'चोटी' के पीछे क्या है, कौन हैं, आइए इन दुशासनों को खोजें

कौन हैं चोटी के दुश्मन? कौन हैं बेटी के दुश्मन? मां-बाप को बेटी की चोटी की चिंता सता रही है तो खुद माएं भी नींद के आगोश में जाने से पहले अपनी चोटियों को बांधकर या छिपाकर रख रही हैं।

दिल्ली, हरियाणा, यूपी, राजस्थान...हर जगह ज़ुबां पर है चोटी। बात हिमालय की चोटी की नहीं हो रही है। बात हो रही है उस चोटी की, जिसके बारे में आशिक गुनगुनाया करते थे- "चोटी के पीछे चोटी...चोटी के नीचे हैं परांदा...परांदे नु दिल अटका..." मोहब्बत की देवियां भी इन चोटियों में ही, इन परांदों में ही मानो अपना दिल रखा करती थीं। 'वो' आते थे, मोहित हो जाते थे, नज़रों के कैमरे से नज़रें चुराते थे। चोटी वालियां शान से इतराती थीं, फूले नहीं समाती थीं, एक हसीन दुनियां में दोनों खो जाते थे। ये चोटी बालाओं का मान रहीं, मोहब्बत का अभिमान रहीं, गोपी-गोपियों की शान रहीं।

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    आज उन चित'चोरों' की बात नहीं हो रही है जो चोटियों और उनके परांदों में अटके दिल का पासा फेंकते थे, दिल के बदले दिल हासिल कर लेते थे, मोहब्बत का संसार बसा लेते थे। आज एक-दूसरे को दिल देने-दिलाने वाली वही चोटी खतरे में है। बालाएं, महिलाएं चोटियां छिपा रही हैं। मोहब्बत की हसरत का संसार दहशत के आतंक में डूबा हुआ है। चितेरा नहीं है वो, दिल का लुटेरा नहीं है वो। वह उस चोटी का ही हत्यारा है, उस चोटी का ही लुटेरा है जो चितेरों की, दिल के लुटेरों की कुटिया हुआ करती थी!

    इंसाफ मांगती रही हैं ऐसी घटनाएं

    क्या वह मोहब्बत का दुश्मन है! क्या उसे श्रृंगार से नफ़रत है! क्या वह अलौकिक प्रेम को मिटाने पर आमादा है! क्या उसकी बालाओं के चितचोर से कोई दुश्मनी है!...ऐसे कई आश्चर्यजनक खयालत हैं जिसने उन सबको बेचैन कर दिया है जिनकी चोटियां बाकी हैं यानी कटी नहीं हैं। चोटियां पहले भी कटी हैं, काटी गयी हैं लेकिन काटने वाले गुमनाम नहीं होते थे। कभी डायन बताकर, कभी चरित्रहीन बताकर, कभी चोरनी कहकर तो कभी कुछ और कहते हुए चोटियां काट ली गयी हैं, सिर मुंडा दिए गये हैं...ऐसी घटनाएं इंसाफ मांगती रही हैं मगर इंसाफ तो दूर, ये घटनाएं नये-नये रूपों में अलग-अलग लोगों के साथ घटती हुईं सामने आ जाती हैं।

    ये कैसा जुल्म है!

    जब दंगा होता है तो पड़ोसी ही पड़ोसी का घर लूट लेते हैं। जानने वाले ही जानने वालों की हत्या करते हैं, ऐसे वारदातों को अंजाम देते हैं कि मानवता भी शर्मा जाए। चोटी काट घटनाएं भी दंगे के बाद की अराजकता का माहौल बता रही हैं। कोई है आसपास, जो टिकाए हुए है नज़र ख़ास। जिनको है वक्त की तलाश। मौका मिला नहीं कि बाल लिए काट। ये कैसा सितम है! ये कैसा जुल्म है!

    कौन हैं चोटी के दुश्मन?

    'चोटी का कटना' यानी 'वायरल दुर्घटना' संक्रमण का रूप लेकर देश में भौगोलिक स्तर पर ही अपना विस्तार नहीं कर रही हैं, यह लोगों के घरों में, उनके दिलो-दिमाग पर असर कर रही हैं। कौन हैं चोटी के दुश्मन? कौन हैं बेटी के दुश्मन? मां-बाप को बेटी की चोटी की चिंता सता रही है तो खुद माएं भी नींद के आगोश में जाने से पहले अपनी चोटियों को बांधकर या छिपाकर रख रही हैं। कौन है 'वो'?- कोई पुरुष, जो महिलाओं की आज़ादी से डरता है! कोई महिला, जो अपनी सखी से ईर्ष्या रखती है! कोई पड़ोसी, जो अपने/अपनी पड़ोसी को सबक सिखाना चाहता है! या हर कोई, जिसे 'मौके पर चौका जड़ना' आता है!

    कहां है वो दुशासन

    चोटी कट जाने से घायल महिलाओं की तादाद बढ़ती जा रही है। ख़ून की जगह बाल हैं। द्रौपदी के बालों की तरह बिखरे हुए नहीं, जो ख़ून से सन जाने के बाद ही दोबारा चोटी का रूप लेने को तैयार हुई थी; जिसने दुशासन के अपमान के बाद चोटी बनने और उसमें परांदे लगाने की अनुमति देने का मौका खत्म कर दिया था। उन बालों ने अपमान का बदला लेने तक द्रौपदी का साथ नहीं छोड़ा था। शायद इसी से सबक लेकर आज के दुशासनों ने ऐसा तरीका अपनाया है कि 'घायल' महिलाओं को अपने बालों से हाथ धोना पड़ रहा है। उनके बाल ज़मीन पर गिरकर उन्हें खून के आंसू रोने को मजबूर कर रहे हैं। लेकिन कहां है दुशासन, कब प्रकट होता है, कब द्रौपदियों के चीरहरण करता है। उससे बदला लेने वाला भीम कहां है? इन महिलाओं के बालों पर सिर्फ आंसू ही गिरेंगे या कि 'रहस्य' बताकर समाज के राक्षस अय्यारी करते रहेंगे?

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