UCC पर अब भाजपा को रोक पाना क्यों मुश्किल है? अमित शाह के वादे से मिल गई नई धार!
यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) भाजपा का एकमात्र मूल एजेंडा बाकी रह गया है, जो अबतक पूरे देश में तामील नहीं हुआ है। बीजेपी शासित कुछ राज्यों में यह हकीकत बन चुका है और कुछ में यह प्रक्रिया के दौर से गुजर रहा है। इसी कड़ी में झारखंड विधानसभा चुनाव प्रचार के लिए पहुंचे केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने भी राज्य में बीजेपी की सरकार बनने पर समान नागरिक संहिता लागू करने का वादा कर दिया है।
लेकिन, अमित शाह ने झारखंड में यूसीसी लागू करने के अपने वादे के साथ ही एक बड़ी सियासी लकीर भी खींच दी है, जिससे लगता है कि अब पार्टी को इस मुद्दे पर राष्ट्रीय स्तर पर खुलकर बैटिंग करने में दिक्कत नहीं होगी। शाह ने पूरी तरह से स्पष्ट कर दिया है कि वह जो यूसीसी लागू करना चाहते हैं, आदिवासियों को उसके दायरे से बाहर रखा जाएगा।

संविधान निर्माताओं की सोच से निकला है यूसीसी
तथ्य यह है कि यूनिफॉर्म सिविल कोड की सोच कोई बीजेपी या आरएसएस के विचारधारा से नहीं निकला है। इसकी व्यवस्था संविधान निर्माता संविधान में ही करके गए हुए हैं, लेकिन मात्र सियासी वजहों से यह अभी तक राजनीतिक मुद्दा बना हुआ है और इसे एक समान रूप से पूरे देश में अमल में लाने की चर्चा ही होती आई है।
यूसीसी के दायरे से आदिवासियों को बाहर रखकर आगे बढ़ेगी बीजेपी!
इसके साथ ही अमित शाह नरेंद्र मोदी सरकार के उन लोगों में शामिल हो चुके हैं, जिन्होंने यह कहा है कि वह देश के सिविल कोड में एकरूपता तो चाहते हैं, लेकिन आदिवासी संस्कृति के संरक्षण के लिए उसे इस कानून से बाहर रखना चाहते हैं। बीजेपी को अपने मूल एजेंडे पर आगे बढ़ने में आदिवासियों की संस्कृति और परंपरा बहुत बड़ी अड़चन थी, लेकिन अब पार्टी पूरी तरह से अपना राजनीतिक स्टैंड साफ कर चुकी है।
जनसंघ के जमाने से हो रही है यूसीसी की मांग
दरअसल, बीजेपी जनसंघ के जमाने से देश में यूसीसी लागू करने की मांग करती रही है। इसके अलावा अयोध्या में पवित्र राम जन्मभूमि पर भव्य मंदिर बनने का उसका सपना पूरा हो चुका है और जम्मू और कश्मीर से आर्टिकल-370 भी यही मोदी सरकार समाप्त कर चुकी है। बीजेपी का सवाल रहा है कि एक धर्मनिरपेक्ष देश में मुस्लिम पर्सन लॉ रहने का औचित्य क्या है?
यूसीसी से आदिवासियों को अलग रखने की कई बीजेपी नेता कर चुके हैं वकालत
वैसे अमित शाह से पहले कई भाजपा नेताओं ने भी यही लाइन ली है कि यूसीसी लागू करना आवश्यक है, लेकिन इसके दायरे में आदिवासी समाज को लाना सही नहीं है। मसलन, जुलाई 2023 में भाजपा के दिवंगत नेता सुशील कुमार मोदी ने कहा था कि पूर्वोत्तर के राज्य के आदिवसियों को यूसीसी के दायरे से अलग रखना चाहिए। तब वे कार्मिक, जन शिकायतें, विधि और न्याय मामलों पर संसद की स्थायी समिति के अध्यक्ष थे। उन्होंने विधि आयोग में इसपर चर्चा के संदर्भ में ये कहा था।
उसी महीने केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने भी अरुणाचल प्रदेश में भी आदिवासियों को लेकर इसी तरह की बात सामने रखी थीं और संवैधानिक व्यवस्थाओं का भी हवाला दिया था। तबके एक और केंद्रीय मंत्री एसपी सिंह बघेल ने कहा था कि 'तुष्टिकरण की राजनीति' यूसीसी को नहीं रोक सकती, लेकिन सरकार आदिवासियों की परंपरा में दखल नहीं देगी।
असम, उत्तराखंड हर जगह यूसीसी से आदिवासी हैं बाहर
इस साल की शुरुआत में असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने कहा था कि उत्तराखंड और गुजरात के बाद समान नागरिक संहिता (यूसीसी) लागू करने वाला असम तीसरा राज्य बन जाएगा। लेकिन, उन्होंने यह भी तभी स्पष्ट कर दिया था कि इसके दायरे से आदिवासी बाहर रहेंगे। उत्तराखंड के यूसीसी के मसौदे से भी आदिवासी परंपराओं और रिवाजों को अलग रखा गया है।
मतलब, भारतीय जनता पार्टी की ओर से अब इस एजेंडे पर धीरे-धीरे पूरे देश में आगे बढ़ने का संदेश साफ तौर पर मिल रहा है। क्योंकि, पार्टी किसी भी कीमत पर आदिवासी वोट बैंक को परेशान नहीं करना चाहती थी।












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