महाराष्‍ट्र: जानिए क्यों मुख्‍यमंत्री पद संभालने से दूर भाग रहे शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ?

बेंगलुरु। महाराष्ट्र में शिवसेना और कांग्रेस-एनसीपी की मिलीजुली सरकार बनना लगभग तय है। सरकार के गठन को लेकर दिल्ली में पिछले चार दिनों से सियासी सरगर्मियों के बाद तीनों दलों की बैठक में फैसले के बाद कांग्रेस, शिवसेना और एनसीपी गठबंधन पर शुक्रवार को मुहर लग जाएगी। जिसमें मुख्‍यमंत्री की रेस में सबसे आगे उद्वव ठाकरे का नाम ही चल रहा हैं। लेकिन खबर है कि शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे मुख्‍यमंत्री बनने के लिए तैयार नहीं हैं। जबकि शिवसैनिक ही नहीं एनसीपी और कांग्रेस भी चाहती हैं कि उद्धव ठाकरे ही सीएम बनें। आखिर क्या वजह हैं जो शिवसेना प्रमुख उद्वव ठाकरे मुख्‍यमंत्री की जिम्मेदारी नहीं संभालने से पीछे हट रहे हैं।

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दरअसल, उद्धव को शुरुआत में राजनीति में कोई विशेष रुचि नहीं थी इसलिए शिवेसना प्रमुख बाला साहेब ठाकरे के राजनीतिक उत्तराधिकारी उनके भतीजे राज ठाकरे को ही माना जाता था। स्वर्गीय बाला साहेब ठाकरे भारतीय राजनीति के जाने माने शख्सियत बाला साहेब को महाराष्ट्र में एक फायरब्रांड नेता के रूप में जाना जाता था। इसके बावजूद 40 वर्ष की उम्र तक उद्वव ठाकरे अपने पिता की पार्टी से बिल्कुल दूरी बनाए रखे।

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लेकिन 2002 में उद्धव ठाकरे वाइल्ड लाइफ फोटोग्राफर से राजनीति के क्षेत्र में आये। उन्हें 2002 के बृहद मुंबई नगर निगम चुनाव के दौरान पार्टी के प्रबंधन की जिम्मेदारी सौंपी गई। उन्हें 2003 में पार्टी का कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया था। 2004 में जब उद्धव ने शिवसेना की कमान संभाली तो राज ठाकरे और उद्धव के बीच दरार उत्पन्न हो गई। राज ठाकरे ने बाद में शिवसेना से अलग होकर महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना नाम से अपनी नयी पार्टी बनाई ।

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शिवसेना पर अपनी कमान ढीली नहीं पड़ने देना चाहते

राज ठाकरे की करिश्माई छवि होने के बाद भी शांतिपूर्वक शिवसेना के कैडर को एकजुट रखने का क्रेडिट उद्वव ठाकरे को ही जाता हैं। पिता की मुत्यु के बाद पार्टी की कमान बखूबी अपने हाथ में ले लिया। उद्धव पार्टी में अनुशासन कायम करने में सफल रहे। उन्होंने पार्टी को संगठित तरीके से चलाना प्रारम्भ किया। जिसके परिणाम स्वरूप पार्टी ने बीएमसी के चुनाव में सफलता हासिल की। 2007 में महाराष्ट्र के विदर्भ जिले में सूखे की मार झेल रहे किसानों को ऋण में राहत देने के लिए अभियान चलाया। उद्धव ठाकरे ने केंद्र सरकार में अपनी पार्टी की हिस्सेदारी सुनिश्चित करायी।

2012 के अलावा 2019 के बीएमसी चुनावों में एक बार फिर शिवसेना को जीत दिलाई। शिवसेना की कमान उद्धव ठाकरे ने संभाल रखी हैं, अगर वो मुख्यमंत्री बने तो उसकी जिम्मेदारियों में व्‍यस्‍त हो जाएंगे जिस कारण पार्टी पर उनकी कमान ढीली पड़ जाएगी। इसलिए भी वह मुख्‍यमंत्री पद लेने से इंकार कर रहे हैं।

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उद्धव की एक बड़ी सफलता शिवसेना की हिंसक छवि को बदलने की रही है। उद्धव के नेतृत्व में एक संगठित इकाई के रूप में पार्टी ने कार्य किया। उद्धव ने बालासाहेब और राज ठाकरे के विपरीत फायरब्रांड राजनीति से किनारा कर लिया। एक बेहतर संगठित और जमीनी पकड़ वाली राजनीतिक पार्टी बनाने के लिए उद्धव ठाकरे ने अथक प्रयास किए। एक लेखक, कवि और बौद्धिक, उद्धव ठाकरे ने अपनी पार्टी की राजनीतिक प्रणाली में बदलाव किये।

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शिवसेना को और मजबूत स्थिति में लाना चाहते हैं उद्वव

उद्धव ठाकरे अनिच्छा से राजनीति में आए लेकिन शुरुआती अनिच्छा के बाद वो सक्रिय रूप से राजनीति से लगातार जुड़े हुए हैं। अपने पिता की तरह वह भी केंद्र की राजनीति में और सक्रिय होना चाहते हैं। इसलिए महाराष्‍ट्र चुनाव 2019 में महाराष्‍ट्र में सरकार बनाने के साथ केन्‍द्र की राजनीति में हस्‍तक्षेप बढ़ाकर शिवसेना को और मजबूत स्थिति में लाना चाहते हैं। इसलिए भी वह इस जिम्मेदारी लेने से बच रहे हैं।

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बता दें उद्वव के कुशल मार्ग दर्शन में शिवसेना ने 2002 के बीएमसी चुनावों में भाग लिया। जिसके बाद उनके पिता बाल ठाकरे ने उन्‍हें राजनीति में भागीदारी बढ़ाने का दबाव बनाया था। 2004 में बाला साहेब ठाकरे ने उन्हें अगले पार्टी प्रमुख के रूप में घोषणा किया। जिसके बाद उद्धव अचानक सुर्खियों में आ गए उनके नेतृत्व में शिवसेना को 2014 लोकसभा और विधानसभा चुनाव में सफलता मिली। 2017 मुंबई नगर निकाय चुनाव में भी शिवसेना ने जीत का स्वाद चखा और अब महाराष्‍ट्र विधानसभा चुनाव 2019 में जीत हासिल करके सरकार बनाने की स्थिति में आयी हैं।

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उद्वव ने राजनीति में सक्रिय होने के बाद से कई चुनाव लड़वाए ताे जरुर हैं लेकिन वे कभी चुनाव नहीं लड़े और उन्हें मंत्रालयों के कामकाज का प्रत्यक्ष अनुभव नहीं भी नहीं हैं। माना जा रहा हैं कि भले ही वह अपने खराब स्‍वास्‍थ्‍य का हवाला देकर मुख्‍यमंत्री की कुर्सी पर बैठने से इंकार कर दें लेकिन वास्‍तवकिता ये हैं हैं कि उन्‍हें ये खूब पता है कि विरोधी विचारधारा वाली एनसीपी कांग्रेस के साथ वह सरकार बना तो रहे हैं लेकिन उसको चलाना इतना आसान नही होगा। जो भी शिवसैनिक मुख्‍यमंत्री बनेगा उसके लिए यह ताज कांटो भरा ही साबित होगा। गौरतलब है कि उद्वव ठाकरे प्रतिष्ठित लेखक भी हैं उनके करीब आधा दर्जन से अधिक पुस्तकें और फोटो पत्रिकाएं प्रकाशित होते हैं इसलिए मुख्‍यमंत्री न बनने का फैसला उन्‍होंने ऐसे ही नही किया होगा।

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क्या भाजपा के इस आरोप से डर रहे उद्वव

गौरलतब हैं कि महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव शिवसेना ने भारतीय जनता पार्टी के साथ में लड़ा था। जिसमें भाजपा को 105, शिवसेना को 56, एनसीपी को 54 और कांग्रेस को 44 सीटें मिली हैं। बीजेपी और शिवसेना ने मिलकर बहुमत का 145 का आंकड़ा पार कर लिया था। लेकिन शिवसेना ने 50-50 फॉर्मूले की मांग रख दी जिसके मुताबिक ढाई-ढाई साल सरकार चलाने का मॉडल था। शिवसेना का कहना है कि बीजेपी के साथ समझौता इसी फॉर्मूले पर हुआ था लेकिन बीजेपी का दावा है कि ऐसा कोई समझौता नहीं हुआ।इसी लेकर मतभेद इतना बढ़ा कि दोनों पार्टियों की 30 साल पुरानी दोस्ती टूट गई।

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जिसके बाद शिवसेना ने मुख्‍यमंत्री की कुर्सी के लालच में अपनी विरोधी विचारधारा वाली एनसीपी और कांग्रेस से हाथ मिला कर गठबंधन कर रही हैं। इसलिए उद्वव को डर हो सकता है कि अगर वो मुख्यमंत्री बने तो विपक्ष उन पर यह कहकर हमला करने लगेगा कि पहले तो वह आदित्य को मुख्यमंत्री बनाना चाहते थे, लेकिन वास्‍तव में उद्वव को स्‍वयं मुख्‍यमंत्री बनना था!

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