कुपोषण और मोटापे के शिकार बच्चों के सामने बेबस क्यों है भारत

कुपोषण के साथ साथ मोटापे की मार क्यों झेल रहे हैं भारतीय बच्चे?
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कुपोषण के साथ साथ मोटापे की मार क्यों झेल रहे हैं भारतीय बच्चे?

नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे - 5 के पहले हिस्से में सामने आया है कि बीते पाँच सालों में भारत के 17 राज्यों और 5 केंद्र शासित प्रदेशों में कुपोषण के साथ साथ ओबेसिटी के मामलों में बढ़ोतरी हुई है.

इन राज्यों में बिहार, असम, आंध्र प्रदेश, गोवा, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, केरल, महाराष्ट्र, मणिपुर आदि शामिल हैं. सर्वे के दूसरे भाग में उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों के आँकड़े जारी किए जाएंगे.

कुपोषण दूर करने की दिशा में लंबे समय से काम कर रहे विशेषज्ञों ने इन आँकड़ों को काफ़ी चिंताजनक बताया है.

सर्वे के नतीजे बताते हैं कि कुपोषण ने बीते पाँच सालों में भारत के 17 राज्यों में एक बार फिर पैर फैलाना शुरू कर दिया है.

उदाहरण के लिए, साल 2015 से 2019 के बीच बिहार में अपनी उम्र के हिसाब से वजन में थोड़ी कमी और ज़्यादा कमी वाले बच्चों की संख्या में वृद्धि हुई है.

छह से 59 महीनों की उम्र वाले खून की कमी वाले यानी एनिमिक बच्चों की संख्या भी 63.5 से 69.4 तक बढ़ गई है.

वहीं, गुजरात जैसे राज्य में एनिमिक बच्चों की संख्या में भारी वृद्धि हुई है. गुजरात में एनिमिक बच्चों की संख्या भी 62.6 से 79.7 तक बढ़ गई है.

इस लिंक के माध्यम से प्रत्येक राज्य के आँकड़ों को देखा जा सकता है. लेकिन सवाल ये है कि कुपोषण में हुई इस वृद्धि की वजह क्या है?

क्या बताते हैं ये आँकड़े?

नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे - 5 के आँकड़े बताते हैं कि बीते पाँच सालों में सेनिटेशन, पेयजल और ईंधन तक लोगों की पहुंच आसान हुई है. लेकिन इसके बावजूद कुपोषण में वृद्धि कई सवाल खड़े करती है.

सवाल ये है कि आख़िर वो क्या वजहें हैं जिनकी वजह से भारत में कुपोषण कम होने की जगह बढ़ता हुआ दिख रहा है.

बिहार में कुपोषण के ख़िलाफ़ संघर्ष करने वाले डॉ. शकील मानते हैं कि ये आँकड़े काफ़ी चिंताजनक हैं.

वे कहते हैं, "कुपोषण के ख़िलाफ़ काम करने वाली सरकारी यहाँ तक की अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं जैसे सयुंक्त राष्ट्र का ध्यान माइक्रोन्यूट्रिएंट्स पर है, ये संस्थाएं इस बात पर जोर देती हैं कि आयोडीन, आयरन या विटामिन ए का ड्रॉप पिलाएं. ऐसे में उनका ध्यान माइक्रोन्युट्रिएंट्स पर है. लेकिन ये समस्या इससे आगे की है क्योंकि आयरन की गोलियां तो यूनिसेफ पचास साल से खिला रहा है. इसके बावजूद एनिमिया 63 फीसदी बच्चों में है. इसका मतलब है कि इस समस्या का तकनीकी समाधान नहीं निकल सकता है. उसकी अपनी सीमाएं हैं.

ऐसे में ज़रूरी है कि आप इसे खाद्य सुरक्षा से जोड़कर देखें. और बिहार जैसे राज्य में खाद्य सुरक्षा की हालत बेहद बुरी है. और कोविड ने इसे पूरी तरह उजागर कर दिया है.

खाद्य सुरक्षा और खाने के सामान में विविधता कुपोषण दूर करने के लिए ज़रूरी है. और ये दोनों ही चीजें सीधे तौर पर व्यक्ति की आय से जुड़ी होती हैं. और आय नहीं होगी तो पोषण मिलना मुश्किल है. बिहार में लगभग 4 करोड़ लोग गरीबी रेखा से नीचे हैं. इसकी तमाम परिभाषाएं हैं लेकिन स्वास्थ्य के नज़रिए से एक सरल परिभाषा ये है कि अगर किसी को दो वक़्त का भरपेट खाना नसीब नहीं हो रहा है तो वह गरीबी रेखा से नीचे है. ऐसे में एक बात ये है कि इस दिशा में बिहार या केंद्र की सरकार की ओर से काम नहीं किया गया."

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नीतिगत परिवर्तनों में खर्च हुआ समय

वहीं, राष्ट्रीय स्तर पर कुपोषण के प्रसार और ज़िम्मेदार कारकों पर लंबे समय से शोध कर रहीं विशेषज्ञ डॉ. श्वेता खंडेलवाल मानती हैं कि इन आँकड़ों में जो कुछ दिख रहा है, उसके लिए एक हद तक केंद्रीय स्तर पर अंजाम दिए गए नीतिगत परिवर्तनों में लगा समय ज़िम्मेदार है.

वे कहती हैं, "ये आँकड़े 2015 से 2019 के बीच के हैं. ऐसे में अभी जिस 5 वर्ष के बच्चे के कुपोषित होने की बात सामने आई है, उसका जन्म 2014-2015 के बीच हुआ होगा. और यहाँ ध्यान देने की ज़रूरत है कि ये वो समय था जब केंद्रीय स्तर पर सत्ता परिवर्तन हुआ था. इसके बाद नीतियों को लेकर काफ़ी बदलाव सामने आए थे.

हमारी नेशनल न्यूट्रिशन पॉलिसी 1993 की है. ऐसे में हम काफ़ी विचार विमर्श कर रहे थे कि इसमें बदलाव करना चाहिए. 2014 से लेकर 2017 तक इस बारे में काफ़ी चर्चा होती रही कि पोषण अभियान का प्रारूप क्या होगा. इस तरह से इस मुद्दे पर काफ़ी ज़्यादा समय खर्च किया गया.

साल 2018 में आख़िरकार पोषण अभियान को लॉन्च किया गया जिसे थोड़ा पहले शुरू किया जा सकता था. लेकिन जब इसे शुरू किया गया तब भी इसे पूरी तैयारी से शुरू नहीं किया गया. इसकी सोच काफ़ी व्यापक और असरदार थी लेकिन इसका अमलीकरण कमजोर ढंग से हुआ और ये आँकड़ों में सामने भी आया है. इसके साथ ही पोषण अभियान का ध्यान भी अंडर-न्यूट्रिशन, वेस्टेज़ आदि पर था और मोटापे को उसमें ठीक से शामिल नहीं किया गया था."

नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे - 5 के नतीज़ों पर नज़र डालें तो कई राज्यों में ओवर वेट यानी मोटापे की समस्या तेजी से उभरती हुई दिख रही है.

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संतुलित आहार और ओबेसिटी रोकना एक चुनौती

बीते कई वर्षा से कुपोषण ख़त्म करने के लिए संघर्ष कर रहे समाजसेवी और स्वास्थ्य क्षेत्र के विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत में कुपोषण के प्रति लोगों का नज़रिया बदलने की बेहद ज़रूरत है.

कुपोषण से आशय अक्सर बेहद कमजोर दिखने वाले बच्चों से लगाया जाता है. जबकि कमजोरी के साथ - साथ बच्चों में मोटापा बढ़ना भी कुपोषण का ही एक प्रकार है.

बीते कुछ सालों में ग्रामीण क्षेत्रों में अति कुपोषित बच्चों की संख्या में कमी आई है. लेकिन अल्प-पोषित बच्चों को पोषित मान लेने की ग़लती बेहद आम होती जा रही है. इसी तरह शहरों में बच्चों के मोटापे को तंदुरुस्ती माने जाने की भूल भी ओबेसिटी की ओर ले जाती है.

लेकिन बच्चों को पोषित आहार देने की कोशिशों में एक कमी नज़र आती है.

डॉ. खंडेलवाल बताती हैं, "जब कहीं आग लगी हो, और आप आग के स्रोत को बुझाने की जगह आग की लपटों को बुझाते रहें तो आग भड़कती रहती है. ओबेसिटी कुपोषण से ही निकली एक लपट है. सभी पोषण कार्यक्रमों में कार्बोहाइड्रेट रिच फूड ज़्यादा देते हैं, उद्देश्य फलों और दालों को मिलाकर तैयार किया गया एक संतुलित आहार देने की जगह भूख मिटाना है. नीति-निर्माताओं की सोच ये है कि भूख को मिटाना है. लेकिन ये आँकड़े स्पष्ट रूप से बताते हैं कि कुपोषण एक बेहद गहरी और गंभीर समस्या है."

लेकिन इसके साथ ही पोषण अभियान के अमलीकरण को लेकर अक्सर सवाल उठते रहे हैं. उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में पोषण अभियान जातिगत भेदभाव का नुकसान उठाता आया है.

डॉ. खंडेलवाल कहती हैं, "ये बहुत ज़रूरी है कि इसमें कैपिसिटी बिल्डिंग का काम किया जाए. इस अभियान के तहत काम करने वालों को मानसिक ढंग से तैयार किया जाए कि वे पूरे समर्पण के साथ इस क्षेत्र में काम कर सकें. इसके अलावा इसमें टेक्नोलॉजी आदि की मदद लेकर उन सभी गैप्स को भरने की ज़रूरत है जिसके चलते कुपोषण ख़त्म करने में रुकावटें पैदा होती हैं."

इस नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे में 12 राज्यों के आँकड़े सामने आना शेष हैं.

कुपोषण का मनरेगा कनेक्शन

लेकिन कुपोषण के ख़िलाफ़ काम कर रहे डॉ. लेनिन मानते हैं कि उत्तर प्रदेश के आँकड़े शेष भारत से भी ज़्यादा चिंताजनक हो सकते हैं.

वे कहते हैं, "ये आँकड़े बताते हैं कि अतिकुपोषित बच्चों की संख्या में कमी आई है. मृत्यु दरें कम हुई हैं. लेकिन स्थितियां वहाँ से बिगड़ना शुरू हुई हैं जब सरकारों ने कल्याणकारी योजनाओं पर जोर न देकर निजी क्षेत्र पर ध्यान केंद्रित किया. ऐसी नीतियों पर फोकस करते हैं जहां सिर्फ कंपनियों की चले. जब सामाजिक कल्याण की चीजों पर खर्च कम कर दिया जाए. नरेगा की शुरुआत में काफ़ी बुराई की गई. इसका असर बढ़े हुए कुपोषण के रूप में सामने आ रहा है.

हमने अपने प्रयासों में पाया है कि बच्चों के साथ साथ महिलाओं और पुरुषों में आधे पेट खाकर उठने की प्रवृत्ति देखी जा रही है. क्योंकि लोगों को उनकी खुराक से आधा खाना मिल रहा है. ऐसे में ये स्पष्ट है कि सरकार के कल्याणकारी योजनाओं से दूर हटते ही कुपोषण बढ़ा है. लेकिन अगर ये स्थितियां बनी रहीं तो आगे चलकर मृत्यु दर बढ़ेगी."

साल 2013 में हुई ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के एक अध्ययन में सामने आया था कि मनरेगा स्कीम ने बच्चों को अति कुपोषण श्रेणी से बाहर निकालने में मदद की थी.

इस अध्ययन में स्पष्ट रूप से बताया गया था कि ग्रामीण क्षेत्रों में उन बच्चों के अति कुपोषित होने की संभावनाएं अपेक्षाकृत कम हैं जिनके माता-पिता मनरेगा के तहत निश्चित आय हासिल करते हैं.

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लेकिन इसके बावजूद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने पहले कार्यकाल में मनरेगा तो 'यूपीए की विफलताओं का स्मारक' बताया था.

आँकड़ों पर नज़र डालें तो सरकार ने हर साल मनरेगा पर अपना बजट बढ़ाया है. साल 2010-11 में मनरेगा का बजट जहां 40 हज़ार करोड़ रुपये था तो वहीं 2019-20 में ये बजट राशि बढ़कर 60 हज़ार करोड़ रुपये हो गई.

इसके साथ ही इस बीच कई सालों में मनरेगा पर आवंटित बजट से ज़्यादा राशि खर्च हुई. उदाहरण के लिए 2018-19 में आवंटित राशि 55 हज़ार करोड़ रुपये से ज़्यादा राशि 61084 करोड़ रुपये खर्च हुई.

लेकिन बजट में बढ़ोतरी के बावजूद कई राज्य समय से पहले फंड ख़त्म होने की समस्या से जूझ रहे हैं. इनमें राजस्थान, और उत्तर प्रदेश जैसे तमाम राज्य शामिल हैं. वहीं, कुछ राज्य में ऐसे मामले सामने आए हैं जहां लोगों को मनरेगा का काम करने से रोकने के प्रयास किए गए.

सामाजिक संस्था नरेगा संघर्ष मोर्चा भी मनरेगा के तहत दी जाने वाली मजदूरी में देरी होने की चिंताओं को सामने रख चुकी है.

ऐसे में जहां आँकड़ों में मनरेगा पर खर्च बढ़ता दिखता है तो वहीं ज़मीन पर यह ऊंट के मुंह में ज़ीरे जैसे दिखाई पड़ता है.

मनरेगा के तहत देरी से मजदूरी मिलने और काम न मिलने का कुपोषण पर क्या फर्क पड़ा है, इसकी पड़ताल करने में लंबा वक़्त लग सकता है.

फिलहाल नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे - 5 के आँकड़े बताते हैं कि 2015-19 के बीच जन्मे बच्चों को कुपोषण की मार झेलनी पड़ी है.

ऐसे में सवाल उठता है कि 2020 में पैदा होने वाले बच्चों पर कुपोषण की मार कितनी भयानक पड़ी होगी जब कोविड की वजह से पूरे देश को एक व्यापक खाद्य संकट झेलना पड़ा था.

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