नरेंद्र मोदी का रवैया इंटरव्यू में नरम क्यों दिखा: नज़रिया

नरेंद्र मोदी
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नए साल की शुरुआत हुई है और यह चुनावी साल भी है. ऐसे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एलेक्शन मोड में आ चुके हैं.

ये आक्रामक प्रचार वाला साल होगा, इसलिए नरेंद्र मोदी ने इसकी शुरुआत ही राजनीतिक बयानबाज़ी से की है.

इस साल लोकसभा चुनाव होंगे. ऐसे में सबसे पहले साल के पहले दिन ही अपना संदेश लोगों तक पहुंचाना, इस विधा में नरेंद्र मोदी माहिर हैं.

वो जानते हैं मीडिया का कब और कितना इस्तेमाल करना है. वो एक बेहतर कम्यूनिकेटर हैं. मैं समझती हूं कि एक जनवरी का चयन करना उनकी स्ट्रैटेजी का हिस्सा होगा.

जहां तक रही राम मंदिर पर कानूनी प्रक्रिया पूरी होने के बाद अध्यादेश लाने की तो मैं यह नहीं समझती हूं कि वो इससे पीछे हटेंगे. यह उनका दोहरा रवैया भी हो सकता है, क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हर परिस्थिति में अलग-अलग बातें करते हैं.

जब हिंदूत्व की बात आती है तो वो कुछ और बोलते हैं.

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आक्रामकता में आई कमी

जिस तरह से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इंटरव्यू के दौरान पेश आए, वो ग़ौर करने वाली बात थी. वो थोड़े विनम्र दिखे. उनकी आक्रामकता कम दिखी, जो अन्य भाषणों या फिर बातचीत में देखी जाती थी.

वो रैलियों में एक दबंग की तरह पेश आते हैं. वो 56 इंच की छाती का जिक्र करते हैं, वो कड़वे लहज़े का इस्तेमाल करते हैं. लेकिन एएनआई को दिए इंटरव्यू में वो बहुत कठोर नज़र नहीं आए. वो सॉफ़्ट स्पोकेन थे.

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वो इस तरह से मिडिल क्लास और शहरी वोटर को आकर्षित करने की कोशिश करते दिखे. कई राज्यों में हार के बाद भाजपा को इस बात का एहसास है कि कट्टर हिंदूत्व से उनकी बात बहुत ज़्यादा नहीं बनने वाली है.

जिस तरह से गौरक्षा के नाम पर हिंसा हो रही है, बुलंदशहर में जो घटना घटी है, नसीरुद्दीन शाह ने जिस तरह से अपने डर का जिक्र किया है, इन सबने भाजपा को कहीं-न-कहीं प्रभावित किया है.

ये डर मिडिल क्लास लोगों के मन में घर कर रहा है, ऐसे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस डर को निकालने की कोशिश करते दिखे और अपने हिंदूत्ववादी एजेंडे को अलग रख कर उन्होंने बात की.

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रवैया नरम क्यों पड़ा?

नरेंद्र मोदी ने अपने इंटरव्यू में तीन राज्यों में पार्टी की हार स्वीकार की. वो समझ चुके हैं कि आक्रामक रवैया अब काम नहीं कर रहा है.

इसलिए उनका रवैया अब बदल रहा है. वो इंटरव्यू में नरम दिखे, जबकि चुनावों से पहले राजस्थान की एक रैली में उन्होंने सोनिया गांधी को विधवा तक कह दिया था.

वो इस बात को समझ रहे हैं कि उनके बोलने के तरीके से लोग खीझ रहे हैं और अब यह उनको बहुत मदद नहीं कर पाएगा.

मोदी ने अपने इंटरव्यू में यह भी बताया कि उनके कांग्रेस मुक्त भारत के नारे का मतलब क्या था. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने हालिया चुनावों में जीत के बाद कहा था कि वो भाजपा मुक्त भारत नहीं चाहते हैं.

राहुल गांधी पहले से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर यह आरोप लगाते आए हैं कि वो नफरत की बात ज़्यादा करते हैं. यह कुछ मौके थे जिन्होंने शायद मोदी को विचार करने पर मजबूर किया होगा.

तीन राज्यों में जब मुख्यमंत्रियों का शपथ ग्रहण समारोह हो रहे थे, तो उन सभी समारोहों में भाजपा के नेताओं ने शिरकत की.

उनके राहुल गांधी के साथ नरम व्यवहार की तस्वीरें भी सोशल मीडिया पर शेयर की गई.

शायद यही वो वजहें होंगी कि मोदी अपना रवैया बदलते नजर आ रहे हैं.

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राहुल इफेक्ट

राहुल गांधी की छवि भी इन दिनों बदली है. वो एक परिपक्व नेता के रूप में उभरे हैं. भाजपा अक्सर कहती रही है कि राहुल अभी भी सीख ही रहे हैं.

उन्होंने खुद संसद में स्वीकार किया था कि भाजपा उन्हें पप्पू कहती है और उन्हें कोई फ़र्क नहीं पड़ता है. इसके बाद वो अपनी सीट से उठकर प्रधानमंत्री को गले भी लगा आए.

मेरी समझ से इस सबने नरेंद्र मोदी को बदलने के लिए मजबूर किया होगा, क्योंकि प्रेम कहीं न कहीं लोगों के मन को प्रभावित करता है.

नरेंद्र मोदी का यह नरम रवैया कितने दिन कायम रहेगा, इस बारे में भी कुछ कहा नहीं जा सकता है क्योंकि चुनावी माहौल में चीज़ें बदलती हैं.

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