सोनू सूद की दरियादिली देखकर क्यों घबराए 'सरकार' ?
नई दिल्ली- शिवसेना के संस्थापक बालासाहेब ठाकरे अपनी बेबाकी और उसूलों के लिए भी जाने जाते थे। कोई उनके विचारों से सहमत हो या न हो, लेकिन यह बात उनके विरोधी भी मानते हैं कि उनकी नजर में जो सही लगता था, उसपर वह खुलकर अपने दिल की बातों का इजहार कर देते थे। वो हर बात को सियासी नफा-नुकसान की कसौटी पर नहीं तोलते थे। राम गोपाल वर्मा ने अमिताभ बच्चन को लेकर 'सरकार' नाम की फिल्म बनाई थी। कहा गया कि दरअसल, वह भी शिवसेना प्रमुख की शख्सियत को ही सिल्वर स्क्रीन पर उतारने की कोशिश थी। अब इन बातों में कितनी सच्चाई थी, उस विवाद में पड़ने का यहां हमारा मकसद नहीं है। हम तो सिर्फ यह देख रहे हैं कि उस 'सरकार' यानि पूर्व के शिवसेना प्रमुख और मौजूदा 'सरकार' यानि उद्धव ठाकरे की दौर में शिवसेना की राजनीति में बड़ा अंतर आ चुका है। इसकी वजह चाहे महा विकास अघाड़ी की सरकार चलाने की मजबूरी हो या वोट बैंक पॉलिटिक्स, लेकिन आज के 'सरकार' घबराते भी हैं और पार्टी की ओर से कही गई बात से सरपट भागते भी दिखाई देते हैं। ताजा मामला प्रवासी मजदूरों के लिए देवता बने सोनू सूद से जुड़ा है।

सोनू सूद की दरियादिली देखकर क्यों घबराए 'सरकार' ?
रविवार की शाम जिस तरह से अभिनेता सोनू सूद को लेकर महाराष्ट्र के गार्डियन मंत्री असलम शेख शिवसेना प्रमुख और प्रदेश के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के पारिवारिक आवास मातोश्री पर पहुंचे, उसकी पटकथा शायद सारे सियासी फायदे और नुकसान पर मंथन करने के बाद लिखी गई थी। सुबह तक जिस शिवसेना के मुखपत्र 'सामना' में सोनू सूद की प्रवासी मजदूरों की मदद को ड्रामेबाजी की तरह पेश करने की कोशिश की गई थी, अचानक ऐसा लगा कि उसके मुख्य संपादक (उद्धव ठाकरे) का हृदय परिवर्तिन हो चुका था। इस मुलाकात की घोषणा बाल ठाकरे की तीसरी पीढ़ी की सियासी बादशाहत के उत्तराधिकारी और कैबिनेट मंत्री आदित्य ठाकरे ने ट्विटर के जरिए की और आज की तारीख में श्रमिकों के दिलों के शहंशाह बन चुके सोनू सूद के साथ ली गई तस्वीर भी साझा की। सुबह तक जिनके खिलाफ पार्टी के मुखपत्र में कॉलम लिखा जा रहा था, शाम में उनके साथ मिलकर लोगों की सहायता करने की बातें कही जाने लगीं। उस दरियादिल इंसान को अब मातोश्री में भी एक अच्छी आत्मा बताया जाने लगा था।

मातोश्री में कांग्रेस नेता ने कराई सूद की एंट्री
उद्धव और आदित्य ठाकरे को अब सोनू सूद का जो काम इतना अच्छा लग रहा है कि वह उनके साथ मिलकर प्रवासी मजदूरों का दुख-दर्द कम करने में हाथ बंटाना चाहते हैं, उनके बारे में शिवसेना प्रमुख के चहेते नेता, पार्टी सांसद और पार्टी के मुखपत्र सामना के कार्यकारी संपादक संजय राउत ने किस अंदाज में तंज कसा था, उसकी चर्चा बाद में करेंगे। उससे पहले यह जान लेना जरूरी है कि मातोश्री का सोनू सूद के प्रति रुख में अचानक बदलाव कैसे आया। सोनू सूद को सीएम उद्धव के पास उनकी सरकार में कांग्रेस के नुमाइंदे और मुंबई सिटी के गार्डियन मंत्री असलम शेख लेकर पहुंचे थे। अब जरा इस मुलाकात के बाद उनकी ओर से की गई ट्वीट पर गौर फरमाते हैं। मुंबई के मलाड वेस्ट से कांग्रेस विधायक असलम शेख लिखते हैं, 'थैंक यू सोनू सूद। प्रवासी कामगारों के प्रति आपका सम्मान, समर्पण और उनकी मदद के लिए आपकी प्रतिबद्धता हमेशा सराहनीय है। महा विकास अघाड़ी की सरकार आपके द्वारा किए जा रहे सभी प्रयासों का चट्टान की तरह समर्थन करती रहेगी। हमेशा खुश रहना भाई।'

शिवसेना नेता के बदल गए सुर
वैसे असलम शेख ने सोनू सूद के लिए जो कुछ भी कहा है, वह उनके मंत्री होने पर भी सवाल उठाता है। सवाल ये उठता है कि सोनू सूद ने हजारों मजबूर लोगों की अपनी जेब से पैसे खर्च करके जो मदद पहुंचाई है वह तो राज्य सरकार की जिम्मेदारी थी। अगर राज्य सरकार ने अपनी पूरी ड्यूटी बखूबी निभाई होती तो सोनू सूद जैसे दरियादिल इंसान को इस तरह अपनी खून-पसीने की कमाई खर्च करने की नौबत ही क्यों आती ? अब जरा संजय राउत के नजरिए को भी ठाकरे और शेख की बातों के आधार पर परख लेना आवश्यक है। राउत ने सामना में अपने कॉलम 'रोखटोक' में सोनू सूद के लिए जिस भावना का इजहार किया था, उससे लगता है कि वह उन्हें भाजपा का एजेंट साबित करने की कोशिश कर रहे थे। हालांकि, उन्होंने बिना किसी का नाम लिए लिखा, 'लॉकडाउन के दौरान अचानक सोनू सूद नाम से नया महात्मा तैयार हो गया। इतने झटके और चतुराई के साथ किसी को महात्मा बनाया जा सकता है? ' सच्चाई ये है कि अगर सोनू सूद आज महात्मा बने हैं तो वह अपने काम की वजह से बने हैं, एक दरियादिल इंसान होने की वजह से बने हैं। इस बात में कोई दो राय नहीं कि जो हजारों लोग सोनू सूद की वजह से अपने घरों की ओर वापस जा पाए हैं, उनके दिलों में उनकी छवि किसी महात्मा से कम नहीं ही होगी। लेकिन, लगता है कि राउत पहले सच देखने के लिए तैयार ही नहीं थे। कमाल तो तब हो गया, जब सूद मातोश्री पहुंच गए तो राउत ने एक ट्वीट किया जिसमें उन्होंने लिखा, 'आखिर सोनू सूद को महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री का पता मिल गया। वह मातोश्री पहुंच चुके हैं। जय महाराष्ट्र।'

असल जिंदगी के हीरो बन चुके हैं सोनू सूद
राउत के आखिरी बयान से लगता है कि सोनू सूद के चलते शिवसेना की सियासत को जो नुकसान होने की आशंका पैदा हो गई थी, अब उसका डैमेज कंट्रोल होना संभव है। असल में इस विषय पर राउत के पहले लेख और आखिरी ट्वीट में ही 'सरकार' की घबराहट का सारा सार छिपा हुआ है। महाराष्ट्र की राजनीति में अब पूर्वांचली वोटरों को नजरअंदाज करके चलना आसान नहीं है। यही वजह थी कि सामना में लेख छपने के बाद कांग्रेस ने असलम शेख को किसी तरह से डैमेज कंट्रोल के लिए सक्रिय कर दिया। उद्धव ठाकरे को भी एहसास हो गया कि अभी कोरोना वायरस और लॉकडाउन की वजह से महाराष्ट्र की जो हालत हो चुकी है, उसमें गठबंधन में ज्यादा तनाव लेने से बात नहीं बनेगी। क्योंकि, बिना मातोश्री का मर्म समझे संजय राउत सोनू सूद के लिए वैसी बातें लिख गए होंगे यह संभव नहीं है। दूसरी बात ये भी हकीकत है कि शिवसेना भी समझ चुकी है कि उसकी सरकार पर प्रवासी मजदूरों और कामगारों से जो मुंह फेरने के आरोप लग रहे हैं उससे आगे की राजनीति को भारी नुकसान कर सकता है। क्योंकि, यह हकीकत है कि जो लोग सोनू सूद की वजह से अपने गांव लौट पाए हैं और उनसे जुड़े जितने लोग भी महाराष्ट्र में या देश में कहीं भी हैं, उनके लिए सोनू सूद असल जिंदगी के हीरो हैं।

हजारों दिलों के मसीहा बन चुके हैं सूद
एक आंकड़े के मुताबिक 288 सदस्यों वाली महाराष्ट्र विधान सभा में कम से कम 75 सीटें ऐसी हैं, जहां पर पूर्वांचली वोटों का अच्छा प्रभाव है। खासकर मुंबई, नवी मुंबई, नागपुर, पुणे, ठाणे, कोल्हापुर, औरंगाबाद, कल्याण और अकोला में तो वे बहुत ही ज्यादा प्रभावी हैं। इनमें से 35 सीट महानगरों के क्षेत्रों की हैं और 40 सीटें उपनगरीय इलाकों में आते हैं। ये पूर्वांचली वोटर मुख्य तौर पर उत्तर प्रदेश और बिहार के हैं। सोनू सूद ने जिन प्रवासियों को घर भेजने में मदद की है उनमें इसकी ही बहुतायत है। महाराष्ट्र कांग्रेस के नेता कृपाशंकर सिंह और संजय निरुपम जैसे नेता इन्हीं पूर्वांचलियों के बीच से निकले हैं। ऐसे में जब निरुपम जैसे नेता शुरू से ठाकरे सरकार के खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं, न कांग्रेस सबकुछ चुपचाप होते हुए देख सकती थी और न ही सच्चाई का सामना करने के बाद उद्धव ही शांत बैठे रह सकते थे। जबकि, राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी काफी पहले ही सोनू सूद को राजभवन बुलाकर उनको वह सम्मान दे चुक थे, जिसके वो वाजिब हकदार थे। जब इतनी सारी बातें उद्धव के समझ में आ गईं तो उन्होंने घबराहट में अपनी भूल सुधारने की शायद एक कोशिश की है। क्योंकि, पार्टी को पहला नुकसान तो बीएमसी के चुनाव में ही झेलना पड़ सकता है।
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