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देवांशी सांघवी जैसे बच्‍चे क्‍यों बन रहे संन्‍यासी ? जानें साधु-साध्वी बनकर जीना पड़ता है कैसा कठिन जीवन

देवांशी सांघवी जैसे बच्‍चे क्‍यों बन रहे संन्‍यासी ?आखिर ऐसा क्‍या होता है और कौन सी ऐसी वजह है कि जैन धर्म में बड़े तो बड़े देवांशी सांघवी जैसे बच्‍चे तक दीक्षा लेकर साधू- साध्‍वी बन जाते हैं

Why children become monks: गुजरात के सूरत की एक नौ साल की बच्‍ची देवांशी सांघवी की हर ओर चर्चा हो रही है, वजह ये है कि हीरा व्‍यवसायी की नन्‍हीं सी बेटी ने अपनी आलीशान जिंदगी छोड़कर साध्‍वी बन चुकी हैं। जैन गुरु से दीक्षा लेकर संन्‍यास धारण करने वाली देवांशी की देश ही नहीं विदेश में भी चर्चा हो रही है। आलीशान और आराम की जिंदगी छोड़कर संन्‍यासी बनने वाली देवांशी को देखकर हर किसी के मन ये ही सवाल कौंध रहा है कि इतनी कम उम्र में ऐसा त्‍याग? आखिर ऐसा क्‍या होता है और कौन सी ऐसी वजह है कि जैन धर्म में बड़े तो बड़े देवांशी सांघवी जैसे बच्‍चे तक दीक्षा लेकर साधू- साध्‍वी बन जाते हैं ?

देवांशी ने नहीं देखा कभी टीवी, 357 दीक्षा और 500 किमी पैदल विहार कर चुकी हैं

देवांशी ने नहीं देखा कभी टीवी, 357 दीक्षा और 500 किमी पैदल विहार कर चुकी हैं

देवांशी सांघवी जो आने वाले कुछ सालों में करोड़ो के हीरा बिजनेस की मालकिन होती लेकिन उन्‍होंने हंसते हुए सब कुछ त्‍याग दिया और साध्‍वी बन गई। देवांशी के बारे में बताया जाता है कि जब वो दो साल की थी तभी उनके मन में वैराग्य आ गया था। हिंदी, अग्रेजी, संस्कृत, जारवाड़ी और गुजराती पांच भाषाओं में पारंगत देवांशी हमेशा साधुओं के सानिध्‍य में रहना पसंद करती थीं। महीने में दस दिन गुरु भगवंतों के साथ रहती थीं। देवांशी ने कभी टीवी नहीं देखा। इतनी कम उम्र में 357 दीक्षा, 500 किलोमीटर पैदल विहार, तीर्थों की यात्रा और जैन धर्म ग्रंथों का वाचन तक कर चुकी हैं। कई साल के त्याग के बाद देवांशी ने संन्यास की राह पर चलने का फैसला किया।

2020 में 65 लोगों ने दीक्षा ली, जिनमें17 की उम्र 20 साल से कम थी

2020 में 65 लोगों ने दीक्षा ली, जिनमें17 की उम्र 20 साल से कम थी

हालांकि देवांशी ही नहीं पिछले कुछ सालों में बड़ी संख्‍या में लोग करोड़ो की संपत्ति को त्‍यागकर जैन धर्म गुरु से दीक्षा लेकर साधू या साध्‍वी बने हैं 2020 में सूरत में ऐसे ही 65 लोगों ने आलीशान जिंदगी छोड़कर दीक्षा लेकर संन्‍यास ग्रहण कर लिया था। इनमें से बहुत से 17 की उम्र 20 साल से भी कम थी। जैन धर्म में संन्‍यास लेने के बाद साधू और साध्‍वी बनने पर पर जीवन बहुत कठिन होता है, फिर भी संपूर्ण सुख सुविधाओं, परिवार और सांसरिक मोह माया को त्‍यागकर देवांशी सांघवी जैसे लोग धर्म के पथ पर हंसते हुए निकल पड़ते हैं।

भौतिक सुख का त्‍याग कर बिताना होता है कठिन जीवन

भौतिक सुख का त्‍याग कर बिताना होता है कठिन जीवन


जैन धर्म में दीक्षा लेकर संन्‍यासी बनने वाले साधु साध्‍वी को सभी भौतिक सुख और सुविधाओं को त्‍याग करना होता है। संन्‍यास की राह पर चलकर ये अपना पूरा जीवन समर्पित कर देते हैं। जैन धर्म में इसे चरित्र'या 'महानिभिश्रमण'कहा जाता है।

क्‍यों लेते हैं दीक्षा

क्‍यों लेते हैं दीक्षा

जैन धर्म में जो सांसरिक जीवन त्‍याग कर साधु- साध्‍वी बने उनमें से अधिकांश ने ये ही बताया कि संसारिक सुख उन्‍हें प्रभावित नहीं करता था, उन्‍हें उससे कोई सुख नहीं मिलता था। साधारण जीवन बिताते हुए खुद को भगवान की भक्ति में डूबो देने की ही इच्‍छा रहती थी। जैन धर्म में कम उम्र में मुनियों और साधु साध्वियों को देखकर हमेशा प्रभावित होते, और मुनियों की जीवन शैली ही जीवन का उद्देश्‍य लगने लगता है। मन में वैराग्य आ जाता है। जैन धर्म के अधिकांश परिवार का धर्म के प्रति आस्‍था और विश्‍वास भी बच्‍चों को इस बात के लिए प्रेर‍ित करता है। .

दीक्षा लेने के बाद के पांच व्रत

दीक्षा लेने के बाद के पांच व्रत

  • अहिंसा का व्रत लेते हुए किसी भी जीवित प्राणी को तन, मन या व्‍यवहार से नुकसान नहीं पहुंचाना
  • हमेशा सत्‍य बोलना और सच का साथ देना
  • ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए अपनी सभी इंन्द्रियों को काबू में रखना
  • अपरिग्रह का व्रत यानी जीवित रहने के लिए जितनी जरूरत हो उतना ही अपने पास रखना
  • अस्तेय का मतलब किसी पर बुरी नजर नहीं डालना लालच नहीं करना

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    साधू और साध्‍वी बनने के बाद का जीवन

    साधू और साध्‍वी बनने के बाद का जीवन

    • पैर में चप्‍पल तक नहीं पहनते, ताकी अनजाने में कोई प्राणी को उनसे क्षति ना हो, चलते समय ये साधू साध्‍वी अपने पैरों के नीचे चीटीं तक आने नहीं देते।
    • साधु और साध्वियों को संन्‍यासी बनने का आखिरी चरण पूरा करने के लिए उन्‍हें अपने बाल अपने हाथ से नोंचना कर सिर से अलग करना पड़ता है।
    • संन्‍यासी बनने के बाद केवल सफेद सूती कपड़े ही पहनने होते है।
      सूर्यास्‍त के बाद अन्‍न क्‍या पानी की एक बूंद भी नहीं खा सकते।
    • अनुशासितल और संयमित जीवन जीते हैं, साधू-साध्‍वी हर दिन लोगों के घर में जाकर भिक्षा मांगकर भोजन करते हैं। इस परंपरा को गोचरी कहा जाता है।

    • गोचरी में एक ही घर से बहुत मात्रा में भोजन लेने के इजाजत नहीं होती है, जैसे गाय कई घरों के दरवाजे पर जाकर थोड़ा-थोड़ा भोजन ग्रहण करती है वैसे ही साध्‍वी और साधु को भी अनुसरण करना होता है।
    • साध्‍वी या साधु अपने आप कभी भी भोजन नहीं बना सकते भीक्षा लेकर ही इन्‍हें खाने की इजाजत होती है। केवल शाकाहारी जैन परिवारों में ही भीक्षा मांग समते हैं।
    • जैन धर्म में संन्‍यासी बनने के बाद ये साधू और साध्‍वी किसी भी वाहन की सवारी नहीं कर सकते। इन्‍हें विहार के लिए पैदल ही नंगे पैर चलना पड़ता है। तेज धूप हो या कड़ाके की ठिठुरती ठंड ये पैदल चलकर ही कई किलोमीटर की यात्रा करते हैं।
    • बरसात के 4 महीनों को छोड़कर ये जैन साधु संत साल भर पैदल यात्रा करते है। इसके पीछे वजह है कि एक ही जगह पर इन्‍हें लंबे समय तक प्रवास करने की अनुमति भी नहीं है।

    • जैन धर्म के साधू संत को अपने पास एक भी रुपया रखने की इजाजत नहीं है। जीवन जीने के लिए अति आवश्‍यक वस्‍तुएं इन्‍हें भीक्षा में ही मिलती है। जिसके आधार पर अपना पूरा जीवन धर्म का समर्पित कर जीते हैं ।

    इसलिए मैं अक्सर न्‍यूड रहती हूं....उर्फी जावेद ने बताया क्‍यों नहीं पहनती पूरे कपड़े

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