कोई बताये तो ! 1983 में विश्वविजेता भारतीय टीम के साथ श्रीनगर में क्यों हुआ था दुश्मनों जैसा सुलूक

नई दिल्ली, 27 मार्च: कुछ लोग फिल्म 'द कश्मीर फाइल्स’ का विरोध कर रहे हैं। उनका तर्क है कि इससे साम्प्रदायिक विभाजन को बढ़ावा मिलेगा। लेकिन सवाल ये है कि क्या दिन में आंख मूंद लेने से रात आ जाएगी ? सच पर पर्दा डाल देने से क्या कश्मीर फिर धरती का स्वर्ग बन जाएगा ? सच छिपाने की वजह से ही तो जख्म नासूर बन गया। हुक्मरान सच पर पर्दा डालते रहे और दिल के फफोले घाव बनते गये। श्रीनगर और दिल्ली में बैठे शासक यह दिखाते रहे कि जम्मू कश्मीर में सब कुछ ठीक है जब कि अंदर ही अंदर नफरत के शोले भड़कते रहे। समस्या को छिपाने की नहीं बल्कि उसे बताने और उसके समाधान की जरूरत है।

जहर को छिपाने से क्या अमृत हो जाएगा ?

जहर को छिपाने से क्या अमृत हो जाएगा ?

1983 में तो यहां आतंकवाद नहीं था। फिर क्यों विश्व विजेता भारतीय क्रिकेट टीम के साथ दुश्मनों की तरह सुलूक किया गया ? पाकिस्तान समर्थक स्थानीय नेता और दहशतगर्द कश्मीर की जनता को भारत के खिलाफ भड़काने में लगे हुए थे। 13 अक्टूबर 1983 को श्रीनगर के शेरे कश्मीर स्टेडियम में पहली बार कोई अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट मैच आयोजित हुआ था। भारत और वेस्टइंडीज के बीच मुकाबला था। चार महीना पहले ही भारत ने वेस्टइंजीज को हरा कर क्रिकेट का विश्व कप खिताब जीता था। पूरा देश जहां भारतीय क्रिकेट टीम पर गर्व कर रहा ता वहीं कश्मीर के कुछ लोग उसके खिलाफ जहर उगल रहे थे। भारत के राष्ट्रीय नायकों के साथ कश्मीर के लोगों की यह बदसलूकी आश्चर्यचकित करने वाली थी। तब टेलीविजन और सोशल मीडिया का जमाना नहीं था। अखबारों में भी इस घटना की छिटपुट खबरें ही छपीं। जब कि यह एक गंभीर मामला था। अगर उस समय ही आने वाले खतरे को भांप लिया गया होता, और उसका सटीक इलाज किया गया होता, तो चिंगारी आग न बनती। उस समय भारत की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी थीं। जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री फारूख अबदुल्ला थे। लेकिन दोनों में से किसी ने तत्परता नहीं दिखायी। सरकारें सच को छिपाये बैठी रहीं और 1987 में आतंकवाद ने कश्मीर को निगल लिया। 1983 के क्रिकेट मैच को कैसे दहशतगर्दों ने निशान बनाया, इसका जिक्र जरूरी है। जिक्र इसलिए, ताकि 'द कश्मीर फाइल्स' का विरोध करने वाले हकीकत को जान सकें।

13 अक्टूबर 1983, श्रीनगर

13 अक्टूबर 1983, श्रीनगर

सुनील गावस्कर ने अपनी किताब रन्स एंड रुईंस में लिखा है- अगर कोई टीम हार जाए या खराब खेले तो हूटिंग समझ में आती है। लेकिन मैच से पहले भारतीय टीम के खिलाफ नारे लगने लगे तो हम दुविधा में पड़ गये। दर्शकों की जमात में से कुछ लोग पाकिस्तान समर्थक नारे लगा रहे थे। यह बहुत हैरान करने वाला था। हम वेस्टइंडीज के खिलाफ खेल रहे थे न कि पाकिस्तान के खिलाफ। फिर पाकिस्तान के समर्थन में क्यों नारा लग रहे था, हम समझ नहीं पाये। खेल पत्रकार अभिषेक मुखर्जी ने भी इस मैच की परिस्थितियों के बारे में लिखा है। भारत के कप्तान कपिल देव और वेस्टइंडीज के कप्तान क्लाइव लॉयड टॉस के लिए मैदान में गये। लॉयड ने टॉस जीता और भारत को बैटिंग के लिए आमंत्रित किया। भारत की पारी शुरू करने सुनील गावस्कर और श्रीकांत मैदान पर उतरे। वेस्टइंजीज के पास उस वक्त खौफनाक तेज गेंदबाजों की चौकड़ी थी। एंडी रॉबर्ट्स, मैल्कम मार्शल, माइकल होल्डिंग, एल्डिन बैपटिस्ट की आग उगलती गेंदों को खेलना आसान न था।

भारत के खिलाफ हूटिंग

भारत के खिलाफ हूटिंग

पहला ही ओवर शुरू हुआ कि दर्शक दीर्घा से भारत के खिलाफ हूटिंग शुरू हो गयी। एंडी रॉबर्ट्स पहला ओवर लेकर आये। तब रॉबर्ट्स की रफ्तार से अच्छे अच्छों का पसीना छूट जाता था। माहौल भारत के खिलाफ था। पहले ही ओवर में गावस्कर का एक मुश्किल कैच स्लीप में गया लेकिन लॉयड लपक नहीं पाये। गावस्कर ज्यादा टिक नहीं पाये और मार्शल ने उन्हें 11 रनों पर आउट कर दिया। श्रीकांत ने 40 और वेंगसरकार ने 28 रना बना कर कुछ संघर्ष किया लेकिन भारतीय पारी 176 रनों पर ढेर हो गयी। स्पिनर रोजर हार्पर ने सबसे अधिक तीन विकेट लिये।

उपद्रवियों ने पिच खोद दी

उपद्रवियों ने पिच खोद दी

भारत की पारी खत्म हुई तो लंच ब्रेक हुआ। मैदान खाली था। तभी कुछ उपद्रवी मैदान में घुस गये और उन्होंने पिच को क्षतिग्रस्त कर दिया। हालांकि इसका नुकसान वेस्टइंडीज को होने वाला था। लेकिन उत्पात करने वाले लोगों को इससे कोई मतलब नहीं था। वे मैच को बाधित कर अपनी ताकत दिखाना चाहते थे। लेकिन सुरक्षा बलों ने उपद्रवियों को तत्काल खदेड़ दिया। पिच की मरम्मत कर खेलने लायक बनाया गया। वेस्टइंडीज की पारी शुरू करने के लिए डेसमंड हेंस और गौर्डन ग्रीनिज मैदान पर आये। कप्तान कपिल देव ने बॉलिंग शुरू की। भारतीय खिलाड़ियों के खिलाफ एक बार फिर बदसलूकी शुरू हुई। बाउंड्री लाइन पर फील्डिंग कर रहे भारतीय खिलाडियों पर खाली बोतलें और कंकड़-पत्थर फेंके जाने लगे। दिलीप बेंगसरकर को तो एक सिरफिरे ने सेब फेंक कर ही मार दिया। श्रीनगर के दर्शकों का यह रवैया देख भारतीय खिलाड़ी परेशान हो गये। हूटिंग तो वे पहले से झेल रहे थे लेकिन सुरक्षा की स्थिति ने उन्हें चिंता में डाल दिया। ऐसा लग रहा था कि मैच भारत में हो ही नहीं रहा हो।

प्रतिकूल माहौल में भारत की हार

प्रतिकूल माहौल में भारत की हार

वेस्टइंडीज ने 22.4 ओवर में बिना किसी नुकसान के 108 रन बनाये थे कि मौसम खराब हो गया। तेज धूलभरी आंधी से अंधेरा हो गया। बूंदाबांदी भी होने लगी। मैच रोक दिया गया। लेकिन मैच का फैसला एक अनोखे गणित से हुआ। भारत ने 22 ओवर में 80 रन बनाये थे। जब कि वेस्टइंडीज ने 22.4 ओवर में 108 रन बनाये थे। यानी वेस्टइंडीज 28 रन से आगे था। वेस्टइंडीज को 28 रनों से विजेता घोषित कर दिया गया। स्टेडियम का नजारा हतप्रभ कर देने वाला था। गावस्कर जब बैटिंग कर रहे थे तब एक नौजवान इमरान खान का पोस्टर हवा में लहरा रहा था। वह थम्स अप के जरिये जीत की निशानी भी दिखा रहा था। ऐसा क्यों हो रहा था ? वह भारत को हारता हुआ क्यों देखना चाहता था ? इस मामले में वह पाकिस्तान का पक्ष क्यों ले रहा था? जब कि उसका इस मैच कुछ लेना देना ही नहीं था। मैच के बाद रात को जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री फारूख अब्दुल्ला ने खिलाड़ियों के लिए भोज आयोजित की थी। जब फारूख अब्दुल्ला की भारतीय खिलाड़ियों से मुलाकात हुई तो उन्होंने मैच के दौरान हुई घटनाओं के लिए माफी मांगी। हालांकि सभी दर्शकों ने नहीं बल्कि एक उसके एक छोटे हिस्से ने ही भारतीय टीम के साथ बदसलूकी की थी, लेकिन ये थी तो एक गंभीर घटना। पिच खोदने के आरोप में कश्मीर पुलिस ने 12 लोगों को गिरफ्तार किया था। लेकिन उन्हें बेल पर छोड़ दिया गया था। बाद में वे सुबूत के अभाव में बरी भी हो गये थे। अगर उस समय ही सख्ती दिखायी गयी होती तो आज 'द कश्मीर फाइल्स' जैसी फिल्म बनाने की जरूरत नहीं पड़ती।

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