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धर्मेंद्र प्रधान को बीजेपी ने क्यों सौंपी उत्तर प्रदेश चुनाव की कमान?

केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान
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केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान

उत्तर प्रदेश में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव के मद्देनज़र बीजेपी ने हाई प्रोफ़ाइल मंत्रियों के साथ एक बड़ी टीम का एलान किया है जो ख़ासतौर पर चुनाव के लिए बनाई गई है.

इस टीम का नेतृत्व केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान कर रहे हैं और सात सह-प्रभारियों में केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर भी शामिल हैं.

इनके अलावा, अर्जुन राम मेघवाल, सरोज पांडेय, शोभा करंदलाजे, कैप्टन अभिमन्यु, अन्नपूर्णा देवी और विवेक ठाकुर को सह-प्रभारी बनाया गया है.

बताया जा रहा है कि इन नेताओं के ज़रिए केंद्रीय नेतृत्व ने यूपी में जातीय समीकरण साधने की कोशिश की है. पहले से ही राज्य में प्रभारी के तौर पर मौजूद पूर्व केंद्रीय मंत्री राधामोहन सिंह की चुनाव प्रक्रिया में भूमिका क्या होगी, इस बारे में पार्टी के नेताओं के पास कोई ठोस जवाब नहीं है.

हाल ही में हुए केंद्रीय मंत्रिमंडल के विस्तार में धर्मेंद्र प्रधान को कैबिनेट मंत्री के तौर पर पदोन्नत करते हुए जब प्रधानमंत्री ने उन्हें अति महत्वपूर्ण शिक्षा मंत्रालय जैसा विभाग दिया, तभी पार्टी और सरकार में उनके महत्व पर चर्चाएं शुरू हो गई थीं. उसके बाद यूपी जैसे सबसे बड़े और राजनीतिक रूप से अहम राज्य का चुनाव प्रभारी बनाना उस महत्व को और ज़्यादा बल देता है.

हालांकि, धर्मेंद्र प्रधान इससे पहले भी कई राज्यों के प्रभारी रहे हैं और इस भूमिका में उनके नेतृत्व में बीजेपी ने बिहार समेत कई राज्यों में बेहद अच्छा प्रदर्शन किया है.

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में नंदीग्राम सीट पर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की हार के पीछे भी धर्मेंद्र प्रधान के रणनीतिक कौशल को देखा जा रहा है. जानकारों के मुताबिक़, यूपी में भी धर्मेंद्र प्रधान को चुनाव प्रभारी बनाकर भेजने के पीछे यही कारण हैं, लेकिन इन सबके अलावा कुछ और भी वजहें हैं जो धर्मेंद्र प्रधान के इस ख़ास राजनीतिक महत्व के पीछे हैं.

क्या हैं वजहें?

लखनऊ में वरिष्ठ पत्रकार सिद्धार्थ कलहंस कहते हैं, "पहली बात तो यूपी में इस समय पार्टी के भीतर जो ख़ेमेबाज़ी चल रही है, उसे रोकने की ये कोशिश है क्योंकि धर्मेंद्र प्रधान समेत सभी पदाधिकारी ऐसे हैं जिनका सीधे तौर पर यूपी में कोई हस्तक्षेप नहीं रहा है तो इन लोगों के लिए पसंद और नापसंद जैसी बात नहीं होगी. दूसरी बात, स्थानीय नेताओं के बीच सामंजस्य के लिए इन्हें उपयुक्त माना गया है और शायद ये ऐसा कर भी पाएं. अलग-अलग क्षेत्रों के भी जो प्रभारी हैं उन्होंने भी कभी यहां काम नहीं किया है. तो इनमें कोई पूर्वाग्रह नहीं होगा."

हालांकि, सामाजिक समीकरणों के अलावा धर्मेंद्र प्रधान को ख़ास महत्व देने के पीछे उनके ओडिशा से होने को भी माना जा रहा है.

यूपी विधानसभा चुनाव में पिछड़ा वर्ग इस समय बीजेपी के लिए चुनौती बना हुआ है क्योंकि साल 2014 के लोकसभा चुनाव से लेकर साल 2017 के विधानसभा और साल 2019 के लोकसभा चुनाव तक यह वर्ग बड़ी संख्या में पार्टी का समर्थक रहा था, लेकिन पिछले कुछ दिनों से राजभर और निषाद समेत कुछ ओबीसी वर्ग उससे छिटक गए हैं. साल 2017 में बीजेपी को मिले भारी बहुमत के पीछे इन छोटे-छोटे समूहों का ख़ासा योगदान रहा.

इन्हीं समीकरणों को ध्यान में रखते हुए पार्टी ने पिछड़ा वर्ग से आने वाले धर्मेंद्र प्रधान को राज्य का चुनाव प्रभारी बनाया है. इसके अलावा, छत्तीसगढ़, बिहार, कर्नाटक और झारखंड राज्य में प्रभारी रहते हुए प्रधान ने ओबीसी के बड़े तबक़े को पार्टी से जोड़ने का भी काम किया था.

यही नहीं, जानकारों की मानें तो बीजेपी का केंद्रीय नेतृत्व साल 2024 में लोकसभा चुनाव और ओडिशा विधानसभा चुनाव को देखते हुए भी धर्मेंद्र प्रधान को ख़ासा महत्व दे रहा है.

केंद्रीय मंत्री राधामोहन सिंह
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केंद्रीय मंत्री राधामोहन सिंह

राधामोहन सिंह के साथ मुश्किलें

जानकारों का कहना है कि यूपी के प्रभारी रहते हुए कई नेता तुरंत पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने हैं, चाहे वो अमित शाह हों, जेपी नड्डा हों या फिर वेंकैया नायडू हों.

दिल्ली में पार्टी के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं, "ओडिशा विधानसभा चुनाव और साल 2024 में लोकसभा चुनाव को देखते हुए धर्मेंद्र प्रधान अगले राष्ट्रीय अध्यक्ष भी बना दिए जाएं तो कोई आश्चर्य नहीं. वो युवा हैं, ओबीसी हैं और ओडिशा से हैं. लेकिन, यह सब इस बात पर निर्भर करेगा कि यूपी में उनके नेतृत्व में प्रदर्शन कैसा रहेगा."

हालांकि, राधामोहन सिंह के रहते हुए भी चुनाव प्रभारी के तौर पर धर्मेंद्र प्रधान और उनकी टीम को यूपी भेजने के पीछे राज्य बीजेपी में चल रहे आंतरिक गतिरोध को भी कारण माना जा रहा है.

बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, "राधामोहन सिंह का प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह और संगठन मंत्री सुनील बंसल से तो अच्छा तालमेल है, लेकिन मुख्यमंत्री के साथ वो तालमेल नहीं बैठा पा रहे थे. यही नहीं, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पिछले दिनों कुछ विधायकों से निजी तौर पर बात की और उन्हें आश्वस्त किया कि वो क्षेत्र में अच्छा काम करें तो उन्हें दोबारा टिकट मिल जाएगा. शायद इसी वजह से चुनाव प्रभार देकर एक पूरी टीम ही भेज दी गई ताकि निष्पक्ष तरीक़े से टिकट वितरण के बारे में केंद्रीय नेतृत्व फ़ैसला ले सके."

इस तरह साधे जातीय समीकरण

हालांकि, इन तर्कों की तुलना में सामाजिक समीकरण साधने के तर्क कहीं ज़्यादा प्रभावी दिख रहे हैं क्योंकि प्रभारी के साथ ही सह-प्रभारियों की नियुक्ति भी जातीय समीकरणों को साधने के मक़सद से की गई है. यह भी ध्यान में रखा गया है कि इन नेताओं की यूपी में अब तक कोई ख़ास भूमिका या दिलचस्पी न रही हो.

मसलन, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसान आंदोलन की वजह से मज़बूत हो चुके जाट-मुस्लिम समीकरण की तोड़ के रूप में हरियाणा के पूर्व मंत्री कैप्टन अभिमन्यु को भी इस टीम में रखा गया है.

बीएसपी के ब्राह्मण सम्मेलनों की काट के तौर पर छत्तीसगढ़ से सांसद सरोज पांडेय को जगह दी गई है तो क्षत्रिय समाज से हिमाचल के रहने वाले और केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर भी इस टीम के सदस्य हैं. राज्य सभा सदस्य सरोज पांडेय छत्तीसगढ़ में विधायक भी रही हैं और मूल रूप से पूर्वी उत्तर प्रदेश की रहने वाली हैं.

दलितों और पिछड़ों को साधने के लिए पार्टी ने केंद्रीय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल को सहप्रभारी बनाया है तो भूमिहार वर्ग में संदेश देने के लिए बिहार में बीजेपी के वरिष्ठ नेता सीपी ठाकुर के बेटे विवेक ठाकुर को भी इस टीम में शामिल किया गया है.

हालांकि, इस बात को लेकर भी आशंकाएं जताई जा रही हैं कि धर्मेंद्र प्रधान और अनुराग ठाकुर इतने महत्वपूर्ण मंत्रालयों की ज़िम्मेदारी के साथ ही चुनाव प्रभारी और सह-प्रभारी की भूमिका का निर्वहन कैसे कर पाएंगे? वो भी तब, जबकि इन्हें यूपी की राजनीति को समझने का इससे पहले कोई ख़ास अनुभव भी नहीं रहा है.

पार्टी के केंद्रीय संगठन के एक महत्वपूर्ण पदाधिकारी नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं कि 'यह नियुक्ति दरअसल इसीलिए की गई है ताकि चुनाव प्रबंधन से लेकर टिकट वितरण तक की कमान केंद्रीय नेतृत्व के हाथ में रहे.'

वरिष्ठ पत्रकार योगेश मिश्र कहते हैं, "धर्मेंद्र प्रधान बीजेपी के लिए शुभ हैं और बीजेपी इन बातों को ख़ासा महत्व देती है. इसके अलावा पेट्रोलियम मंत्री रहते हुए धर्मेंद्र प्रधान को उज्ज्वला योजना ने पूरे देश में एक पहचान दी. बदले परिवेश और बदली राजनीति में राधामोहन सिंह फ़िट नहीं बैठते हैं, लेकिन धर्मेंद्र प्रधान और यह टीम इसमें पूरी तरह से फ़िट है. पूरी टीम या तो विद्यार्थी परिषद वाली है या फिर युवा मोर्चा से आए नेताओं वाली."

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