Arvind Kejriwal के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2022 में उतरने से किसे होगा फायदा-किसे नुकसान?
नई दिल्ली- 2022 में उत्तर प्रदेश विधासभा का चुनाव लड़ने का ऐलान करके आम आदमी पार्टी सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल ने एक सियासी धमाका कर दिया है, लेकिन इसकी गूंज उत्तर प्रदेश में कहां तक सुनाई पड़ेगी कहना मुश्किल है। दिल्ली की सत्ताधारी पार्टी की ओर से राज्य में विधानसभा चुनाव लड़ने की घोषणा पहली बार की गई है, लेकिन वह पिछली दो बार से लगातार लोकसभा चुनावों में वहां अपनी भाग्य आजमा रही है। हालांकि, 2017 के विधानसभा चुनाव से वह पूरी तरह दूर रही थी। सवाल है कि केजरीवाल की घोषणा से यूपी में पहले से मजबूत राजनीतिक दलों की सेहत पर क्या असर पड़ेगा? क्या, वहां नए समीकरण बनेंगे? क्या यह बीजेपी के लिए खतरे की घंटी है या फिर इस पर भी असदुद्दीन ओवैसी की एमआईएम की तरह किसी की मदद या किसी पार्टी को नुकसान पहुंचाने के मकसद जैसे आरोप लगेंगे? क्योंकि, दिल्ली विधानसभा चुनाव में लगातार दो बार धमाकेदार जीत दर्ज करने वाली इस पार्टी का दिल्ली-एनसीआर में भी आजतक कोई प्रभावी वजूद नहीं दिखता है।

2014 में यूपी में कैसा परफॉर्मेंस था ?
दिल्ली में पहली बार 49 दिन की सनसनीखेज सरकार चलाने से उत्साहित आम आदमी पार्टी के मुखिया और दिल्ली के मौजूदा मुख्यमंत्री ने 2014 में राष्ट्रीय पार्टी का सुप्रीमो बनने का सपना देखा था। उन्होंने देश के 432 लोकसभा सुटों पर प्रत्याशी उतार दिए थे। खुद भाजपा के तब के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार और गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ ताल ठोकते हुए वाराणसी पहुंच गए थे। दावा किया था कि पार्टी कम से कम 100 सीटें जीतेगी और आम आदमी पार्टी के समर्थन के बिना कोई सरकार नहीं बन सकती। पार्टी देशभर में महज 2.07 फीसदी वोट जुटा सकी। यूपी की 80 सीटों में से 76 पर प्रत्याशी दिए थे, सिर्फ केजरीवाल को 20.30 फीसदी वोट मिले और सभी उम्मीदवारों की जमानतें जब्त हो गईं। नरेंद्र मोदी से केजरीवाल 3.5 लाख से भी ज्यादा वोटों से हार गए। उस चुनाव में अमेठी से पार्टी के तत्कालीन हाई प्रोफाइल नेता कुमार विश्वास को 'झाड़ू चल निकलने' के बाद भी सिर्फ 2.92 वोट मिले तो दिल्ली-एनसीआर की दोनों सीटों- गाजियाबाद और गौतम बुद्ध नगर में भी क्रमश: 6.64 फीसदी और 2.70 ही वोट मिल पाए।
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यूपी में कैसा था 2019 का प्रदर्शन?
केजरीवाल ने उम्मीद का दामन नहीं छोड़ा। लेकिन, 2014 में पार्टी के नेताओं पर टिकट की सौदेबाजी के गंभीर आरोप लगे तो 2019 में ज्यादा उम्मीद नहीं पालते हुए उत्तर प्रदेश की सिर्फ चार सीटों पर ही भाग्य आजमाने का फैसला किया, जिनमें से एक दिल्ली-एनसीआर की भी सीट थी। नतीजा 2014 से भी बुरा आया। पार्टी को सहारनपुर में सिर्फ 0.12 फीसदी, अलीगढ़ में 0.07 फीसदी, इलाहाबाद में सिर्फ 0.21 और दिल्ली के पड़ोस नोएडा या गौतम बुद्ध नगर में मात्र 0.04 फीसदी वोट प्राप्त हुए।

यूपी में आम आदमी पार्टी की चुनौती
आम आदमी पार्टी उत्तर विधानसभा का चुनाव लड़ने वाली है, जहां बीजेपी भारी बहुमत के साथ सत्ता में है और चुनाव जीतने की उसकी लय बरकरार है। नवंबर में विधानसभा की 7 सीटों पर उपचुनाव हुए हैं और पार्टी उनमें से 6 सीटें जीत गई है। एक सीट राज्य की मुख्य विपक्षी पार्टी सपा के खाते में गई है। दिल्ली में अरविंद केजरीवाल की पार्टी को चुनावों में भाजपा और कांग्रेस का ही सामना करना पड़ता है। उत्तर प्रदेश में बीजेपी, समाजवादी पार्टी के अलावा बहुजन समाज पार्टी की भी अपनी ताकत है। कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा पिछले कई महीनों से पार्टी के संगठन में जान फूंकने की कोशश कर रही हैं और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार को घेरने में सपा और बसपा को भी पीछे छोड़ रही हैं। यानि केजरीवाल का यहां सिर्फ योगी आदित्यनाथ के साथ ही टक्कर नहीं होने वाला है, अखिलेश यादव, मायावती और प्रियंका गांधी वाड्रा सबको पछाड़ते हुए अपनी पार्टी की मौजदूगी बनानी है।

केजरीवाल की पार्टी किसके जनाधार में लगा सकती है सेंध?
आज की तारीख में यूपी में भाजपा का जनाधार बहुत बड़ा है। मोटे तौर पर समाज के हर तबके के गैर-मुस्लिम वोटरों में उसकी पहुंच है। खासकर गैर यादव ओबीसी, अति-पिछड़ी जातियों, गैर-जाटव दलितों और सवर्णों के बीच उसका खासा दबदबा है। इसी तरह सपा मूल रूप से मुस्लिम-यादव समीकरण पर टिकी हुई है तो बीएसपी का जाटवों में बड़ा जनाधार है। कांग्रेस भी सवर्णों के साथ-साथ दलित और मुसलमानों का समीकरण बिठाने की ताक में है। अगर जाति और समुदायों के हिसाब से आंकलन करें तो आम आदमी पार्टी सबसे ज्यादा मुसलमान वोटरों को ही प्रभावित कर सकती है, लेकिन उसके लिए पहली शर्त ये है कि उसके उम्मीदवार भाजपा को हराने में सक्षम हों। अगर वह मुसलमान वोटरों के बीच अपने लिए जरा भी जगह बना पाती है तो सपा के लिए चिंता की बात हो सकती है, लेकिन इसकी संभावना नहीं के बराबर नजर आती है। अलबत्ता कुछ शहरी वोटरों में वो जरूर बीजेपी को थोड़ा नुकसान पहुंचा सकती है। इसी तरह शहरी इलाकों के दलित वोट बैंक में सेंध लगाकर वह बीजेपी और बीएसपी दोनों पर ही थोड़ा असर डाल सकती है। जब दिल्ली के सीएम के ऐलान के बाद वनइंडिया ने दिल्ली में आम आदमी पार्टी से जुड़े रहे एक पत्रकार से अनौपचारिक बात की तो उन्होंने सिर्फ इतना बोला कि 'लड़ने के लिए तो कोई कहीं से लड़ ले, लेकिन इसका चुनावों में कोई असर नहीं पड़ने वाला।'












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