लोकसभा चुनाव 209: जानिए बीजेपी, कांग्रेस के लिए अपना दल यूपी में क्यों जरूरी है

नई दिल्ली: लोकसभा चुनाव को लेकर बीजेपी और कांग्रेस दोनों की नजरे उत्तर प्रदेश में हैं। सपा-बसपा गठबंधन के बाद बीजेपी पर 2019 का प्रदर्शन दोहराने का दवाब बढ़ गया है। वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस यूपी में दोबारा खड़ा होने की कोशिश कर रही है। इसलिए उसने प्रियंका गांधी को मैदान में उतारकर मास्टर स्ट्रोक खेला है। लेकिन सपा-बसपा गठबंधन ने बीजेपी को झटका देने के साथ ही कांग्रेस को गठबंधन में शामिल ना करके झटका दिया है। ऐसे में दोनों पार्टियां छोटे दलों से गठबंधन कर चुनाव मैदान में उतर रही हैं।

बीजेपी-कांग्रेस ने अपना दल के साथ किया गठबंधन

बीजेपी-कांग्रेस ने अपना दल के साथ किया गठबंधन

उत्तरप्रेदश में बीजेपी, कांग्रेस और सपा-बसपा-रालोद के महागठबंधन के बीच यूपी में त्रिकोणीय संघर्ष ने दोनों राष्ट्रीय दलों को छोटे दलों के साथ गठबंधन करने के लिए मजबूर कर दिया है। विशेष रूप से उन दलों से जिनका अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) में वोटों का आधार एक ही है। बीजेपी और कांग्रेस दोनों ने अपना दल के घटकों के साथ गठबंधन किया है। लोकसभा सांसद और केंद्र में मंत्री अनुप्रिया पटेल की अगुवाई वाले अपना दल(सोनोवाल) एनडीए का हिस्सा है। वहीं दूसरी तरफ उनकी मां कृष्णा पटेल की अगुवाई वाले दल के साथ कुछ दिनों पहले कांग्रेस ने सीटों को लेकर समझोता किया है।

बीजेपी और कांग्रेस ने अपना दल को दी सीटें

बीजेपी और कांग्रेस ने अपना दल को दी सीटें

बीजेपी और कांग्रेस दोनों दलों ने अपना दल को दो-दो सीटों दी हैं। अनुप्रिया पटेल खुद मिर्जापुर से लड़ेंगी वहीं वो एक सीट से अपना उम्मीदवार उतारेंगी। वहीं उनकी माता कृष्णा पटेल की अगुवाई वाला अपना दल ,जिसे कांग्रेस ने पीलीभीत और गोंडा सीट दी है। वो वहां से अपने उम्मीदवार उतारेंगी। पूर्वी उत्तर प्रदेश में कुर्मी मतदाताओं के बीच दोनों क्षेत्रीय दलों की पर्याप्त हिस्सेदारी है। साल 2014 में, अविभाजित अपना दल को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता के कारण यूपी में दो सीटों पर जीत मिली थी। लेकिन इस बार, मां और बेटी के बीच प्रतिद्वंद्विता के परिणाम पर असर पड़ सकता है।

भाजपा-कांग्रेस की नजर कुर्मी-पटेल वोटर पर

भाजपा-कांग्रेस की नजर कुर्मी-पटेल वोटर पर

भाजपा के एक नेता ने कहा कि यूपी में पटेल या कुर्मी मतदाता समाजवादी पार्टी (सपा) और अपना दल के बीच बंटा हैं। भाजपा का उद्देश्य इन वोटों का एक हिस्सा प्राप्त करना है जो सीट जीतने के लिए भाजपा के मौजूदा वोट शेयर को और अधिक मजबूत कर सकता है। पिछली बार इस रणनीति ने काम किया था। लेकिन इस बार कृष्णा पटेल और अनुप्रिया पटेल के बीच तल्खी है। पूर्वी उत्तर प्रदेश की कम से कम चार सीटों पर चुनावी मुकाबला अहम होगा। वहीं कांग्रेस के लिए, अपना दल के साथ गठबंधन मुख्य रूप से छोटे क्षेत्रीय दलों के माध्यम से अपने समर्थन को बढ़ाना है। साल 2014 में उसे राज्य की 80 लोकसभा सीटों में से केवल दो सीटे मिली थी। ऐसे में कांग्रेस कई छोटे क्षेत्रीय दलों के साथ गठजोड़ करके मौके बढ़ाना चाहती है।
अपना दल के अलावा कांग्रेस ने जन अधिकार पार्टी के साथ भी गठबंधन किया है, जिनका ओबीसी में मजबूत आधार है। राज्य के पूर्व मंत्री बाबू सिंह कुशवाहा, जो कभी बसपा प्रमुख मायावती के करीबी विश्वासपात्र थे। कांग्रेस ने JAP के लिए पांच संसदीय सीटें छोड़ी हैं।

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