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जनरल बिपिन रावत पर पीएम मोदी इतना भरोसा क्यों करते थे?

जनरल रावत
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देश के पहले चीफ़ ऑफ़ डिफेंस स्टाफ़ जनरल बिपिन रावत की आठ दिसंबर को तमिलनाडु के कुन्नूर में वायु सेना के एक हेलिकॉप्टर दुर्घटना में मौत हुई तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्वीट कर कहा, ''जनरल बिपिन रावत एक शानदार सैनिक थे. सच्चे देशभक्त, जिन्होंने सेना के आधुनिकीकरण में अहम भूमिका निभाई. सामरिक और रणनीतिक मामलों में उनकी दृष्टिकोण अतुलनीय था. उनके नहीं रहने से मैं बहुत दुखी हूँ. भारत उनके योगदान को कभी नहीं भूलेगा.''

31 दिसंबर, 2016 को जब जनरल बिपिन रावत को थल सेना की कमान सौंपी गई तभी पता चल गया था कि प्रधानमंत्री मोदी उन पर बहुत भरोसा करते हैं.

https://twitter.com/narendramodi/status/1468566007086137346

जरनल रावत का थल सेना प्रमुख बनना कोई सामान्य प्रक्रिया नहीं थी. उन्हें सेना की कमान उनके दो सीनियर अधिकारियों की वरिष्ठता की उपेक्षा कर दी गई थी.

अगर पारंपरिक प्रक्रिया से सेना प्रमुख बनाया जाता तो वरिष्ठता के आधार पर तब ईस्टर्न कमांड के प्रमुख जनरल प्रवीण बख्शी और दक्षिणी कमांड के प्रमुख पी मोहम्मदाली हारिज़ की बारी थी.

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जनरल रावत के लिए वरिष्ठता की उपेक्षा

लेकिन मोदी सरकार ने वरिष्ठता की जगह इन दोनों के जूनियर जनरल रावत को पसंद किया. तब कई विशेषज्ञों ने कहा था कि जनरल रावत भारत की सुरक्षा से जुड़ी वर्तमान चुनौतियों से निपटने में सक्षम हैं. तब भारत के सामने तीन बड़ी चुनौतियां थीं, सीमा पार से आतंवाद पर लगाम लगाना, पश्चिमी छोर से छद्म युद्ध को रोकना और पूर्वोत्तर भारत में उग्रवादियों पर लगाम लगाना.

तब जनरल रावत के बारे में कहा गया था कि पिछले तीन दशकों से टकराव वाले क्षेत्र में सेना के सफल ऑपरेशन चलाने का उनके पास सबसे उम्दा अनुभव है.

जनरल रावत के पास उग्रवाद और लाइन ऑफ कंट्रोल की चुनौतियों से निपटने का भी एक दशक का अनुभव था. पूर्वोत्तर भारत में उग्रवाद को काबू में करने और म्यांमार में विद्रोहियों के कैंपों को ख़त्म कराने में भी जनरल रावत की अहम भूमिका मानी जाती है. 1986 में जब चीन के साथ तनाव बढ़ा था, तब जनरल रावत सरहद पर एक बटालियन के कर्नल कमांडिंग थे.

बताया जाता है कि जनरल रावत के करियर के इस अनुभव से पीएम मोदी प्रभावित थे और उन्हें सेना की कमान सौंपने में वरिष्ठता की परवाह नहीं की. हालाँकि भारतीय सेना का प्रमुख बनाने में वरिष्ठता की उपेक्षा करने वाले नरेंद्र मोदी कोई पहले प्रधानमंत्री नहीं हैं.

उनसे पहले 1983 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने भी लेफ्टिनेंट जनरल एसके सिन्हा की वरिष्ठता की परवाह किए बिना उनके जूनियर लेफ़्टिनेंट जनरल एएस वैद्य को सेना की कमान सौंपी थी. इंदिरा गांधी के इस फ़ैसले के विरोध में जनरल एसके सिन्हा ने इस्तीफ़ा दे दिया था.

इंदिरा गांधी ने 1972 में भी ऐसा ही किया था. तब उन्होंने बहुत ही लोकप्रिय लेफ्टिनेंट जनरल एस भगत को वरिष्ठता की उपेक्षा करते हुए उनके जूनियर लेफ़्टिनेंट जनरल जीजी बेवूर को सेना की कमान सौंप दी थी.

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लाल क़िले से सीडीएस की घोषणा

15 अगस्त, 2019 को स्वतंत्रता दिवस की 73वीं वर्षगांठ पर लाल क़िले से दिए गए अपने भाषण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आर्मी, नेवी और एयरफ़ोर्स के बीच अच्छे समन्वय के लिए चीफ़ ऑफ डिफेंस स्टाफ़ पद बनाने की घोषणा की थी.

तब पीएम मोदी ने कहा था, ''समय रहते रिफॉर्म की ज़रूरत है. सैन्य व्यवस्था में सुधार के लिए कई रिपोर्ट आई. हमारी तीनों सेना के बीच समन्वय तो है लेकिन आज जैसे दुनिया बदल रही है, आज जिस प्रकार से तकनीक आधारित व्यवस्था बन रही है, वैसे में भारत को भी टुकड़ों में नहीं सोचना होगा. तीनों सेनाओं को एक साथ आना होगा. विश्व में बदलते हुए युद्ध के स्वरूप और सुरक्षा के अनुरूप हमारी सेना हो. आज हमने निर्णय किया है कि चीफ़ ऑफ़ डिफेंस स्टाफ़ की व्यवस्था करेंगे और सीडीएस तीनों सेनाओं के बीच समन्वय स्थापित करेगा.''

पीएम मोदी ने इस ज़िम्मेदारी के लिए भी जनरल रावत को ही चुना. भारत में पहली बार चीफ़ ऑफ डिफेंस स्टाफ़ पद की व्यवस्था की गई और वो मिली जनरल बिपिन रावत को.

रावत 31 दिसंबर, 2019 को सेना प्रमुख से रिटायर हुए और उन्हें सीडीएस की ज़िम्मेदारी मिल गई. जनरल रावत जब सेना प्रमुख बने तो कुछ ही महीनों में चीन के साथ डोकलाम में तनातनी की स्थिति पैदा हो गई. डोकलाम भूटान में है और वहां चीन सैन्य ठिकाने बना रहा था. भारत ने वहाँ अपने सैनिकों की तैनाती कर दी और कहा गया कि यह सेना प्रमुख जनरल रावत की आक्रामक सैन्य नीति का हिस्सा है.

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ढाई मोर्चों से तैयारी

जनरल रावत ने डोकलाम संकट के दौरान ही कहा था कि भारत ढाई मोर्चों से युद्ध के लिए तैयार है. यहाँ ढाई मोर्चे से मतलब चीन, पाकिस्तान और भारत के भीतर विद्रोही समूहों से है. जनरल रावत के इस बयान पर चीन की ओर से कड़ी आपत्ति भी आई थी.

लेकिन जनरल रावत के बयान में कई बार विरोधाभास भी होते थे. कई रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि अगर आपकी तैयारी है भी तो दो मोर्चों से चुनौती का सामना करना आसान नहीं होता इसलिए कूटनीति का सहारा लेना होता है. दुनिया के इतिहास में जब भी किसी देश ने दो मोर्चों से लड़ाई की है तो उसके लिए दिक़्क़ते बढ़ी हैं और आसान नहीं रहा है.

पीएम मोदी जनरल रावत पर इतना भरोसा क्यों करते थे? ये पूछे जाने पर रक्षा विश्लेषक राहुल बेदी कहते हैं, ''बिपिन रावत को सीडीएस की ज़िम्मेदारी तब सौंपी गई जब इस पद पर जाने के लिए कोई नियम नहीं था. ऐसे में जनरल रावत को यह पद सौंपना अहम भी था और आसान भी. जनरल रावत को सैन्य सुधार, डिफेंस इकॉनोमी और तीनों सेना में समन्वय के लिए सीडीएस बनाया गया था. अभी उनका एक साल का कार्यकाल और बचा था.

''पीएम मोदी के भरोसा करने की एक बड़ी वजह वैचारिक क़रीबी भी हो सकती है. जनरल रावत लगातार राजनीतिक बयान देते थे और उन बयानों में जो सोच होती वो बीजेपी के क़रीब दिखती थी. इसके अलावा जनरल रावत देश के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल के भी क़रीबी थे. अजित डोभाल को पीएम मोदी भी काफ़ी तवज्जो देते हैं.''

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जनरल रावत के विवादित बयान

जनरल बिपिन रावत ने 26 दिसंबर, 2019 को कहा था, "नेता वो होते हैं जो सही दिशा में लोगों का नेतृत्व करते हैं. बड़ी संख्या में यूनिवर्सिटी और कॉलेज के स्टूडेंट जिस तरह से विरोध-प्रदर्शन कर रहे हैं उससे शहरों में हिंसा और आगज़नी बढ़ रही है. नेतृत्व ऐसा नहीं होना चाहिए.''

जनरल रावत के इस बयान पर विपक्षी पार्टियों की तरफ़ से तीखी प्रतिक्रिया आई थी. सीपीएम महासचिव सीताराम येचुरी ने कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा था, ''जनरल रावत के इस बयान से स्पष्ट हो जाता है कि मोदी सरकार के दौरान स्थिति में कितनी गिरावट आ गई है कि सेना के शीर्ष पद पर बैठा व्यक्ति अपनी संस्थागत भूमिका की सीमाओं को लांघ रहा है."

https://twitter.com/ANI/status/1210083310547849216

"ऐसी स्थिति में यह सवाल उठना लाजिमी है कि कहीं हम सेना का राजनीतीकरण कर पाकिस्तान के रास्ते पर तो नहीं जा रहे? लोकतांत्रिक आंदोलन के बारे में इससे पहले सेना के किसी शीर्ष अधिकारी के ऐसे बयान का उदाहरण आज़ाद भारत के इतिहास में नहीं मिलता है."

येचुरी ने सेना प्रमुख से उनके बयान से लिए देश से माफ़ी मांगने को कहा था. साथ ही सीपीएम ने सरकार से भी मामले में संज्ञान लेते हुए जनरल की निंदा करने की मांग की थी.

जनरल रावत के इस बयान पर एआईएमआईएम के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी ने भी आपत्ति जताई थी. उन्होंने कहा था, "अपने पद की सीमाओं की जानना ही नेतृत्व है. नागरिकों की सर्वोच्चता और जिस संस्था के आप प्रमुख हैं, उसकी अखंडता को संरक्षित करने के बारे में है."

https://twitter.com/SitaramYechury/status/1210163778047733761

राहुल बेदी कहते हैं कि जनरल रावत के बयान तभी थमे होंगे जब सरकार की तरफ़ से उन्हें ऐसा बंद करने के लिए कहा होगा.

जनरल रावत चीन के लेकर भी खुलकर बोलते थे. हाल ही में जनरल रावत ने कहा था कि भारत के लिए पाकिस्तान नहीं चीन ख़तरा है.

कई बार सरकार को जनरल रावत के बयान के कारण राजनयिक रिश्तों में असहजता का भी सामना करना पड़ा है. अभी चीन ने पूर्वी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा पर अप्रैल 2020 से पहले की यथास्थिति को बदल दिया है और ये जनरल रावत के सीडीएस रहते हुए हुआ. कई ऐसी चीज़ें हैं, जो अगले सीडीएस के लिए बड़ी चुनौती होगी.

https://twitter.com/gantzbe/status/1468571787315326981

जनरल रावत इसराइल से सैन्य संबंधों को बढ़ाने के भी पक्षधर रहे थे. उनकी मौत पर इसराइल के शीर्ष नेतृत्व से दुख जताते हुई कई प्रतिक्रिया आई. प्रधानमंत्री नेफ़्टाली बेनेट से लेकर वहां के पूर्व प्रधानमंत्री तक ने दुख जताया है.

इसराइल के रिटायर्ड आर्मी जनरल बेनी गेंट्ज़ ने ट्वीट कर कहा है, ''जनरल रावत इसराइल डिफ़ेंस फ़ोर्स के सच्चे पार्टनर थे. दोनों देशों में सुरक्षा सहयोग बढ़ाने में जनरल रावत की अहम भूमिका थी. वो जल्द ही इसराइल आने वाले थे.''

मोदी सरकार भी इसराइल को लेकर पूर्ववर्ती सरकारों की तुलना में काफ़ी अलग रही है. प्रधानमंत्री के रूप में इसराइल जाने वाले नरेंद्र पहले शख़्स हैं. इससे पहले के प्रधानमंत्री इसराइल जाने से बचते रहे थे.

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