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लोकसभा चुनाव 2019: लालू के कुनबे में नए झगड़े से किसे होगा फायदा?

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नई दिल्ली- लालू यादव जेल में घोटाले की सजा काट रहे हैं। उनकी गैर-मौजूदगी में उनके घर की जो बातें सामने आ रही हैं, उससे लगता है कि परिवार में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। कुछ समय से चर्चा से दूर रहने के बाद गुरुवार को उनके बड़े बेटे तेज प्रताप यादव अचानक मीडिया के सामने आए और एक साथ कई बड़े धमाके कर गए। ऐसे समय में जब चुनाव सिर पर है, सहयोगियों के साथ एक-एक सीट को लेकर जिच कायम है, कुनबे में जारी सिर फुटौव्वल गठबंधन का बेड़ा गर्क कर सकता है।

'कृष्ण' ने 'अर्जुन' के सामने डाले हथियार!

'कृष्ण' ने 'अर्जुन' के सामने डाले हथियार!

गुरुवार को मीडिया के सामने आकर तेज प्रताप ने जैसे ही शिवहर और जहानाबाद की लोकसभा सीटों के लिए अपने दो उम्मीदवारों के नामों का ऐलान किया, तभी जाहिर हो गया कि उनका तेजस्वी के साथ मतभेद और गहरा गया है। उन्होंने क्षेत्र की जनता की मांग का हवाला देकर शिवहर से अंगेश सिंह और जहानाबाद से चंद्र प्रकाश को टिकट दिए जाने की बात कह दी। उन्होंने दावा किया था कि इस बारे में तेजस्वी भी सहमति जता चुके हैं और उनके साथ वो प्रेस कॉन्फ्रेंस भी करने वाले थे, लेकिन किसी वजह से उसे टाल दिया गया है। लेकिन, थोड़ी ही देर बाद उन्होंने ट्विटर पर जो बम फोड़ा, उससे जाहिर हो गया कि छोटे भाई तेजस्वी से अपनी बात मनवाने में नाकाम हो गए हैं। उन्होंने लिखा,"छात्र राष्ट्रीय जनता दल के संरक्षक के पद से मैं इस्तीफा दे रहा हूं। नादान हैं वो लोग जो मुझे नादान समझते हैं। कौन कितने पानी में है,सबकी खबर है मुझे।" यानि तेज प्रताप नाराज हैं, इसलिए उन्हें इस्तीफा देना पड़ा है। उनकी नाराजगी के कारण कौन हैं, उसका इशारा भी वो कर चुके हैं। यानि लालू की विरासत के महाभारत में 'कृष्ण' ने 'अर्जुन' के सामने हथियार डाल दिए हैं। 'कृष्ण' इसलिए क्योंकि तेज प्रताप खुद को इसी रूप में पेश करना पसंद करते है और 'अर्जुन' उनके छोटे भाई तेजस्वी यादव के लिए, जिन्हें वे यही उपमा देते आए हैं।

परिवार में दबदबे की 'जंग'

परिवार में दबदबे की 'जंग'

तथ्य ये है कि लालू यादव ने खुद ही अपनी विरासत का उत्तराधिकार छोटे बेटे तेजस्वी के हाथों में सौंपा है। हालांकि, जब उन्होंने ये फैसला किया होगा तब शायद उन्हें भी यह अंदाजा नहीं रहा होगा कि उनका यही निर्णय एक दिन परिवार में दरार की वजह बनेगा। आज स्थिति है कि तेजस्वी के सामने तेज प्रताप का कोई सियासी वजूद नहीं है। परिवार में न सही पार्टी में उनके सामने तेज प्रताप की कोई हैसियत नहीं है। वह ज्यादा से ज्यादा सलाहकार की भूमिका निभा सकते हैं, जिसे मानना या न मानना तेजस्वी के हाथों में है। इसी साल 3 जनवरी की बात है। तब तेज ने पाटलिपुत्र संसदीय क्षेत्र से बहन मीसा भारती की उम्मीदवारी की घोषणा कर दी थी। उस समय तेजस्वी ने मीडिया की मौजूदगी में न सिर्फ उनका विरोध किया, बल्कि अनुशासन में रहने की हिदायत तक दे डाली।

पिछले साल दिसंबर की बात है तेज प्रताप ने बिहार के सभी लोकसभा क्षेत्रों में बदलाव यात्रा निकालने की बात कही थी। दावा किया कि इसमें तेजस्वी भी शामिल होंगे। माना गया कि छोटे भाई को सीएम बनाने की घोषणा करके वे पार्टी की कमान अपने हाथ में रखना चाहते हैं। इस साल 2 फरवरी से उन्होंने यात्रा शुरू भी की, लेकिन न उससे तेजस्वी जुड़े और न ही उसको लेकर उन्होंने कभी कुछ कहने की जरूरत समझी। बदलाव यात्रा से ठीक पहले यानि 26 जनवरी को पता चला कि बड़े भाई आरजेडी दफ्तर जा रहे हैं, लेकिन उससे पहले ही उसके मेनगेट पर ताला जड़ दिया गया। तेज प्रताप ने गुस्से में प्रदेश अध्यक्ष रामचंद्र पूर्वे पर भड़ास निकाली। लेकिन, क्या बिना तेजस्वी के इशारे के पूर्वे ऐसा करने की हिम्मत कर पाते? ये बात तब और पुख्ता हो गई जब पार्टी कार्यालय में लगने वाला तेज प्रताप का जनता दरबार कार्यक्रम भी रद्द कर दिया गया।

दरअसल, पत्नी से तलाक मामले के बाद से तेज प्रताप परिवार और पार्टी में तेजी से अलग-थलग पड़ने लगे हैं। उनकी हरकतों के चलते पार्टी और कार्यकर्ताओं में छोटे भाई का कद बढ़ने लगा। आरोप लगाए जाते हैं कि तेजस्वी ने धीरे-धीरे बहन मीसा और बड़े भाई को दरकिनार कर पार्टी पर अपनी पकड़ काफी मजबूत कर ली है।

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महागठबंधन में उलझन

महागठबंधन में उलझन

लालू परिवार में मचे घमासान का असर ये हुआ है कि आरजेडी का गठबंधन बुरी तरह से उलझ गया है। सांसद राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव ने सीटों के तालमेल की परवाह न करते हुए मधेपुरा सीट से पर्चा भर दिया है। गौरतलब है कि महागठबंधन के तहत यह सीट आरजेडी के टिकट से शरद यादव को दी गई है। पप्पू ने यहां तक कहा है कि उन्हें महागठबंधन से समर्थन नहीं मिलने का कोई मलाल नहीं है। वो जन अधिकार पार्टी के राष्ट्रीय संरक्षक हैं। पप्पू की इस हरकत ने तेजस्वी यादव को भी भड़का दिया है। उन्होंने कांग्रेस को चेतावनी दी है कि वो सुपौल से रंजीता रंजन की उम्मीदवार वापस ले नहीं तो आरजेडी वहां भी अपना प्रत्याशी उतार देगी। गौरतलब है कि कांग्रेस के टिकट पर सुपौल से चुनाव लड़ रहीं मौजूदा सांसद रंजीता रंजन पप्पू यादव की पत्नी हैं।

उधर दरभंगा और मधुबनी सीट को लेकर भी गठबंधन का पेंच नहीं सुलझ पा रहा है। कांग्रेस कीर्ति आजाद के लिए दरभंगा सीट लेना चाहती है, जबकि आरजेडी ने अपने पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अब्दुल बारी सिद्दीकी को वहां से उतारने का फैसला कर लिया है। उधर आरजेडी के ही एक और बड़े नेता मोहम्मद अली अशरफ फातमी मधुबनी से टिकट के लिए अड़े हुए हैं। उन्होंने इशारों में लालू के कई राज जानने की बात कहकर चेताने की भी कोशिश कर डाली है।

कुनबे की इस जंग से किसको फायदा?

कुनबे की इस जंग से किसको फायदा?

इस लोकसभा चुनाव में आरजेडी को लालू यादव की कमी जरूर खल रही होगी। वो जेल के कमरे से भले ही गोटी सेट करने में लगे हों, लेकिन एक चीज सुधरती है, तो उसकी बिगड़ जा रही है। जाहिर है कि आरजडी खेमे की इस गड़बड़ी का फायदा एनडीए को मिलने की संभावना है। वैसे भी एनडीए ने महीनों पहले राज्य की सीटों का बंटवारा कर लिया था। वहां गठबंधन को लेकर कोई पेंच नहीं है। नवादा से बेगूसराय भेजे जाने को लेकर केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह जरूर इधर-उधर की बातें कर रहे थे, लेकिन अमित शाह की 'डांट' ने उन्हें भी शांत करा दिया है। सबसे बड़ी बात ये है कि लालू के कुनबे की उलझन के मुकाबले एनडीए में वहां नीतीश कुमार और सुशील कुमार मोदी जैसे नेताओं की मौजूदगी है। ऐसे में अगर आरडेजी ने अपना घर और गठबंधन जल्दी ठीक नहीं किया, तो पहले से ही मजबूत माना जा रहा एनडीए उसपर और भी ज्यादा भारी पड़ सकता है।

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English summary
Who will benefit from the new feud in Lalu's clan?
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