जानिए, यूपी की पॉलिटिक्स में 'MBSC'की क्यों बढ़ गई है अहमियत?

नई दिल्ली- इस चुनाव में सभी बड़ी राजनीतिक पार्टियां यूपी में अति-पिछड़ी जातियों (most backward castes) को काफी ज्यादा अहमियत दे रही हैं। प्रदेश में 76 मोस्ट बैकवॉर्ड सब-कास्ट (most backward sub-castes-MBSC) हैं, जो कई लोकसभा क्षेत्रों में अहम रोल निभा ही नहीं सकते, बल्कि चुनाव नतीजे भी तय कर सकते हैं। अगर आबादी के आधार पर देखें तो उत्तर प्रदेश में पिछड़ी जातियों (Backward castes) की जनसंख्या (Poplation) 51% है। लेकिन, सच्चाई ये है कि अब तक यादव और कुर्मियों ने ही सरकारी नौकरियों से लेकर सियासत तक में अपना जलवा दिखाया है। जबकि, बाकी पिछड़ी जातियों (Backward castes) को अभी भी उनका वाजिब हिस्सा नहीं मिल पाया है। हालांकि, अब सभी पार्टियां इनकी चुनावी हैसियत को समझकर उन्हें अपने साथ जोड़ने का प्रयास कर रही हैं। इनमें से जिन जातियों में कोई कद्दावर नेता उभरा है, उसने मौके का खूब फायदा भी उठाया है। यह सिलसिला जारी है और ऐसी बाकी जातियों में भी दूसरों से डील करने के लिए नए-नए नेताओं के उभरने का सिलसिला शुरू है और बड़ी पार्टियां उनसे हर तरह की डील करने को मजबूर हो रही हैं।

क्या कहते हैं आंकड़े?

क्या कहते हैं आंकड़े?

यूपी में जो पिछड़ी जातियां (Backward castes) हैं, उनमें जनसंख्या के हिसाब से यादव और कुर्मियों की संख्या ज्यादा है। टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक राज्य में 19.40% यादव हैं और 7.5% कुर्मी। इनके अलावा 4.8% लोध, 4.4% गड़ेरिया-पाल बघेल, 4.3% केवट-मल्लाह-निषाद, 4.1% मोमिन-अंसार, 4% तेली, साहु शामिल हैं। इन अति-पिछड़ी जातियों (most backward castes) में कुम्हार-प्रजापति, कहार-कश्यप, कुशवाहा-शाक्य, हज्जाम-नाई, राजभर, विश्वकर्मा-बढ़ई, मौर्या, लोहार, कोइरी, धुनिया, माली, सैनी और दर्जी जैसी अति-पिछड़ी जातियां-उपजातियां भी शामिल हैं। जबकि, बाकी 55 उप-जातियों की कुल जनसंख्या करीब 1% है। ये आंकड़े 2001 में यूपी की ग्रामीण जनसंख्या के फैमिली रजिस्टर से जुटाई गई हैं।

अबतक सरकारों का प्रयास

अबतक सरकारों का प्रयास

यूपी में अति-पिछड़ी जातियों (most backward castes) की सामाजिक-राजनीतिक स्थिति का पता लगाने के लिए सबसे पहले राजनाथ सिंह ने 2001 में मुख्यमंत्री रहते हुए प्रयास किया था। उन्होंने सोशल जस्टिस कमेटी (Social Justice Committee) बनाई थी, जिसके मुताबिक आजादी के बाद से राज्य की 79 अति-पिछड़ी जातियों (most backward castes) में से 75% क्लास वन जॉब्स (Class One jobs) सिर्फ यादवों और कुर्मियों को ही मिले। इसी के कारण यादवों और कुर्मियों ने सरकारी नौकरियों के अलावा राजनीति में भी अपना दबदबा कायम कर लिया। 2016 में अति-पिछड़ी जातियों (most backward castes) के लिए कोटा के भीतर कोटा तय करने के लिए एक और पैनल बनाया गया। इस पैनल ने 2018 में पाया कि राज्य में आरक्षण का फायदा वर्चस्व वाली जातियों ने ही उठाया है। लेकिन, इन दोनों कमेटियों के सुझावों को दबदबे वाली पिछड़ी जातियों (dominant backward castes) के दबाव में दबा दिया गया।

रिझाने की रणनीति

रिझाने की रणनीति

आरक्षण में अति-पिछड़ों को उनका वाजिब हक दिलाने की कोशिशों में भले ही अड़ंगा डाला गया हो, लेकिन चुनाव में उनका वोट बटोरने के लिए अब लगभग हर पार्टियां हाथ पैर मार रही हैं। 2014 और 2017 के चुनावों में बीजेपी ने इन जातियों की सियासी ताकत को समझा था। उन्हें अपने साथ जोड़ने के लिए सोशल इंजीनियरिंग (social engineering) का गणित बिठाया और उसे कामयाबी भी मिली थी। इस चुनाव में भी बीजेपी अपनी उसी रणनीति पर आगे बढ़ी है। उदाहरण के लिए इस बार बीजेपी ने 4 निषाद और 4 मौर्या-कुशवाहा उम्मीदवारों को टिकट दिया है। मौजूदा योगी आदित्यनाथ की सरकार में 4 कैबिनेट और 4 राज्यमंत्री अति-पिछड़ी जातियों (most backward castes) से हैं। चुनाव से पहले भाजपा ने लखनऊ में इन पिछड़ी जातियों का कई सम्मेलन भी आयोजित करवाया है। समाजवादी पार्टी ने भी इस बार 3 निषादों, 1 बिंद और 1 कुशवाहा प्रत्याशियों पर दांव लगाया है। पूर्वी उत्तर प्रदेश के 6 जिलों और दोआब इलाके में निषादों का काफी दबदबा है। मुलायम सिंह यादव ने इनकी सियासी हैसियत को दो दशक पहले ही भांप लिया था। उन्होंने दो बार 1996-1998 में मिर्जापुर से बैंडिट क्वीन फूलन देवी को टिकट दिया था। समाजवादी पार्टी की ओर से प्रवीण निषाद ने ही पिछले साल गोरखपुर उपचुनाव में योगी के गढ़ में बीजेपी को हराया था। हालांकि, अबकी बार प्रवीण भाजपा की टिकट पर संत कबीर नगर से चुनाव लड़ रहे हैं और उनके पिता की निषाद पार्टी भाजपा को सहयोग कर रही है।

लीडरशिप की दिक्कत

लीडरशिप की दिक्कत

समय के साथ अति-पिछड़ी जातियां (most backward castes) भी गोलबंद हुई हैं और उन्होंने अपने राजनीतिक महत्त्व को समझा है। लेकिन, जिस तरह से यादवों में मुलायम, लोध में कल्याण सिंह और कुर्मियों में विनय कटियार जैसे सर्वमान्य नेता बनकर उभरे हैं, वैसा इन जातियों में अभी तक नहीं हो पाया है। अलबत्ता, अपना दल (Apna Dal) की अनुप्रिया पटेल और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (Suheldev Bharatiya Samaj Party) के ओम प्रकाश राजभर जैसे जाति विशेष के नेताओं को हाल के दिनों में सत्ता का स्वाद चखने का मौका जरूर मिला है। अनुप्रिया पटेल जहां भाजपा के साथ मिलकर चुनाव लड़ रही हैं, वहीं ओम प्रकाश राजभर ने भाजपा से लड़कर राज्य की 39 सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े किए हैं। वैसे उनकी पार्टी यूपी सरकार में सहभागी भी है और वो खुद मंत्री भी बने बैठे हैं। लेकिन ज्यादातर अति-पिछड़ी जातियां (most backward castes) में सर्वमान्य नेताओं का अभाव है, जिससे न तो उन जातियों को उस तरह से सत्ता में हिस्सेदारी मिल पाई है और न ही वो बड़ी पार्टियों के साथ वोटों के लिए तोल-मोल करने की स्थिति में ही आ पाए हैं। लेकिन, फिर भी वे किसी न किसी अति-पिछड़ी जाति (most backward castes) के नेताओं के प्रभाव में हैं और उसी के हिसाब से चुनाव में उम्मीदवारों का समर्थन कर रहे हैं। भारतीय जनता पार्टी मानकर चलती है कि अति-पिछड़ी जातियों (most backward castes) में उसका अपना एक जनाधार बना हुआ है।

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