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BJP ने बीएल संतोष को ही क्यों सौंपा अमित शाह के बाद दूसरा सबसे महत्वपूर्ण पद? जानिए

नई दिल्ली- रामलाल अपनी उम्र की वजह से 2014 से ही बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव (संगठन) की जिम्मेदारियों से मुक्त होना चाहते थे। उन्होंने 13 साल तक इस जिम्मेदारी को बखूबी निभाया। अब पार्टी ने उनकी जगह उनके सहयोगी रहे बीएल संतोष को नया राष्ट्रीय महासचिव (संगठन) बनाया है। गौरतलब है कि भारतीय जनता पार्टी में राष्ट्रीय महासचिव (संगठन) का पद पार्टी अध्यक्ष के बाद सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण माना जाता है। ऐसे में सवाल उठता है कि बीएल संतोष हैं कौन, जिन्हें पार्टी ने इतनी बड़ी जिम्मेदारी सौंपी है और भाजपा में ये पद इतना अहम क्यों है? जबकि इस पर बैठा व्यक्ति कभी लाइमलाइट में नहीं आता।

भाजपा में क्यों अहम है राष्ट्रीय महासचिव (संगठन) का पद?

भाजपा में क्यों अहम है राष्ट्रीय महासचिव (संगठन) का पद?

भारतीय जनता पार्टी को आरएसएस का पॉलिटिकल विंग माना जाता है और पार्टी का संगठन मंत्री संघ के ही किसी वरिष्ठ प्रचारक को बनाया जाता है। इसलिए यह पद बीजेपी और आरएसएस दोनों के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह दोनों के बीच अहम लिंक का काम करता है। माना जाता है कि इस पद पर बैठे व्यक्ति की पहली जिम्मेदारी ये होती है कि वह यह सुनिश्चित करे कि पार्टी लीडरशिप आरएसएस प्रमुख के निर्देशों के मुताबिक ही संगठन को चलाने का प्रयास करें। मतलब, बीजेपी संघ के विचारधारा से भटके नहीं। इस संबंध में संगठन महासचिव के पास आरएसएस को भाजपा में चल रही गतिविधियों से लगातार अवगत कराने का जिम्मा रहता है। यही नहीं अगर संघ भी भाजपा नेतृत्व को कोई मैसेज देना चाहता है, तो भी वह संगठन महासचिव के जरिए ही उस भेजता है। इसके अलावा संगठन मंत्री पार्टी का बाकी रुटीन काम भी देखते रहते हैं।

आडवाणी के समय दिखी थी इस पद की अहमियत

आडवाणी के समय दिखी थी इस पद की अहमियत

बीजेपी के संगठन महासचिव का पद कितना खास है, इसकी बानगी 2004 की एक घटना है। उस समय भाजपा के अध्यक्ष पद पर रहते हुए लालकृष्ण आडवाणी ने पाकिस्तान जाकर मोहम्मद अली जिन्ना की तारीफ में कसीदे पढ़ डाले थे। द प्रिंट में छपे एक लेख के मुताबिक आडवाणी के उस बयान पर संघ इतना ज्यादा भड़क गया कि उसने बीजेपी को पार्टी नेताओं की एक इमरजेंसी मीटिंग बुलाने के लिए कह दिया, ताकि आडवाणी पर कार्रवाई की जा सके। उस बैठक में अपने ही अध्यक्ष के खिलाफ प्रस्ताव पास करने के लिए बीजेपी का कोई वरिष्ठ नेता नहीं पहुंचा। बावजूद इसके, तत्कालीन संगठन महामंत्री संजय जोशी ने आडवाणी की आलोचना वाला ड्राफ्ट तैयार किया और उसे बीजेपी संसदीय बोर्ड से पास भी करा लिया। जब आडवाणी भारत लौटे तो संघ के दबाव में उन्हें इस्तीफा देना ही पड़ा। अलबत्ता रामलाल के कार्यकाल के दौरान बीजेपी और संघ में इस तरह की मतभेद की स्थिति कभी पैदा नहीं हुई और उन्होंने बिना विवाद के नितिन गडकरी, राजनाथ सिंह और अमित शाह जैसे अध्यक्षों के साथ बखूबी काम किया।

कौन हैं बीएल संतोष?

कौन हैं बीएल संतोष?

बीएल संतोष को संघ का हार्डलाइनर प्रचारक माना जाता है। संघ के प्रचारकों की एक विशेषता ये होती है कि वे लो-प्रोफाइल रहकर हाई-प्रोफाइल काम करने में माहिर होते हैं। बीएल संतोष में यह हुनर कूट-कूट कर भरी हुई है। किसी भी प्रचारक की तरह कर्नाटक के शिवमोगा के रहने वाले संतोष भी अविवाहित हैं। पेशे से इंजीनियर होने के बावजूद उन्होंने संघ का पूर्णकालिक प्रचारक बनने के लिए गृहस्थ जीवन छोड़ दिया था। बीजेपी की केंद्रीय इकाई में रामलाल की जगह लेने से पहले वे संयुक्त महासचिव (संगठन) के तौर पर उन्हें सहयोग दे रहे थे। इसके साथ ही उनके पास दक्षिण भारत में पार्टी के प्रचार-प्रसार का भी प्रभार था।

दक्षिण भारत में बनवाई पहली भाजपा सरकार

दक्षिण भारत में बनवाई पहली भाजपा सरकार

बीएल संतोष को दक्षिण भारतीय राज्य कर्नाटक में भारतीय जनता पार्टी की पहली सरकार बनवाने वाला नेता माना जाता है। कहा जाता है कि 2008 में कर्नाटक में बनी बीजेपी की सरकार बनने के पीछे की रणनीति इन्होंने ही तय की। लेकिन, जब बीएस येदियुरप्पा कर्नाटक में मुख्यमंत्री बन गए तो उनकी बीएल संतोष से खटपट शुरू हो गई। कहा जाता है कि संतोष को जो चीजें पसंद नहीं आतीं, वह उसे खुलकर जाहिर कर देते हैं। उन्होंने येदियुरप्पा की छवि को पार्टी के लिए नुकसानदेह माना। कहा ये भी जाता है कि 2011 में जमीन विवाद में फंसने पर अगर येदियुरप्पा इस्तीफा देने के लिए मजबूर हुए, तो उसके पीछे भी संतोष की ही बड़ी भूमिका रही। बाद में दोनों नेताओं के मतभेद को देकते हुए केंद्रीय नेतृत्व ने बीएल संतोष को केंद्रीय कार्यकारिणी में बुला लिया।

बीएल संतोष को क्यों मिली इतनी बड़ी जिम्मेदारी?

बीएल संतोष को क्यों मिली इतनी बड़ी जिम्मेदारी?

बीएल संतोष की कई भाषाओं पर पकड़ है। वे कन्नड़, तमिल, तेलुगू, हिंदी और अंग्रेजी धाराप्रवाह बोल लेते हैं। वे कर्नाटक समेत दक्षिण भारत के लगभग सभी राज्यों में संघ और उससे जुड़े संगठनों में बड़ी भूमिकाएं निभा चुके हैं। ऐसे में जब भारतीय जनता पार्टी अभी दक्षिण भारत में विस्तार पर पूरा जोर लगा रही है, तो माना जा रहा है कि संतोष के बहुभाषी होने और वहां की अच्छी सियासी समझ होने का वहां पार्टी को बहुत फायदा मिल सकता है। मौजूदा समय में संघ और बीजेपी में कोई बड़ी दुविधा वाली स्थिति भी नहीं है, क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद ही आरएसएस के प्रचारक रह चुके हैं। इस पद के लिए पहले वी सतीश को जिम्मेदारी सौंपने की चर्चा हो रही थी, लेकिन अब वे संतोष को सहयोग देंगे।

संघ के संगठन महामंत्री की यह व्यवस्था बीजेपी में केंद्र से लेकर प्रदेश इकाइयों तक में भी बनी हुई है और जगह यह पद संघ के किसी प्रचारक के पास ही रहता है। सूत्रों के मुताबिक आने वाले समय में भारतीय जनता पार्टी 12 प्रदेशों के संगठन मंत्रियों की जिम्मेदारियों में भी फेरबदल कर सकती है। खबरें ये भी हैं कि यूपी में प्रदेश के संगठन महासचिव सुनील बंसल को भी प्रमोशन देकर केंद्रीय कार्यकारिणी में बड़ा रोल दिया जा सकता है।

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