कौन पका रहा है ‘डेढ़ चावल की खिचड़ी?’

दिल्ली में 900 किलो से अधिक बनी थी खिचड़ी
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दिल्ली में 900 किलो से अधिक बनी थी खिचड़ी

खिचड़ी यक़ीनन भारत में लोकप्रिय है. महानगरों से लेकर गावों तक. देश के तक़रीबन हर हिस्से में उसका कोई न कोई रूप देखने को मिल जाता है. नाम भले अलग हों, उसकी उपलब्धता निश्चित रहती है.

यह व्यंजन लोक जीवन से जुड़ा है. यहां तक कि संभवतः यह अकेला व्यंजन है जिसके नाम पर एक त्योहार है. उत्तर भारत में इस त्योहार का नाम है- 'खिचड़ी.'

मकर संक्रांति के दिन 'खिचड़ी' प्रसाद बन जाती है. नई फ़सल को समर्पित इस त्योहार में नमकीन के साथ मीठी खिचड़ी भी बनती है.

इसीलिए, जब केंद्र सरकार ने खिचड़ी को मान्यता देने का इशारा किया तो किसी को शायद ही हैरानी हुई. जो हैरानी थी, इस बात पर थी कि लंबे अरसे से केंद्रीय विमर्श से अनुपस्थित खिचड़ी अचानक सरकार को क्यों याद आई?

इसमें कोई राजनीति तो नहीं है? आखिर क्या खिचड़ी पक रही है?

खिचड़ी
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राष्ट्रीय व्यंजन का प्रस्ताव

विवाद इतना बढ़ा कि केंद्रीय खाद्य प्रसंस्करण मंत्री हरसिमरत कौर बादल को सफ़ाई देनी पड़ी. कहना पड़ा कि सरकार खिचड़ी को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रोत्साहित करेगी, लेकिन इसे राष्ट्रीय व्यंजन बनाने का प्रस्ताव नहीं है.

खिचड़ी भारत का अकेला खाद्य पदार्थ है जिसने लोगों का पेट तो भरा ही, उन्हें दिमाग़ी तौर पर भी प्रभावित किया. वह भाषा में दाख़िल हुई और रोज़मर्रा की ज़िंदगी में शामिल हो गई.

खिचड़ी पर अनगिनत क़िस्से बने, कविताएं लिखी गईं और वह मुहावरों में आ गई.

खिचड़ी की लोकव्याप्ति साबित करती है कि सीधी-सादी खिचड़ी के कितने अर्थ हो सकते हैं. यह खिचड़ी की लोकप्रियता के बिना संभव नहीं था.

खिचड़ी से जुड़े मुहावरों में शब्द तो शब्द, मात्राएं उसका अर्थ बदल देती हैं. उदाहरण के लिए, 'खिचड़ी पकना' और 'खिचड़ी पकाना' अलग-अलग मुहावरे हैं. 'खिचड़ी खाते आस्तीन चढ़ाना' और 'खिचड़ी खाते आस्तीन उतारना' के अर्थ अलग हैं.

खिचड़ी से जुड़े कुछ प्रचलित मुहावरे और उनके अर्थ आप भी देखिए:

डेढ़ चावल की खिचड़ी: अपना अलग राग अलापना. ऐसा व्यक्ति जो हर हाल में आम राय के विपरीत जाने पर आमादा हो.

खिचड़ी खाते आस्तीन चढ़ाना: फ़र्ज़ी बहादुरी दिखाना. वह आदमी जो अखाड़े में कभी न उतरे और केवल ज़ुबान का पहलवान हो.

खिचड़ी खाते आस्तीन उतारना: बहुत नाज़ुक होना. प्रयोग: साहब की नज़ाकत तो देखिए, खिचड़ी खाते आस्तीन उतार रहे हैं.

खिचड़ी पकाना: गुप्त विचार विमर्श. प्रयोग: सिर्फ़ भाषण मत सुनिए, परदे के पीछे भी नज़र रखिए. तब पता चलेगा क्या खिचड़ी पकाई जा रही है.

खिचड़ी पकना: षड्यंत्र करना. प्रयोग: अब जाकर समझ में आया कि इतने दिनों से क्या खिचड़ी पक रही थी.

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खिचड़ी यानी 'काल्पनिक राष्ट्रीय व्यंजन'

चरक और अल-बरूनी के समय भी पकती थी खिचड़ी

सोशल: 'रिश्वत को राष्ट्रीय व्यंजन घोषित किया जाए'

अपनी खिचड़ी अलग पकाना: अलग-थलग होना. प्रयोग: इतना स्वार्थी होना भी ठीक नहीं है कि आप अपनी खिचड़ी हर वक़्त अलग पकाते रहें.

खिचड़ी करना: सब घालमेल कर देना. प्रयोग: सब कुछ इस तरह खिचड़ी कर दिया कि असल बात समझ में नहीं आ रही है.

खिचड़ी होना: बाल सफ़ेद हो जाना. प्रायः व्यंग्य में बोला जाता है. श्वेतकेशी होने में अभी समय है बेटा!, अभी तो बस खिचड़ी हुए हो.

बीरबल की खिचड़ी: दूर की कौड़ी, अप्रत्याशित विलंब. प्रयोग: ऐसा काम करना जिसके कामयाब होने की संभावना शून्य हो.

नौ चूल्हे की खिचड़ी: अस्थिर चित्त, बार- बार विषय बदलना, काम खराब कर देना. प्रयोग: नौ चूल्हे की खिचड़ी से अच्छा है मन लगाकर काम करो.

बासी खिचड़ी: पुराना विचार, अनुपयोगी. प्रयोग: बासी कढ़ी में उबाल आ सकता है, बासी खिचड़ी में कभी नहीं आता.

एक कलछी खिचड़ी: किसी तरह गुज़ारा करना. प्रयोग: हालत बहुत अच्छी नहीं है, सुबह शाम कलछी भर खिचड़ी मिल जाती है.

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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