दिल्ली यूनिवर्सिटी में एडहॉक टीचर्स की दुनिया क्यों हिल गई है?

दिल्ली यूनिवर्सिटी में 2022 की दूसरी छमाही से ही एडहॉक टीचर्स की स्थायी नियुक्ति के लिए इंटरव्यू चल रहे हैं. इंटरव्यू में कई ऐसे एडहॉक टीचर्स नाकाम रहे हैं, जो पिछले दस-पंद्रह साल से अपने विषय पढ़ा रहे थे.

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  • दिल्ली यूनिवर्सिटी में फ़िलहाल 4000-4500 स्थायी शिक्षक भर्ती होने हैं
  • अब तक इन पदों पर एडहॉक शिक्षक पढ़ाते आ रहे हैं
  • डीयू में टीचिंग वर्कफोर्स में लगभग 40 फीसदी एडहॉक
  • मौजूदा भर्ती प्रक्रिया के तहत 2000 स्थायी शिक्षक बहाल
  • भर्ती प्रक्रिया के अपारदर्शी होने के आरोप लगाए जा रहे हैं
  • सालों से पढ़ा रहे एडहॉक शिक्षकों का कहना है कि उन्हें हटाया जा रहा है
  • इन शिक्षकों का आरोप है कि उन्हें दो-तीन मिनट के इंटरव्यू में खारिज किया जा रहा है
  • भर्ती में एक खास विचारधारा के लोगों को तवज्जो देने के आरोप
  • अचानक हटाए जाने से एडहॉक शिक्षकों में दहशत का माहौल, कई अवसाद के शिकार

दिल्ली यूनिवर्सिटी के 'हिंदू कॉलेज' में पिछले छह साल से 'एडहॉक' टीचर के तौर पर फिलॉसॉफी पढ़ाने वाले समरवीर सिंह 26 अप्रैल को पीतमपुरा के अपने फ्लैट में मृत पाए गए.

मीडिया रिपोर्टों में कहा गया कि उन्होंने ख़ुदकुशी कर ली थी.

इन रिपोर्टों के मुताबिक़ स्थायी टीचर्स की बहाली के लिए हो रहे इंटरव्यू में समरवीर को अयोग्य घोषित कर दिया गया था.

उनके दोस्तों का कहना है कि इंटरव्यू में नाकाम होने के बाद उनका एडहॉक टीचर का कॉन्ट्रैक्ट ख़त्म हो गया था. इससे वह अवसाद में थे.

समरवीर का इंटरव्यू फ़रवरी के पहले सप्ताह में हुआ था. लेकिन इसमें नाकाम घोषित कर दिए जाने के बाद वो अवसाद में रहने लगे थे.

बाहरी दिल्ली के डीसीपी हरेंद्र के. सिंह ने 'द हिंदू' से कहा कि समरवीर सिंह की नौकरी चली गई थी और इसलिए वह परेशान थे.

'खास नेटवर्क के लोगों को मिल रही स्थायी नौकरी'

समरवीर सिंह ने अपने दोस्तों से कहा था कि स्थायी शिक्षकों के पद पर उनसे कम योग्यता वाले शिक्षकों को रखा जा रहा है.

उन्होंने स्थायी शिक्षकों की भर्ती एक 'ख़ास नेटवर्क' के ज़रिये होने की शिकायत की थी.

मूल रूप से राजस्थान के रहने वाले समरवीर हिंदू कॉलेज के अपने स्टूडेंट्स और साथी टीचर्स के बीच काफ़ी लोकप्रिय थे.

उनके छात्रों का कहना है कि वह अच्छा पढ़ाते थे.

उनके कुछ सहयोगियों का कहना है, वह इतना क़ाबिल थे कि उन्हें विभाग का ज्यां पॉल सात्र (मशहूर दार्शनिक) कहते थे.

लेकिन इंटरव्यू में उन्हें स्थायी शिक्षक के पद पर बहाली के योग्य नहीं समझा गया.

दोस्तों के मुताबिक़ एडहॉक पर पढ़ाने का कॉन्ट्रेक्ट ख़त्म होने के बाद समरवीर इतने डिप्रेशन में चले गए थे कि उन्होंने उनके टेक्स्ट मैसेज और कॉल का जवाब देना भी बंद कर दिया था.

दिल्ली यूनिवर्सिटी में 2022 की दूसरी छमाही से ही एडहॉक टीचर्स की स्थायी बहाली के लिए इंटरव्यू चल रहे हैं. लेकिन इंटरव्यू में कई ऐसे एडहॉक टीचर्स नाकाम रहे हैं, जो पिछले दस-पंद्रह साल से अपने विषय पढ़ा रहे थे.

ऐसे शिक्षकों का कहना है कि चयन प्रक्रिया पारदर्शी नहीं है. दस-बारह साल पढ़ाने का अनुभव रखने वालों को सिर्फ़ दो-तीन मिनट के इंटरव्यू के बाद ख़ारिज किया जा रहा है.

कइयों का कहना है कि उनसे कम योग्यता वाले शिक्षकों की बहाली हो रही है. पीएचडी और कई साल पढ़ा चुके शिक्षकों पर अनुभवहीन और कम शैक्षणिक योग्यता वाले लोगों को प्राथमिकता दी जा रही है.

उनका आरोप है कि एक ख़ास राजनीतिक विचारधारा और संगठन से नजदीकी रखने वालों को स्थायी नौकरियां दी जा रही हैं. उनका कहना है कि दिल्ली यूनिवर्सिटी में पिछले दस-पंद्रह साल से पढ़ा रहे एडहॉक शिक्षकों को इंटरव्यू में फेल किया जा रहा है.

इंटरव्यू बोर्ड के लोग अपने पसंदीदा उम्मीदवारों का चयन कर रहे हैं. इनमें से अधिकतर इन एडहॉक शिक्षकों की तुलना में कम योग्य है.

एडहॉक शिक्षकों पर ये कैसी आफत?

दिल्ली यूनिवर्सिटी में 4000-4,500 स्थायी शिक्षकों की भर्ती होनी है. यानी इतने शिक्षक पिछले 10-15 साल से एडहॉक कॉन्ट्रैक्ट पर पढ़ा रहे हैं.

ये तादाद इसलिए बड़ी लग रही है कि पिछले एक दशक से ज़्यादा समय से दिल्ली विश्वविद्यालय में शिक्षकों की स्थायी भर्तियां नहीं हुई हैं.

यूनिवर्सिटी के लगभग हर कॉलेज में पढ़ाई की ज़िम्मेदारी का एक बड़ा हिस्सा इन एडहॉक टीचर्स के सहारे पूरी हो रही है.

एडहॉक शिक्षकों की तनख्वाह असिस्टेंट प्रोफ़ेसर की शुरुआती तनख्वाह के बराबर होती है. लेकिन उन्हें कोई ग्रेच्युटी, पेंशन या फुल मेडिकल अलाउंस नहीं मिलता है.

उनका वेतन भी नहीं बढ़ता. ऐसे शिक्षकों का कॉन्ट्रैक्ट सिर्फ़ चार महीने का होता है. हर चार महीने पर उनके प्रदर्शन की समीक्षा की जाती है और इस आधार पर उनका कॉन्ट्रैक्ट आगे बढ़ाया जाता है.

दिल्ली यूनिवर्सिटी में पिछले 13 साल के दौरान भारी संख्या में एडहॉक टीचर रखे गए लेकिन इनमें से काफ़ी कम लोगों को स्थायी किया गया है.

बाक़ी लोग एडहॉक शिक्षक के तौर पर सालों से इस उम्मीद में पढ़ाते आ रहे हैं कि कभी न कभी उन्हें स्थायी शिक्षक के तौर पर बहाल कर लिया जाएगा.

लेकिन पिछले साल शुरू हुई स्थायी शिक्षकों की नियुक्ति की प्रक्रिया ने बड़ी तादाद में ऐसे शिक्षकों की उम्मीदों को ज़मीन पर ला पटका है.

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नियुक्ति प्रक्रिया में अपारदर्शिता के आरोप

इंटरव्यू में नाकाम रहे समरवीर सिंह के एक दोस्त ने नाम न छापने की शर्त पर बताया,''नियुक्ति की पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता नहीं है. वर्षों से पढ़ा रहे कई एडहॉक टीचर्स को सिर्फ़ दो मिनट के इंटरव्यू में ख़ारिज़ कर दिया गया.''

''दो पदों के लिए 200 लोगों को बुलाया जा रहा है और सरसरी इंटरव्यू लेकर कहा जा रहा है कि आपकी सेवाओं की अब ज़रूरत नहीं है.''

''कई होनहार एडहॉक टीचर्स 'कनेक्शन' न होने की वजह से बड़ी बेरहमी से निकाल बाहर किए गए.''

इंटरव्यू में खारिज़ किए गए कई एडहॉक शिक्षकों ने बीबीसी से कहा कि बड़ी तादाद में ऐसे शिक्षकों को उन कॉलेजों के इंटरव्यू बोर्ड ने नाकाम घोषित कर दिया, जहाँ वो वर्षों से पढ़ा रहे थे. ऐसे ज़्यादातर शिक्षक 40-45 वर्ष की उम्र में पहुंच गए हैं.

समरवीर सिंह के इस दोस्त ने कहा, ''ये शिक्षक अपनी ज़िंदगी का बेहतरीन हिस्सा दिल्ली यूनिवर्सिटी को दे चुके हैं. ज़्यादातर की उम्र 40-45 साल के दायरे में है. और उनके लिए करियर के दूसरे ऑप्शन लगभग बंद हो चुके हैं''.

''उन पर अपने परिवारों का दायित्व है. महानगर में बढ़ते खर्च के बीच कइयों ने लोन पर मकान लिया है. बच्चों की मोटी फीस जा रही है. कइयों के ऊपर अपने बूढ़े मां-बाप का दायित्व है. इस समय उन पर बड़ी भारी चोट पड़ी है.''

''उनकी दुनिया पूरी तरह हिल गई. वे समझ नहीं पा रहे हैं कि क्या करें. कई शिक्षक भारी अवसाद के दौर से गुजर रहे हैं. कुछ का तो नर्वस ब्रेकडाउन तक हो चुका है''

समरवीर के इस दोस्त ने कहा,''मुझे जब कहा गया कि सॉरी, आप इस पद के योग्य नहीं हैं. तो मैं रोना चाहता था. लेकिन रो भी नहीं पाया.''

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सदमे में एडहॉक शिक्षक

बीबीसी ने जब समरवीर के इस दोस्त से बात करने की कोशिश तो उन्हें संयत होने में कम से कम तीन घंटे लगे. उन्होंने कहा, ''मैं इस सदमे से उबर नहीं पाया हूं. मुझे थोड़ा वक़्त दीजिये.''

तीन घंटे के बाद उन्होंने बीबीसी से बात की. समरवीर के इस दोस्त ने बताया, ''एडहॉक टीचर्स चार-चार महीने के कॉन्ट्रैक्ट पर सालों से पढ़ाते आ रहे हैं. स्थायी करने का आश्वासन देकर उनसे लगातार और अतिरिक्त काम कराया जाता है.''

''यहां तक कि उनसे वो काम भी कराए जाते हैं जो नियम के मुताबिक़ उनकी भूमिका के दायरे में नहीं आते हैं.''

उन्होंने कहा, ''हिंदू कॉलेज में फिलॉसॉफी के चार लेक्चरार के पद ख़ाली थे. समरवीर वहां सात साल से अकेले फिलॉसॉफी पढ़ा रहे थे.''

''वो अच्छे शिक्षक थे और छात्रों को उनका पढ़ाना काफ़ी पसंद था. इसके बावजूद चार मिनट के इंटरव्यू के बाद उनसे कहा गया कि कॉलेज को उनकी सेवाओं की अब ज़रूरत नहीं है.''

उनका कहना है कि ये समरवीर के साथ सरासर अन्याय है. सात साल से पढ़ा रहे शिक्षक का चार मिनट के इंटरव्यू से कैसे आकलन किया जा सकता है?

एडहॉक टीचर का कॉन्ट्रैक्ट हर चार महीने में रिन्यू होता है. अगर समरवीर अयोग्य थे तो उनका कॉन्ट्रैक्ट इतने साल से कैसे रिन्यू होता रहा.

समरवीर के दोस्त का कहना है कि दिल्ली यूनिवर्सिटी में इस समय स्थायी शिक्षक की नौकरी पाने में सही 'संपर्कों' की भूमिका बड़ी हो गई है.

इन कथित संपर्कों में सभी विचारधारा के लोग हैं. लेफ्ट, राइट और मध्यमार्गी पार्टियों तक के. समरवीर के पास शायद ये 'संपर्क' नहीं थे.

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ओबीसी, दलित आदिवासी कैंडिडेट्स पर ज़्यादा मार

समरवीर के इस दोस्त ने ये भी कहा कि वो ओबीसी समुदाय से आते थे. अमूमन देखा ये जाता है कि ओबीसी, दलित या आदिवासी समुदाय के एकेडेमिक्स के ऐसे संपर्क कम होते हैं, जो उन्हें आगे बढ़ा सकें.

समरवीर के दोस्त ने कहा कि दिल्ली यूनिवर्सिटी में स्थायी शिक्षकों की बहाली के लिए चल रहे इंटरव्यू में ख़ारिज होने वाले ऐसे लोग ज़्यादा हैं.

सोशल मीडिया पर समरवीर की बहन का एक वीडियो वायरल हो रहा है, जिसमें उन्होंने समरवीर की आत्महत्या के लिए हिंदू कॉलेज और डीयू प्रशासन को ज़िम्मेदार ठहराया है. हालांकि बीबीसी इस वीडियो की पुष्टि नहीं कर सका है.

इस वीडियो में वो ये कहते दिख रही हैं, ''जो शख्स योग्य है और अनुभवी है और इतने साल से कॉलेज को ईमानदारी से सेवा दे रहा है, उसे आपने चार-मिनट के इंटरव्यू में ख़ारिज कर दिया''

उन्होंने अपने भाई की आत्महत्या पर कहा, ''ये आत्महत्या नहीं बल्कि एक संस्थागत हत्या है.''

हालांकि हिंदू कॉलेज की प्रिंसिपल अंजू श्रीवास्तव ने बीबीसी से कहा, ''समरवीर का जाना बेहद दुखद है. वो नवंबर 2017 से हिंदू कॉलेज में पढ़ा रहे थे. उनका इंटरव्यू इस साल फ़रवरी के पहले सप्ताह में हुआ था. हमने उनका पूरा सहयोग किया.''

उन्होंने कहा, ''ये कहना ग़लत है कि कैंडिडेट्स को दो-तीन मिनट के इंटरव्यू में ही ख़ारिज कर दिया जा रहा है. हो सकता है कि समरवीर का इंटरव्यू अच्छा हुआ हो लेकिन दूसरे कैंडिडेट्स उनसे ज़्यादा बेहतर निकले.''

अंजू श्रीवास्तव, प्रिंसिपल, हिंदू कॉलेज,डीयू
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अंजू श्रीवास्तव, प्रिंसिपल, हिंदू कॉलेज,डीयू

एडहॉक शिक्षकों में दहशत का माहौल

समरवीर सिंह के एक दोस्त ने कहा इस वक्त एडहॉक टीचर्स में दहशत का माहौल है. दिल्ली यूनिवर्सिटी के ही एक कॉलेज में पढ़ा रहीं एक महिला एडहॉक टीचर को जब स्थायी शिक्षकों के लिए हुए इंटरव्यू में नाकाम घोषित कर दिया गया तो उन्हें एन्जाइटी अटैक आने लगे. उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा.

अब वो फिर अलग-अलग कॉलेजों में इंटरव्यू दे रही हैं. उन्होंने बीबीसी से कहा, ''इस घटना से मेरा आत्मविश्वास हिल गया है.''

दिल्ली यूनिवर्सिटी में पढ़ा रहे शिक्षकों के संगठन दिल्ली टीचर्स इनिशिएटिव (DTI) की समन्वयक डॉ. उमा राग ने बीबीसी से कहा, ''साल 2010 के बाद दिल्ली यूनिवर्सिटी में तेज़ी से एडहॉक टीचर्स रखे जाने लगे. ये तुलनात्मक तौर पर बेहतर सुविधाओं वाले टेंपररी टीचर्स की जगह होने वाली तदर्थ नियुक्तियां थीं.''

{image-"एडहॉक टीचर्स का कॉन्ट्रैक्ट सिर्फ चार महीने का होता है और उन्हें सिर्फ तनख्वाह मिलती है. इस दौरान सिर्फ तीन या चार छुट्टी मिलती है. अतिरिक्त कोई सुविधा नहीं", Source: उमा राग, , Source description: सह-संयोजक, दिल्ली टीचर्स इनिशिएटिव, Image: hindi.oneindia.com}

''अब तो बात एडहॉक टीचर्स से आगे बढ़ गई है. अब गेस्ट टीचर्स रखे जा रहे हैं. जो प्रति लेक्चर 1500 रुपये पर पढ़ा रहे हैं. उन्हें 50 हजार रुपये से ज्यादा सैलरी दी ही नहीं जा सकती. इसलिए उनका वर्किंग लोड कम रखना पड़ता है.

''उनके हिस्से कुछ लेक्चर के टुकड़े बचते हैं. एक तरह से वे फिलर्स का काम करते हैं. इसका असर छात्रों की पढ़ाई पर पड़ता है.''

वो कहती हैं, ''अब पिछले छह महीनों से एडहॉक टीचर्स भी नहीं रखे जा रहे हैं. सिर्फ़ गेस्ट टीचर ही रखे जा रहे हैं. जो दिहाड़ी मज़दूरों की तरह प्रति लेक्चर के हिसाब से पढ़ा रहे हैं. उनकी स्थिति एडहॉक टीचर्स से भी ख़राब है.''

''एडहॉक टीचर्स अपने कॉलेज में स्टाफ काउंसिल की विभिन्न समितियों के और स्टाफ़ एसोसिएशन के मेंबर हो सकते हैं.''

''वो टीचर्स यूनियन डुटा (DUTA) के मेंबर हो सकते हैं. गेस्ट टीचर्स के पास ये अधिकार भी नहीं है और न ही वे स्टाफ एसोसिएशन के सदस्य हो सकते हैं.''

उनके साथ होने वाली किसी ज़्यादती की सुनवाई के लिए उनके पास कोई प्लेटफार्म तक नहीं है इसलिए उनकी स्थिति और अधिक दयनीय है.

''कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि एक गेस्ट शिक्षक एक शिक्षक की न्यूनतम गरिमा का भी वह हक़दार नहीं है.''

दिल्ली यूनिवर्सिटी में इस समय चल रही स्थायी शिक्षकों की बहाली में एक ख़ास विचारधारा के लोगों को तवज्जो देने के आरोपों पर उमा राग ने कहा, ''ऐसा हो रहा है. भर्तियों में एक खास तरह की राजनीति से प्रेरित भाई-भतीजावाद चलाया जा रहा है. एक ख़ास दल और राजनीतिक झुकाव के लोगों का ही चयन हो रहा है. पीएचडी, वर्क एक्सपिरियंस जैसी योग्यताओं को धता बताते हुए राजनीतिक झुकाव के आधार पर नियुक्ति हो रही है.''

उमा राग, सह-संयोजक, दिल्ली टीचर्स इनिशिएटिव
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उमा राग, सह-संयोजक, दिल्ली टीचर्स इनिशिएटिव

उमा राग कहती हैं, ''इस वजह से लोग काफ़ी डरे हुए हैं. उन विभागों में भी जहां-जहां नौकरियां एडहॉक टीचर्स की संख्या से ज्यादा है. सीटों की संख्या ज़्यादा होने के बावजूद लोग इस बात को लेकर आशंकित हैं कि उनका होगा कि नहीं क्योंकि एक ख़ास राजनीतिक विचारधारा के लोगों को तवज्जो दी जा रही है. दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ा रहे सभी एडहॉक शिक्षक इस समय भयानक अवसाद के दौर से गुज़र रहे हैं.''

उमा राग बताती हैं, ''समरवीर जहां पढ़ा रहे थे, वहां चार सीटें थीं लेकिन उन्हें नहीं रखा गया. इसके बावजूद कि वो सात साल से पढ़ा रहे थे. उनका काम बहुत अच्छा था और अपने सहयोगियों और छात्रों में काफ़ी लोकप्रिय थे.''

उमा राग का कहना है कि समरवीर की आत्महत्या पूरी तरह से 'इंस्टिट्यूशनल मर्डर' है.

'यूनिवर्सिटी के स्थायी पतन का रास्ता है ये'

एडहॉक शिक्षकों की इस समस्या को समझने के लिए हमने दिल्ली यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर अपूर्वानंद से बात की.

वह कहते हैं, ''नियम ये है कि अगर आपने किसी को अस्थायी तौर पर शिक्षक नियुक्त किया है तो उसे स्थायी करना होगा. स्थायी पद को अधिक समय तक अस्थायी तौर नहीं पर नहीं भरा जा सकता. वहां स्थायी नियुक्ति करनी होगी. अस्थायी शिक्षकों के कॉन्ट्रेक्ट को रिन्यू करके ही उसे आगे पढ़ाने को नहीं कहा जा सकता.''

''लेकिन ये समस्या पिछले कई साल से दिल्ली विश्वविद्यालय में चली आ रही है. 20 साल से तो मैं देख रहा हूं. स्थायी बहाली तो हो ही नहीं रही थी. कुछ ही कॉलेजों में स्थायी शिक्षकों की नियुक्ति लगातार हुई. लेकिन ज़्यादातर कॉलेजों में अस्थायी टीचर के कॉन्ट्रैक्ट को ही आगे रिन्यू करके काम चलाया जाता रहा है. इसलिए वर्षों से 4,000-4,500 पद ख़ाली रहे.''

अस्थायी शिक्षकों से ही काम चलाते रहने की वजह क्या थी?

प्रोफ़ेसर अपूर्वानंद कहते हैं कि इसकी कोई एक वजह नहीं थी. रोस्टर की समस्या से लेकर रिजर्वेशन लागू करने की नीति की समझ न होने और दूसरी तमाम तरह की वजहों से स्थायी शिक्षकों की नियुक्ति का मामला लटकता रहा. विश्वविद्यालय के सामने ऐसी कोई वित्तीय समस्या नहीं थी कि स्थायी शिक्षकों की बहाली न की जा सके.

{image-"यूनियन के कर्ता-धर्ताओं ने एडहॉक टीचर्स को भी अपना वोटर बनाया. इन लोगों ने अस्थायी शिक्षकों को ये कह कर अपना समर्थक बनाए रखा कि हम आपकी स्थायी बहाली करवाएंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ.", Source: अपूर्वानंद, Source description: प्रोफेसर, दिल्ली यूनिवर्सिटी, Image: hindi.oneindia.com}

दिल्ली विश्वविद्यालय में स्थायी शिक्षकों की नियुक्ति की बहाली में एक ख़ास राजनीतिक विचारधारा के लोगों को प्राथमिकता दी जा रही है? इस आरोप में कितना दम है?

अपूर्वानंद ने कहा, ''दिल्ली विश्विविद्यालय की राजनीति में लेफ्ट, आरएसएस और कांग्रेस से जुड़े अलग-अलग गुट हैं. जब जो लॉबी मज़बूत रही है, उसने अपने लोगों की नियुक्ति कराई है लेकिन उन्हें एडहॉक ही रखा. कुछ ही स्थायी नियुक्तियां हुईं. ज्यादातर लोग एडहॉक टीचर्स ही बने रहे.''

अपूर्वानंद कहते हैं, ''अब स्थायी नियुक्ति के लिए तीन रास्ते हो गए हैं. चूंकि इस वक़्त केंद्र में बीजेपी की सत्ता में होने की वजह से संघ मज़बूत है. इसलिए संघ की किसी आनुषांगिक इकाई की ओर से आपकी सिफ़ारिश की जाए तो एडहॉक शिक्षक के तौर पर नियुक्ति में मदद मिल सकती है. दूसरा रास्ता ये कि कैंडिडेट प्रिंसिपल की पसंद हो और तीसरा रास्ता ये कि कैंडिडेट चयनकर्ता बोर्ड में शामिल सब्जेक्ट एक्सपर्ट की पसंद हो.''

अपूर्वांनंद के मुताबिक़ इनमें से किसी एक खांचे में फिट न होने वाले कैंडिडेट इंटरव्यू में दो ही मिनट में ख़ारिज हो गए.

बड़ी तादाद में ऐसे उम्मीदवारों ने बताया कि उन्हें दो-तीन मिनट के इंटरव्यू में ही ख़ारिज कर दिया गया. आख़िर दो-तीन मिनट के इंटरव्यू में वर्षों से पढ़ा रहे शिक्षकों की योग्यता का आकलन कैसे हो सकता है?

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अपूर्वानंद कहते हैं कि स्थायी शिक्षकों के लिए हुए इंटरव्यू में नाकाम घोषित कर दिए ज्यादातर लोग अब 35-40 साल के हो गए हैं. इसलिए किसी दूसरी जगह उनके करियर ऑप्शन बंद हो चुके हैं. दूसरी जगह उन्हें नौकरी मिलने की संभावना कम हो गई है. वहां उनका मुक़ाबला नौजवान उम्मीदवारों से होगा.''

''इतने साल से योग्य मान कर पढ़ाने का मौक़ा देने के बाद अब आप अचानक इन्हें अयोग्य मान कर ख़ारिज कर रहे हैं. ये किसकी ज़िम्मेदारी है? कॉलेज की ही ना. देखा जा रहा है कि कुछ ही लोगों में उनकी दिलचस्पी है बाकियों में नहीं. ''

''इंटरव्यू में खारिज कर दिए गए ज्यादातर अस्थायी टीचर्स बदहवास घूम रहे हैं एक कॉलेज से दूसरे कॉलेज में इंटरव्यू देते हुए. लेकिन उनकी सफलता की संभावना कम है. जब किसी अस्थायी शिक्षक को उसी के कॉलेज में स्थायी न किया गया हो तो दूसरे कॉलेजों में तो संभावना और कम हो जाती है. ''

अपूर्वानंद इसे काफी गंभीर मामला बताते हैं.

वो कहते हैं, ''इस परंपरा के तहत अगर आप किसी अयोग्य शिक्षक का चयन करते हैं तो वो अगले 30 साल तक छात्रों को पढ़ाएगा. ऐसे में एक अयोग्य शिक्षक से पढ़ने वाली उन 30 पीढ़ियों का क्या होगा. फिर जब ये शिक्षक प्रोफेसर बनेंगे तो नए शिक्षकों के चयन में भी उनकी भूमिका होगा. ज़ाहिर है वे अपने से कमज़ोर शिक्षकों का चयन करेंगे. ''

अपूर्वानंद, प्रोफेसर, दिल्ली यूनिवर्सिटी

समस्या की जड़ कहां है?

डेमोक्रेटिक टीचर्स फ्रंट की अध्यक्ष नंदिता नारायण ने बीबीसी को बताया कि दिल्ली यूनिवर्सिटी में एडहॉक टीचर्स से जुड़ी समस्या की जड़ कहां है.

उन्होंने बताया, ''दिल्ली यूनिवर्सिटी में जबरदस्ती सेमेस्टर सिस्टम लाया गया. सेमेस्टर सिस्टम में वर्क लोड में बदलाव आता रहता है कि क्योंकि स्टूडेंट्स एक सेमेस्टर में कुछ पढ़ते हैं और दूसरे सेमेस्टर में कुछ और. तो ये एक बहाना बन गया स्थायी नियुक्ति ना करने का. ''

''सरकार की ओर से कोई लिखित आदेश के बगैर ही 2010 से यूनिवर्सिटी में स्थायी शिक्षकों की नियुक्ति बंद कर दी गई. टेंपररी यानी अस्थायी भर्तियां जो लगभग वेतन और सुविधाओं में स्थायी भर्तियों की तरह ही होती थीं वो भी बंद हो गईं. सिर्फ एडहॉक शिक्षक भरे जाने लगे. ''

''एडहॉक टीचर की बहाली में टीचर इंचार्ज और प्रिंसिपल का अहम रोल होता है. इस सिस्टम के जरिये काफी सारे लोग एडहॉक भर्ती किए और ए़डहॉक है. जबकि नियम ये है के एडहॉक टीचर को ज्यादा दिन एडहॉक नहीं रखा जा सकता. यूनिवर्सिटी रूल में लिखा है कि 33 फ़ीसदी से ज्यादा टीचर एडहॉक नहीं होने चाहिए. लेकिन 40 फ़ीसदी से ज्यादा टीचिंग वर्कफोर्स अब यहां एडहॉक है.''

{image-"2008 में टीचर्स की नियुक्ति में ओबीसी आरक्षण लागू हुआ, लेकिन इसके तुरंत बाद स्थायी नियुक्तियां बंद हो गईं. ऐसे में अब ज्यादातर ओबीसी शिक्षक एडहॉक ही रह गए हैं", Source: नंदिता नारायण, Source description: अध्यक्ष, डेमोक्रेटिक टीचर्स फ्रंट, Image: hindi.oneindia.com}

दिल्ली यूनिवर्सिटी में 2013-14 में कुछ स्थायी शिक्षकों की नियुक्ति शुरू हुई थी. 2019 में भी कुछ विभागों में स्थायी नियुक्तियां हुई थीं. लेकिन एडहॉक शिक्षकों की तादाद बहुत ज्यादा है. जो नियुक्तियां हुईं वे बहुत कम हैं.

कुछ मीडिया रिपोर्टों में टीचर्स यूनियन के पदाधिकारियों के हवाले से कहा गया है कि बड़ी तादाद में एडहॉक टीचर्स को हटाया जा रहा है.

हंसराज, रामजस और लक्ष्मीबाई समेत कुछ कॉलेजों में 80 फीसदी तक एडहॉक टीचर्स हटाए गए हैं. टीचर्स यूनियन का कहना है कि रेगुलर सिलेक्शन कमिटी की ओर से चुने गए एडहॉक टीचर्स सालों से पढ़ा रहे हैं. लेकिन अब उन्हें बाहर किया जा रहा है क्योंकि यूनिवर्सिटी कॉन्ट्रैक्ट सिस्टम को स्थायी करना चाहती है.

नंदिता नारायण का कहना है, ''असली गड़बड़ी 2010 के यूजीसी नियम की वजह से हो रही है, जिसमें इंटरव्यू को 100 फीसदी वेटेज दे दिया गया. इससे पहले इंटरव्यू को सिर्फ 20 फ़ीसदी वेटेज दिया जाता था. 80 फ़ीसदी वेटेज पढ़ाने का अनुभव, एकेडेमिक काम, बेहतर शैक्षणिक प्रदर्शन को मिला कर बनाया गया था.

''लेकिन बदली हुई व्यवस्था के तहत 2018 से सिलेक्शन बोर्ड के हाथ में काफ़ी ताक़त आ गई. वे कैंडिडेट को उनके अनुभव, शैक्षणिक योग्यता और एकेडेमिक शोध या काम को दरकिनार कर ख़ारिज कर सकते हैं. इस समय जो इंटरव्यू चल रहे हैं उनमें यही हो रही है.''

नंदिता नारायण, अध्यक्ष डेमोक्रेटिक टीचर्स फ्रंट

क्या कह रहे हैं यूनिवर्सिटी के पदाधिकारी ?

दिल्ली यूनिवर्सिटी में स्थायी शिक्षकों की भर्ती की प्रक्रिया अप्रैल 2022 को शुरू हुई.

यूनिवर्सिटी के रजिस्ट्रार विकास गुप्ता ने बीबीसी को बताया यूनिवर्सिटी में 4000-4500 स्थायी शिक्षकों की नियुक्ति होनी है.अब तक 2000 स्थायी शिक्षक नियुक्त हो चुके हैं.

गुप्ता ने कहा,''हम चाहते हैं कि नियुक्ति की ये प्रक्रिया जल्दी पूरी हो जाए ताकि एडहॉक टीचर्स को चार महीने के कॉन्ट्रैक्ट के नियम से मुक्ति मिले और वे भी सभी सुविधाओं के हकदार बन सकें. लेकिन नियुक्ति प्रक्रिया में तेजी लाना कॉलेजों के हाथ में है.''

दिल्ली यूनिवर्सिटी में नियुक्ति की प्रक्रिया कब तक चलेगी ये तो पता नहीं लेकिन इस बीच इंटरव्यू में नाकाम रहने की वजह से एडहॉक टीचर के कॉन्ट्रैक्ट से भी हाथ धो चुके शिक्षकों में भारी बेचैनी है.

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