कि पिछले एक वर्ष में राज्य में जितने भी चुनाव या उपचुनाव हुए हैं, सभी में बीजद ने भाजपा और कांग्रेस दोनों को काफी पीछे छोड़ दिया है .

गौरतलब है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के दौरे से एक दिन पहले यानी रविवार को तेलंगाना राष्ट्र समिति (टी.आर.एस.) के अध्यक्ष के. चन्द्रशेखर राव भुवनेश्वर में मुख्यमंत्री नवीन पटनायक से मिले और 2019 चुनाव के मद्दे नज़र राष्ट्रीय स्तरपर एक गैर-भाजपा, गैर-कांग्रेस गठबंधन बनाने के बारे में बातचीत की.

क्या करेंगे पटनायक?

हालाँकि बातचीत के बाद दोनों मुख्यमंत्रियों ने स्वीकार किया कि आज कोई ठोस निर्णय नहीं हो पाया और बातचीत आनेवाले दिनों भी ज़ारी रहेगी. मंगलवार को जब प्रधानमंत्री ओडिशा में ही होंगे , तब केसीआर कोलकाता में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के साथ इस बारे में बातचीत कर रहे होंगे. अगले दिन नई दिल्ली में वे समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव और बसपा अध्यक्ष मायावती से मिल कर इस सन्दर्भ में बात करेंगे .

लेकिन रविवार को केसीआर के साथ बातचीत के बावजूद इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि नवीन आखिरकार 'फेडरल फ्रंट' के साथ जाएंगे. अंत तक सभी पार्टीयों को दुविधा में रखना बीजद सुप्रीमो की पुरानी फितरत है.

2014 में भी उहोंने वही किया था. वाम दलों के साथ लगातार बातचीत के बाद अंत में उन्होंने अकेले चुनाव लड़ने का फैसला लिया और वाम दलों या किसी अन्य पार्टी के लिए एक भी सीट नहीं छोड़ा. नतीजा यह हुआ की बीजद ने राज्य के 21 लोकसभा सीटों में से 20 और 147 विधान सभा सीटों में से 117 सीटें हासिल की .

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इस बार ऐसे परिणाम आने की संभावना कम ही दिखती है. लेकिन इसके बावजूद नवीन के किसी पार्टी के साथ गठबंधन बनाने या सीटों का समझौता करने की संभावना नहीं के बराबर है. स्पष्ट है कि नवीन सभी विकल्प खुले रखना चाहते हैं. चुनाव में अगर अच्छे परिणाम आए तो 'भाजपा और कांग्रेस के साथ समदूरत्व का 'जुमला' आगे भी जारी रहेगा.

सबसे बेहतर संबंध

अगर ऐसा नहीं हुआ तो चुनाव की बाद की स्थिति के अनुसार वे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से भाजपा या कांग्रेस किसी के भी साथ जा सकते हैं, जैसा उन्होंने 2014 से अब तक भाजपा के साथ किया है. चाहे नोटबंदी का मामला हो या जी.एस.टी, मोदी सरकार के खिलाफ अविश्वास मत का मुद्दा हो, राज्यसभा उपाध्यक्ष का चुनाव या फिर असम में राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (एन.आर.सी) का प्रश्न, नवीन और बीजद ने मुश्किल घड़ियों में हमेशा मोदी सरकार का साथ दिया है. ठीक उसी तरह 2004 से 2014 तक यूपीए सरकार के साथ भी उनके काफ़ी मधुर सम्बन्ध थे.

असल में नवीन का मुख्य उद्देश्य ओडिशा में सत्ता में बने रहना है, न कि राष्ट्रीय स्तर पर किसी गठबंधन का हिस्सा बनकर राष्ट्रीय राजनीति में अपनी प्रतिष्ठा बनाना. और इसके लिए उन्हें चुनाव के बाद भाजपा या कांग्रेस किसी के भी साथ अनौपचारिक समझौता करने में कोई परहेज नहीं है.

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