बदलाव के दौर में भारत की राजनीति

पहले लालू प्रसाद यादव का मामला
एक समय भारतीय राजनीत का एक जाना पहचाना चेहरा रहे लालू प्रसाद यादव, जिनका राजनीति में उदय कांग्रेस का बिहार में पतन होने के साथ ही हुआ, विशेषरूप से 1989 में हुए भागलपुर दंगों के बाद, जब भारत की सबसे पुरानी पार्टी ने अल्पसंख्यकों की नजर में अपनी अहमियत खो दी। ऐसे में सोशल इंजीनियरिंग और अल्पसंख्यकों के लिए लालू यादव एक मसीहा के रूप में उभरे, वहीं लाल कृष्ण आडवाणी की गिरफ्तारी ने भी उन्हें एक धर्मनिरपेक्ष के रूप में स्थापित कर दिया। इसके अलावा इसी पीढ़ी के अन्य नेताओं जैसे मुलायम सिंह यादव, नीतीश कुमार और मायावती ने भी इसी फार्मूले पर अपनी पार्टी का आधार रखा। जिसमें से पहले तो उन्होने हासिये पर पड़े लोगों को अपने साथ जोड़ा और फिर धर्मनिरपेक्ष चेहरे के साथ अल्पसंख्यकों को एक राजनीतिक विकल्प दिया।
भाजपा एक धुर विरोधी के रूप में
इस दौरान इन सभी पार्टियों के लिए भाजपा का एक 'धुर विरोधी' के रूप में होना सामान्य बात थी, जिसमें एक सेकुलर मुखौटे के साथ अल्पसंख्यकों के लिए कांग्रेस के अलावा क्षेत्रीय पार्टियां एक विकल्प बनीं।
बदलाव का दौर
देश में उदारीकरण की शुरूआत के बाद से ही एनडीए की सरकार बनी जिसके नेता उदारवादी छवि वाले अटल बिहारी बाजपेयी थे। जिनके नेतृत्व में भाजपा ने खुद को एक विकासोन्मुखी पार्टी के रूप में स्थापित किया। इसके साथ ही स्थानीय पार्टियां राष्ट्रीय स्तर पर हस्तक्षेप करने लगी। लालू पर निर्णय के बाद मुलायम भी मुश्किल मेंलोकसभा चुनाव आने के पहले जहां लालू प्रसाद यादव का प्रभाव कम होने के पूरे आसार हैं वहीं मुलायम भी पशोपेश में है। उनके पास एक निश्चित वोट बैंक है लेकिन उनका अस्तित्व अब भी मुश्किल में हैं। उन्होने अयोध्या में राम जन्मभूमि मुद्दे पर संभावित विवाद को तो रोंका लेकिन मुजफ्फरनगर में हुए दंगे को नहीं रोंक सके। इस दौरान मुलायम ने मुख्यमंत्री अखिलेश को अपनी सेकुलर छवि बचाकर रखने के संकेत दिये, अब उनका यह दांव कितना काम आएगा ये तो वक्त ही बताएगा।
अभी हाल ही में भाजपा के साथ अपना 17 साल पुराना गठबंधन तोड़ने वाले नीतीश भी चारा घोटाले मामले में सवालों के घेरे में हैं। ऐसे में कहा जा सकता है कि मोदी ने ही खुद को समय के साथ बदला। जिनका कहना है कि सेकुलर या कम्युनल नहीं बल्कि देश का विकास ही भारत का भविष्य निर्धारित कर सकता है। उन्होने अपने भाषणों में हिंदुत्व से ज्यादा विकास पर जोर दिया। जबकि अन्य नेता खुद में बदलाव नहीं ला सके।












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