कुत्तों की वजह से विवादों में क्यों आई नगालैंड सरकार, जानिए वजह

नई दिल्ली- पिछले हफ्ते नगालैंड सरकार ने राज्य में कुत्ते की मीट के कारोबार पर रोक लगा दी थी। नगालैंड से पहले इसी तरह का फैसला उत्तर-पूर्व के एक और राज्य मिजोरम भी ले चुका है। लेकिन, नगालैंड कैबिनेट के फैसले को लेकर वहां जोरदार बहस छिड़ी हुई है। इस मामले में लोग पूरी तरह दो विचारों में बंटे नजर आ रहे हैं। एक तरफ सरकार के फैसले की जमकर तारीफ हो रही है तो दूसरी तरफ इसे स्थानीय लोगों के लोकतांत्रिक अधिकारों का उल्लंघन बताया जा रहा है। सोशल मीडिया पर भी लोग इसको लेकर बहुत ज्यादा बहस कर रहे हैं और राय पूरी तरह से बंटी हुई है।

कुत्तों की वजह से विवादों में नगालैंड सरकार

कुत्तों की वजह से विवादों में नगालैंड सरकार

नगालैंड में इन दिनों राज्य सरकार के एक आदेश को लेकर बहस छिड़ी हुई है। आदेश है कुत्ते की मीट पर पाबंदी का। राज्य सरकार ने प्रदेश में कुत्ते के 'कच्चे और पके' सभी तरह की मीट के कारोबार पर बैन लगा दिया है। बहस इस बात को लेकर हो रही है कि कुत्ते की मीट खाने पर पाबंदी लगाने वाला आदेश लोकतांत्रिक है या नहीं। जहां एक तरफ नगालैंड सरकार के इस कदम को लेकर उसकी खूब वाहवाही हो रही है तो दूसरी ओर उतने ही सख्त अंदाज में इस फैसले का यह कहकर विरोध भी हो रहा है कि लोगों से उनकी खाने-पीने के तरीकों की आजादी छीनी जा रही है। पेट लवर्स इसकी यह कहकर सराहना कर रहे हैं कि कुत्ते की मीट खाए बिना भी नागा लोग जी सकते हैं, जबकि दूसरा धरा इस आदेश को नासमझी भरा कदम बता रहा है। उसका कहना है कि सरकार के आदेश से क्या होता है, सीधे नहीं तो चोरी-छिपे तो ये आदत बदलने वाली नहीं है। इसके लिए वह नगालैंड की शराबबंदी कानून का हवाला दे रहे हैं।

नागाओं की संस्कृति से जुड़ा है मसला ?

नागाओं की संस्कृति से जुड़ा है मसला ?

वहीं नागाओं की अपनी अलग राय है। नागा कुत्ते की मीट खाने की आदत को अपनी संस्कृति से जोड़ते हैं। एक नागा विद्वान ने अपना नाम नहीं जाहिर करने की शर्त पर बताया कि यह उनके परंपरागत अधिकारों का उल्लंघन है। इनमें से कुछ लोगों का ये भी कहना है कि सरकार ने बिना राय-विचार किए जल्दबाजी में ऐसा फैसला कर लिया है। नगालैंड के एक पीस ऐक्टिविस्ट गुगु हरालु कहती हैं, 'राज्य सरकार के द्वारा चर्चा होनी चाहिए थी, क्योंकि भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में रहते हुए, लोगों को बहस का अवसर मिलना चाहिए था और चर्चा होनी चाहिए थी कि पाबंदी की जरूरत क्यों है।' उन्होंने ये भी कहा कि 'मैं एक पेट लवर हूं और इसलिए मैं कुत्ते की मीट नहीं लेती हूं। हालांकि, सरकार को लोकतात्रिक तरीके से विस्तार से चर्चा करना चाहिए था। लेकिन, उन्होंने बहुत ही जल्दीबाजी में फैसला कर लिया।'

सोशल मीडिया पर भी चल रही है बहस

सोशल मीडिया पर भी चल रही है बहस

कुछ लोगों ने जानवरों के साथ दरिंदगी को लेकर सोशल मीडिया पर भी सवाल उठाए हैं। उनका कहना है, 'जानवरों के साथ निर्ममता गलत है। कुछ नैतिक नियम भी होने चाहिए, लेकिन बाहरी पुलिस वालों की मदद से स्थानीय और मूल निवासियों के खाने-पीने पर नियंत्रण करने से समस्याएं पैदा हो सकती हैं।' कुछ लोगों का ये भी नजरिया है कि कारोबारी स्तर पर बाहर से मंगवाने पर बैन लगाना मंजूर हो सकता है, लेकिन स्थानीय स्तर पर कुत्ते की मीट बेचने पर पाबंदी लगाना स्थानी लोगों की खाने की आदतों को छीनना है। यैमी जगोई कहते हैं, 'यह एक संवेदनशील मामला है। लेकिन, मैं तो मीट के लिए घर के सदस्यों की तरह रहने वालों कुत्तों को मारने के बारे में सोच भी नहीं सकता। मेरे लिए इसके बारे में सोचना भी पीड़ादायक है।'

मिजोरम में पहले ही लग चुकी है बैन

मिजोरम में पहले ही लग चुकी है बैन

बता दें कि इसी वर्ष मार्च में नगालैंड से पहले मिजोरम में भी कुत्तों को मारने पर रोक लगा दी गई थी। इसके बाद 3 जुलाई को नगालैंड सरकार ने कुत्ते के मांस की खरीद-बिक्री पर पाबंदी लगा दी थी। यह फैसला राज्य कैबिनेट ने लिया था और प्रदेश के मुख्य सचिव तेमजन टॉय ने खुद ट्वीटर करके इसकी जानकारी दी थी।

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