बदलते बांग्लादेश को समझना क्यों जरूरी है ? भारत के साथ आगे कैसे होंगे संबंध
बांग्लादेश में पिछले पांच अगस्त को ऐसे हालात बने कि वहां की तत्कालीन प्रधानमंत्री को देश छोड़कर भारत आना पड़ा। छात्रों का एक आंदोलन जो कि एक नए आरक्षण के विरोध में सड़क पर उतरा था। धीरे-धीरे इस रूप में पहुंच गया कि तख्तापलट हो गया। बात यहां तक होती तो इसे दूसरे दृष्टिकोण से देखा जाता। लेकिन जब वहां की बहुसंख्यक आबादी की आड़ में कट्टरपंथियों ने अल्पसंख्यक समुदाय पर हमले करने शुरू कर दिए। तब विश्लेषण अलग तरह से करने की जरूरत है।
बांग्लादेश की एक अलग देश के रूप में कल्पना तब शुरू हुई। जब तत्कालीन पश्चिमी पाकिस्तान के सत्तारूढ़ पजांबी और मुहाजिरों ने पूर्वी पाकिस्तान के बंगालियों को सत्ता में अपने बराबर बैठाने से मना कर दिया। यह समय के साथ आक्रोश और फिर हिंसक युद्ध में बदल गया। जिसमें काफी जानमाल की क्षति भी हुई। अंत में बंग बंधु शेख मुजीबुर रहमान के नेतृत्व में बांग्लादेश का जन्म सन 1971 में हुआ।

अपने इतिहास के करीब 54 साल में बांग्लादेश ने सिविल और सैन्य शासनो के बीच काफी कुछ देखा। कट्टरपंथियों का बढ़ता प्रभाव और सरकारों की तानाशाहियां भी चली। इधर शेख हसीना के तौर तरीकों ने उनको काफी हद तक एक तानाशाह की छवि भी दे दी थी। विपक्ष मौके की तलाश में था और बहुत से लोग यह भी कहते हैं कि कुछ बाहरी ताकतों के हस्तक्षेप से सरकार बदल गयी। मोहम्मद यूनुस को नई सरकार की जिम्मेदारी मिल गयी।
कुल मिलकर अब तक एक हजार से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है। अल्पसंख्यक हिन्दू, बौद्ध, और अन्य समुदायों पर हमलों की जानकारी रोज मिल रही है। भारतीय प्रधानमंत्री ने इस मामले में मोहम्मद यूनुस से बात भी की है। लेकिन बातों का कितना असर हुआ है। वह तो बेचैनी में दिन रात काट रहे वहां के अल्पसंख्यक ही बता सकते है।
अल्पसंख्यक आबादी पर हमला करना कई देशों में एक तरह से हथियार बन चुका है। बांग्लादेश का मामला भी अलग नहीं है। वर्तमान में हम जो देख रहे हैं। उसके अलावा लंबे समय से अल्पसंख्यक आबादी के खिलाफ हिंसा होती रही है। रॉय एवं साथियों के 2023 के शोध में यह पाया कि 2007 से 2021 के बीच कुल 4161 घटनाएं दर्ज की गई हैं। जिनमें 2015 में 1026, 2014 में 692 और 2019 में 573 घटनाएं शामिल हैं। 1992-1993 में सबसे अधिक 2600 बलात्कार की घटनाएं दर्ज की गईं। जबकि 2001 में सत्रह मौतें हुईं और 600 से अधिक लोग घायल हुए।
हिंसा का यह दौर बांग्लादेश के कई जिलों में फैला हुआ था। कई बार हमले पहले से ही योजनाबद्ध होते थे। कई बार अचानक होते थे। यहां तक कि सोशल मीडिया पर फैली एक अफवाह के कारण बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों पर अत्याचार हो जाते हैं। मौजूदा घटनाएं भी इसी तरह की प्रवृत्ति का अनुसरण करती दिख रही हैं।
भारत को अपनी मानवीय और सुरक्षा चुनौतियों का आकलन करते हुए रणनीतिक रूप से सोचना होगा कि वह अपने पड़ोसी के लिए क्या कर सकता है। वह शेख हसीना से पूरी तरह से अलग नहीं हो सकता या खुद को अलग नहीं कर सकता। हालांकि नेतृत्व को 1971 को रोमांचक बनाना भी बंद करना होगा। अल्पसंख्यकों के सवाल को बहुत सावधानी से संबोधित किया जाना चाहिए। क्योंकि एक देश या क्षेत्र में होने वाली घटनाएँ उसके पड़ोसियों तक फैल जाती हैं। कई विद्वानों ने इस बारे में तर्क भी दिए है।
इसके अलावा बांग्लादेश में बदलाव की आंतरिक प्रक्रियाओं में हस्तक्षेप किए बिना भारत की एक बड़ी भूमिका है। इस तथ्य को स्वीकार करते हुए कि बांग्लादेश में संस्थाओं की अपनी स्वायत्ता है। वहां के आबादी में कई धड़े हैं । भारत को यह भी सुनिश्चित करने की जरूरत है कि अगर निकट भविष्य में बांग्लादेश में बीएनपी और जमात सरकार बनाती है तो भारत उनके साथ काम करने में सक्षम हो।
साभार: आशीष सिंह सामाजिक एवं राजनीतिक मामलों के जानकार हैं।












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