सबरीमाला को लेकर फिर क्यों मच सकता है घमासान

सबरीमला
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फ़ोन पर बात करते हुए जब वे कहती हैं कि वह चार और महिलाओं को लेकर 20 नवंबर को सबरीमाला मंदिर जाएंगी, तो उनकी आवाज़ ज़रा भी नहीं लड़खड़ाती है.

34 साल की तृप्ति देसाई ने वर्ष 2018 में भगवान अयप्पा को समर्पित सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश की इजाज़त देने वाले सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद कई घंटे कोच्चि एयरपोर्ट पर ही बिता दिए थे.

इस मंदिर में 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर पाबंदी लगी हुई थी. अदालत के फ़ैसले के बाद हुए भारी विरोध प्रदर्शनों के कारण तृप्ति को मंदिर से लौटा दिया गया था.

अब पिछले हफ़्ते ही सुप्रीम कोर्ट ने इस फ़ैसले को रिव्यू बेंच के पास भेजा है. अब साथ में चर्चों, मस्जिदों और पारसी मंदिरों में भी महिलाओं के प्रवेश की इजाज़त देने पर भी विचार होगा.

लेकिन इस बीच केरल की लेफ़्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट सरकार ने ऐलान किया है कि वह सबरीमला मंदिर में प्रवेश करना चाह रही महिला एक्टिविस्टों को सुरक्षा नहीं देगी. सबरीमाला मंदिर शनिवार शाम को ही दो महीने तक चलने वाली तीर्थयात्रा के लिए खुला है.

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बदल गया लेफ़्ट सरकार का रुख़

बताया जा रहा है कि सरकार को यह क़ानूनी सलाह मिली है कि 10 से 50 साल की उम्र के बीच की महिलाओं को सबरीमाला मंदिर में नहीं जाने देना चाहिए.

इस तरह केरल सरकार 2018 के अपने रुख़ से पलट गई है. उस दौरान सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद जिस भी महिला ने सबरीमाला मंदिर जाने की कोशिश की थी, उसे सरकार ने पुलिस सुरक्षा दी थी.

राज्य के देवास्वोम मंत्री कडकमपल्ली सुरेंद्र ने कहा है कि अदालत के फ़ैसले के विस्तृत अध्ययन की ज़रूरत है. उन्होंने विपक्ष से गुज़ारिश की है कि पिछले साल की तरह इस मामले का 'राजनीतिक लाभ' उठाने की कोशिश न करे.

उन्होंने यह भी कहा कि सबरीमाला कोई 'एक्टिविज़म' की जगह नहीं है और उनकी सरकार 'लोकप्रियता बटोरने के लिए मंदिर में प्रवेश करने की घोषणा' करने वालों की सहायता नहीं करेगी.

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सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल आदेश दिया था कि 'नैष्ठिक ब्रह्मचारी' माने जाने वाले देवता की सभी आयु की महिलाएं पूजा कर सकती हैं. इस फ़ैसले के बाद पिछले साल सितंबर में केरल में बड़े पैमाने पर दक्षिणपंथी संगठनों और बीजेपी ने प्रदर्शन किए थे जिनमें कुछ हिंसक भी हो गए थे.

उधर केरल सरकार के ताज़ा रुख़ पर तृप्ति देसाई ने कहा, "कोर्ट ने स्टे ऑर्डर नहीं दिया है. इसलिए आप कैसे हमें मंदिर में जाने से रोक सकते हैं? केरल सरकार यह कहकर सुप्रीम कोर्ट के आदेश का अपमान कर रही है कि मंदिर में जाने से पहले कोर्ट से इजाज़त लेनी होगी. आप भक्त और एक्टिविस्ट में फ़र्क कैसे कर सकते हैं? हम दोनों हैं."

तृप्ति देसाई
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तृप्ति देसाई

बँटा हुआ नज़रिया

इस बीच, सबरीमाला में प्रवेश को लेकर महिलाओं के बीच कई आधार पर राय बँटी हुई है.

कोच्चि की वकील श्यामा कुरियाकोसे कहती हैं कि वह महिलाओं के धार्मिक अधिकारों का समर्थन करती हैं लेकिन सबरीमाला के मामले में श्रद्धालुओं को 41 दिन का व्रत रखना पड़ता है.

वह कहती हैं, "जिन लोगों को परिसर में प्रवेश करना होता है, उन्हें मासिक धर्म के बावजूद व्रत रखना होता है क्योंकि यह धार्मिक यात्रा है, कोई पर्यटन स्थल नहीं. अगर कोई आस्था के कारण जाना चाहता है तो उसे नहीं रोकना चाहिए."

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"जब हम बड़े हुए तो कभी नहीं लगा कि यह सब महिला विरोधी है. सबरीमाला दुनिया की सबसे अधिक भेदभाव-विरोधी जगहों में से एक है." वह कहती हैं कि केरल में ऐसे कई मंदिर हैं जहां सिर्फ़ महिलाएं ही प्रवेश कर सकती हैं.

श्यामा कुरियाकोसे के मुताबिक़, महिलाओं का एक धड़ा चाहता है कि भगवान अयप्पन को देखने के लिए मंदिर में प्रवेश करें जबकि दूसरे धड़े में महिलावादी और एक्टिविस्ट हैं जो मंदिर जाकर लैंगिक अधिकारों में समानता स्थापित करना चाहती हैं.

वह कहती हैं, "यहीं से इस मामले में राजनीतिक पार्टियों की एंट्री हो जाती है. यह अलग-अलग तरह की बातों का टकराव है."

प्रदर्शन
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'अनिवार्य धार्मिक रिवाज'

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को बड़ी बेंच के पास भेजने का जो आदेश दिया है, उसका बीजेपी ने स्वागत किया है.

2014 में पार्टी के घोषणापत्र में लिखा गया था, "बीजेपी का मानना है कि भारत जब तक सभी महिलाओं के अधिकारों की रक्षा करने वाले यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड को नहीं अपनाता, तब तक लैंगिक समानता नहीं आ सकती."

2016 में महाराष्ट्र में बीजेपी सरकार ने बॉम्बे हाई कोर्ट को भरोसा दिलाया था कि राज्य के सभी मंदिरों में महिलाओं को प्रवेश करने का अधिकार होगा.

सबरीमाला मामले में 2018 में आए फ़ैसले में तत्कालीन चीफ़ जस्टिस दीपक मिश्रा ने कहा था कि महिलाओं पर लगाया जाने वाला इस तरह का 'चुनिंदा प्रतिबंध' हिंदू धर्म का 'मूलभूत हिस्सा' नहीं है.

मामले को बड़ी बेंच के पास भेजने के ताज़ा आदेश के साथ सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर "अनिवार्य या मूलभूत धार्मिक परंपराओं" को परिभाषित करने का काम अपने हाथ लिया है.

सुप्रीम कोर्ट
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यह मामला सबसे पहले 1958 में उठा था जब कोर्ट के सामने सवाल आया था कि अस्पृश्यता- जिसके आधार पर मंदिरों में प्रवेश पर रोकटोक की जाती थी, वह हिंदू धर्म की आवश्यक परंपरा है या नहीं. कोर्ट ने इसे लेकर फ़ैसला सुनाया था कि यह ज़रूरी शर्त नहीं है.

2018 में सबरीमला के फ़ैसले में जस्टिस चंद्रचूड़ ने मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर रोक को एक तरह की अस्पृश्यता बताते हुए इसे अनुच्छेद 17 का उल्लंघन बताया था.

वकील श्यामा कुरियाकोसे कहती हैं कि सबरीमला मंदिर में प्रवेश को लेकर जाति का भी एक पहलू है. इस मंदिर को 12वीं सदी में बनाया गया लेकिन 1950 से ही यह त्रावणकोर देवास्वोम बोर्ड के पास है.

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श्यामा बताती हैं, "क्षेत्र में पंदलम राजाओं से पहले मला अराया आदिवासी समुदाय के लोग मंदिर की देखरेख करते थे. इन लोगों का मानना है कि भगवान अयप्पा मला अराया समुदाय के एक आदिवासी दंपती के यहां पैदा हुए थे."

"यह जनजातीय इलाक़ा है और उनकी परंपराओं के हिसाब से यहां कोई लिंग आधारित भेदभाव नहीं था. लेकिन 160 साल पहले मंदिर का जिम्मा राजाओं के पास चला गया. अब वहां जनजातीय पंरपराओं की कोई मान्यता नहीं थी. इसलिए यह सिर्फ़ लिंग आधारित अधिकारों की ही नहीं बल्कि जाति आधारित लड़ाई भी है."

वकील श्यामा कुरियाकोसे कहती हैं, "आदिवासी चाहते हैं कि मंदिर पर उनका अधिकार उन्हें वापस मिले. पिछले फ़ैसले में इस मसले पर भी बात हुई थी, मगर अब मामला धार्मिक और नास्तिक लोगों के बीच की लड़ाई का बन गया है. वाम सरकार को इसे शांत करना चाहिए."

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अन्य धर्मों की 'परंपराओं' भी असर

सबरीमाला मंदिर का प्रशासन त्रावणकोर देवोस्वोम ट्रस्ट के पास है जो केरल सरकार से संबद्ध है. मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर फिर रोक लगाने की मांग का विरोध करने के लिए इस आधार पर भी कोर्ट में दलीलें दी गई हैं.

ग़ैर-लाभकारी संस्था इंडियन लॉयर्स असोसिएशन की ओर से डाली गई जनहित याचिका में वकील रवि प्रकाश गुप्ता ने तर्क दिया है कि 'सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर रोक उनके धर्म की आधारभूत परंपरा नहीं है और न ही सबरीमाला मंदिर स्वतंत्र धार्मिक अंग है क्योंकि इसका प्रबंधन जनता के पैसे से चलने वाले त्रावणकोर देवास्वोम बोर्ड के पास है.'

रवि प्रकाश गुप्ता कहते हैं, "अपनी याचिका में मैंने कहा है कि अनुच्छेद 25 के तहत धर्म के मामलों में महिलाओं को बराबर अधिकार प्राप्त हैं. देवास्वोम बोर्ड ही सबरीमला मंदिर का प्रबंधन करता है. इसलिए यह अनुच्छेद 26 के तहत धार्मिक संप्रदाय नहीं है. इसलिए किसी ख़ास उम्र में महिलाओं के प्रवेश पर रोक लगाना हिंदू धर्म के ख़िलाफ़ है. इस परंपरा का हिंदू धर्म की अनिवार्य आधारभूत परंपरा होने का सवाल ही पैदा नहीं होता."

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सुप्रीम कोर्ट ने 14 नवंबर को सबरीमला केस को 3:2 से सात बेंचों की बड़ी जज को सौंपते हुए कहा कि इस केस का असर मस्जिदों और पारसी मंदिरों में महिलाओं के प्रवेश पर भी पड़ेगा.

इसलिए यह सवाल भी उठ रहा है कि आख़िर इस मामले में अन्य धर्मों की परंपराएं कैसे जुड़ गईं. इस बारे में मुक़दमे के दौरान बीच में पार्टी बनने वाले संगठन पीपल फ़ॉर धर्मा के वक़ील जे साई दीपक कहते हैं, "इस तरह की अन्य धार्मिक परंपराओं को एकसाथ मिला देने के क़दम को साल 2006 में मूल याचिकाकर्ताओं की याचना के संदर्भ में समझने की ज़रूरत है."

13 अक्तूबर, 2017 को आए एक फ़ैसले का ज़िक्र करते हुए दीपक कहते हैं कि तीन जजों की बेंच ने जब मामले को संविधान पीठ के पास भेजा था, तब कहा गया था कि 'उपासना स्थलों पर धार्मिक परंपराओं से जुड़ी सामान्य असमानता के मामलों पर दिशानिर्देश रखने की प्रार्थना भी की गई है.'

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वह कहते हैं कि कोर्ट में बहुमत था कि 2018 में आए फ़ैसले का दायरा बढ़ाया जाए. ताकि अदालत यह तय कर सके कि धर्मनिरपेक्ष संवैधानिक अदालत किस हद तक धर्म और शास्त्रों के मामलों में घुसकर यह तय कर सकती है कि किसी समुदाय के लिए अनिवार्य या आधारभूत धार्मिक परंपरा क्या है.

लेकिन अम्मिनी और तृप्ति साई जैसे महिलाएं इस तर्क से संतुष्ट नहीं हैं. बिंदू अम्मिनी सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद इस साल जनवरी में सबरीमाला मंदिर में प्रवेश करने वाली शुरुआती महिलाओं में शामिल थीं. वह कहती हैं कि ताज़ा आदेश हिंदुत्ववादी संगठनों की राजनीतिक इच्छा में बदल सकता है.

अम्मिनी कहती हैं, "अयोध्या विवाद पर आए ताज़ा फ़ैसले के बाद डर है कि लोकतंत्र ख़तरे में है और सबरीमाला मामले को राजनीतिक हितों को साधने में इस्तेमाल किया जाएगा."

फ़िलहाल, एक्टिविस्ट तृप्ति देसाई इस बात पर दृढ़ हैं कि वह सबरीमाला मंदिर जाएंगी. वह कहती हैं कि कोर्ट ने उन्हें इसका आदेश दिया है और इस पर कोई स्टे भी नहीं लगा है. वह फिर दोहराती हैं, "वे मुझे नहीं रोक सकते."

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