कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद भी गांधी परिवार की परछाई से बाहर क्यों नहीं निकल पा रहे मल्लिकार्जुन खड़गे?
मल्लिकार्जुन खड़गे के कांग्रेस अध्यक्ष बने हुए सात महीने हो चुके हैं। लेकिन, कांग्रेस में अभी तक वह अपनी व्यस्थित टीम नहीं बना पाए हैं। अगले साल लोकसभा का चुनाव होना है। ऐसे में कांग्रेस नेताओं के बीच थोड़ी सी बेचैनी और अनिश्चितता वाला माहौल पैदा होना स्वाभाविक है।
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के पद संभालने के सात महीने गुजर चुके हैं, लेकिन उनके पास न तो कांग्रेस वर्किंग कमेटी की टीम ही है और न ही एआईसीसी सचिवालय। जबकि, फरवरी में ही एआईसीसी के रायपुर अधिवेशन में उन्हें नई सीडब्ल्यूसीट टीम को नामित करने के लिए अधिकृत भी कर दिया गया था।

असामान्य देरी से पार्टी में असमंजस की स्थिति
ईटी की एक रिपोर्ट के मुताबिक खड़गे अभी सोनिया गांधी के कार्यकाल के दौरान नामित एआईसीसी महासचिवों वाली टीम से ही काम चला रहे हैं। कांग्रेस नेताओं के बीच इनकी नियुक्तियों में असामान्य देरी को लेकर असमंजस की स्थिति पैदा होना स्वाभाविक है। दूसरी तरफ संगठन में विभिन्न पदों पर बैठने के लिए लॉबिंग को भी बल मिला रहा है।
गिनी-चुनी नियुक्तियां ही कर पाए हैं खड़गे
संगठन के पुनर्गठन को ठंडे बस्ते में डालकर खड़गे अभी तक यही कर पाए हैं कि एक एआईसीसी महासचिव, दो एआईसीसी इंचार्ज और कुछ प्रदेश कांग्रेस अध्यक्षों की नियुक्ति की है। पार्टी के अंदर के लोगों का कहना है कि इन नियुक्तियों पर चर्चा चल रही है। लेकिन, राहुल गांधी और सोनिया गांधी अभी विदेश में हैं और उम्मीद जताई जा रही है कि उनके आने के बाद इनके नामों का ऐलान हो सकता है।
पार्टी में सुरक्षित खेलना चाहते हैं खड़गे!
लेकिन, इन वजहों से कांग्रेस के अंदर इस तरह की चर्चा को भी हवा मिल रही है कि पार्टी अध्यक्ष के पद पर अपनी पकड़ जमाने और पूरे अधिकार का इस्तेमाल करने के बजाए खड़गे फिलहाल कोई भी जोखिम नहीं लेना चाहते और सुरक्षित खेलना चाहते हैं, ताकि किसी तरह का विपरीत संदेश न चला जाए!
महत्वपूर्ण बैठकों में होते हैं राहुल के साथ
एक कांग्रेस अध्यक्ष की भूमिका में खड़गे ट्विटर पर और मीडिया को बयान देने में जरूर काफी सक्रिय नजर आते हैं। राहुल गांधी की तर्ज पर मोदी सरकार के खिलाफ हल्ला बोलने का रोल वह बखूबी निभा रहे हैं। लेकिन, जब भी पार्टी की कोई महत्वपूर्ण बैठक होती है तो राहुल गांधी के साथ ही नजर आते हैं।
गांधी परिवार की परछाई से बाहर क्यों नहीं निकल पा रहे खड़गे?
जब राजस्थान कांग्रेस में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और पूर्व उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट के बीच का घमासान दिल्ली दरबार में पहुंचा था तब भी उनके साथ राहुल गांधी भी उपस्थित थे। इसी तरह बीजेपी-विरोधी विपक्षी दलों के साथ चर्चा में भी वह राहुल के साथ ही थे। सबसे बड़ी बात की पटना में नीतीश कुमार ने जो विपक्षी दलों की महाबैठक बुलाई है और सभी पार्टी अध्यक्षों से पहुंचने की गुजारिश की है, उसमें भी मल्लिकार्जुन खड़गे के साथ राहुल गांधी भी मौजूद रहने वाले हैं।
पार्टी संविधान से अलग राह पकड़ने को क्यों मजबूर हैं खड़गे?
जबकि, कांग्रेस संविधान में ऐसा कोई भी प्रावधान नहीं है, जिसके तहत पार्टी के किसी भी महत्वपूर्ण निर्णय-निर्माण में पूर्व अध्यक्षों के लिए कोई विशेषाधिकार की व्यवस्था की गई हो। रायपुर अधिवेशन में जो थोड़ा-बहुत बदलाव भी किया गया है, उसमें भी सिर्फ यह प्रावधान शामिल किया गया है कि कांग्रेस के पूर्व अध्यक्षों और पूर्व-प्रधानमंत्रियों को सीडब्ल्यूसी में स्थाई सदस्यता दी गई है।
'यह व्यवस्था हमारे लिए न्यू नॉर्मल है'
कांग्रेस अध्यक्ष के इस नए कार्यकाल को लेकर एक वरिष्ठ पार्टी नेता ने चुटकी लेते हुए कहा, 'तात्कालिक व्यवस्था हमारे लिए न्यू नॉर्मल है। क्या 2022 के मध्य तक कांग्रेस ने बिना नियमित अध्यक्ष के तीन साल से ज्यादा समय तक काम नहीं किया? फिर हम शीर्ष पर एक उचित संगठनात्मक टीम के बिना चुनावों में मोदी और बीजेपी के खिलाफ तैयारी क्यों नहीं कर सकते.....।'
गौरतलब है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में जब राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस बुरी तरह हारी तो राहुल गांधी ने पार्टी की अध्यक्षता छोड़ दी और सोनिया गांधी तीन साल से ज्यादा समय तक कार्यकारी अध्यक्ष की भूमिक निभाती रहीं। लेकिन, राहुल गांधी ही हमेशा पार्टी में सर्वेसर्वा की तरह नजर आते रहे हैं।












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