किस कोने में पत्रकारों की हत्या सबसे ज़्यादा होती है?

जे डे
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मुंबई की विशेष अदालत ने बुधवार को पत्रकार जे डे की हत्या के लिए माफ़िया छोटा राजन समेत सभी नौ लोगों को आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई थी.

जे डे की 2011 में गोली मारकर हत्या कर दी गई थी. जे डे एक क्राइम रिपोर्टर थे जो अंडरवर्ल्ड की स्टोरी किया करते थे.

वहीं, सोमवार को अफ़ग़ानिस्तान के काबुल में एक बम धमाके में नौ पत्रकार मारे गए थे. इसके अलावा अफ़ग़ानिस्तान के खोस्त प्रांत में बीबीसी अफ़ग़ानी सेवा के एक पत्रकार की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी.

एक हफ़्ते में सिर्फ़ अफ़ग़ानिस्तान में ही 10 पत्रकारों की हत्या हुई है. रिपोर्टिंग करते हुए पत्रकारों की जान पर ख़तरा आम बात है.

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यह माना जाता रहा है कि रिपोर्टिंग करते वक़्त पत्रकारों की मौतें संघर्ष क्षेत्रों में अधिक होती हैं.

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संघर्ष क्षेत्र मारे जाने की वजह?

अगर ऐसा मानें तो एक रिपोर्ट इस दावे को ख़ारिज करती है.

ऑस्ट्रिया की राजधानी विएना स्थित इंटरनेशनल प्रेस इंस्टीट्यूट (आईपीआई) हर साल विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस (3 मई) की पूर्व संध्या पर 'डेथ वॉच' की लिस्ट जारी करता है, जिसमें हर साल पत्रकारों की रिपोर्टिंग के दौरान मारे जाने का आंकड़ा होता है.

बीते सालों के आंकड़ों से पता चलता है कि रिपोर्टिंग के दौरान अधिकतर जो मौतें हुईं, वो किसी संघर्ष क्षेत्र में नहीं हुई थीं.

आईपीआई की रिपोर्ट का कहना है कि अधिकतर पत्रकारों के मारे जाने की वजह संघर्ष नहीं बल्कि भ्रष्टाचार है.

रिपोर्ट के मुताबिक़, पिछले साल छह महिलाओं समेत 87 पत्रकारों की मौत हुई जिनमें से 46 ऐसे पत्रकार थे जो किसी न किसी ऐसी खोजी रिपोर्ट पर काम कर रहे थे जो भ्रष्टाचार से जुड़ी थीं.

2017 ही नहीं बल्कि 2018 के शुरुआती चार महीनों में 32 पत्रकारों की हत्या हो चुकी है जिनमें एल साल्वाडोर की महिला पत्रकार भी शामिल हैं. इस हिसाब से ये आंकड़ा हर महीने आठ मौतों का हो जाता है.

भ्रष्टाचार के चलते हत्याएं

संघर्ष क्षेत्र में पत्रकारों के मारे जाने का कारण स्पष्ट हो जाता है लेकिन भ्रष्टाचार पत्रकारों की मौत की वजह है, इसकी पुष्टि कैसे होती है?

इस सवाल के जवाब पर आईपीआई के संचार प्रमुख रवि प्रसाद कहते हैं कि इन मौतों को लेकर उनका संस्थान उन जगहों पर जाकर जांच करता है और उनके संपादक भी इसकी पुष्टि करते हैं.

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वह कहते हैं, "पहली बात यह है कि हम इन हत्याओं में केवल पत्रकारों को चिन्हित करते हैं. इसमें ब्लॉगर्स नहीं होते हैं. दूसरी बात हम उनके संस्थान के संपादकों से बात करते हैं और वह इसकी पुष्टि करते हैं कि वह पत्रकार किसी न किसी भ्रष्टाचार की स्टोरी पर काम कर रहे थे."

रवि आगे कहते हैं, "भ्रष्टाचार मौत का कारण है इसकी पुष्टि दूसरी वजहों से भी होती है. इस साल भारत में अब तक तीन पत्रकारों की हत्या हो चुकी है और उनके संपादकों ने ख़ुद ही कहा है कि वह भ्रष्टाचार की जांच कर रहे थे."

"माल्टा में हुई महिला पत्रकार की हत्या के बारे में पूरी दुनिया को पता है कि वह पनामा पेपर्स की जांच कर रही थीं और सरकार ने इसकी जांच को लेकर कोई बड़ा क़दम नहीं उठाया है."

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भारत में पिछले साल बेंगलुरु में महिला पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या हुई थी. इसका ज़िक्र करते हुए रवि कहते हैं कि गौरी बहुत तेज़-तर्रार पत्रकार थीं जो भ्रष्टाचार से लेकर सांप्रदायिकता पर काम कर रही थीं, उनकी हत्या की जांच की रफ़्तार भी बहुत धीमी चल रही है.

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हत्या की जांच पर भी सवाल

आईपीआई की रिपोर्ट में हत्या की जांचों पर भी सवाल उठाया गया है.

रिपोर्ट के आंकड़ों के अनुसार, पिछले 12 महीनों में जितने हत्या के मामले हुए उनमें अधिकतर की जांच बेहद धीमी है.

इस साल 22 फ़रवरी को स्लोवाकिया के पत्रकार जेन कुशक और उनकी महिला मित्र की घर में लाश पाई गई थी.

कुशक ने सरकार में भ्रष्टाचार को लेकर रिपोर्टिंग की थी और हत्या के बाद स्लोवाकिया के प्रधानमंत्री को इस्तीफ़ा देना पड़ा था.

इस मामले की जांच के अलावा माल्टा में अक्तूबर 2017 में कार धमाके में हुई महिला पत्रकार डेफ़नी कारुआन गेलिट्सिया की हत्या, गौरी लंकेश और मेक्सिको के खोजी पत्रकार ज़ेवियर वाल्देज़ कार्देनस की हत्या की जांच का मामला भी बेहद धीमा चल रहा है.

कहां होती हैं सबसे अधिक हत्या?

आईपीआई की रिपोर्ट के मुताबिक़, लैटिन अमरीका ऐसी जगह है जहां पत्रकारों की सबसे अधिक हत्याएं होती हैं.

इन जगहों पर अधिकतर पत्रकार नशीली दवाओं की तस्करी और राजनीतिक भ्रष्टाचार की रिपोर्टिंग करते हैं.

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लैटिन अमरीका में हर महीने 12 पत्रकारों से अधिक की हत्या होती है और इसमें सबसे ज़्यादा हत्याएं मैक्सिको में होती है.

दक्षिण एशिया में भी पत्रकारों की हत्या बड़ी बात नहीं है. भारत में पिछले साल सात और इस साल शुरुआती चार महीनों में तीन पत्रकारों की हत्या हुई है.

बांग्लादेश में पिछले साल केवल एक पत्रकार मारा गया था.

पत्रकारों के लिए सबसे ख़तरनाक जगह अफ़ग़ानिस्तान है.

यहां देखने को मिला है कि पत्रकारों की हत्या निशाना बनाकर की जा रही है. एक बम धमाके को कवर करने गए पत्रकारों को निशाना बनाकर बम धमाका किया गया था.

आईपीआई 1997 से पत्रकारों की हत्या के ऊपर काम कर रहा है.

साल 1997 से अब तक 'डेथ वॉच' के अनुसार, 1801 पत्रकारों की हत्या हो चुकी है. सबसे अधिक ख़ूनी साल 2012 रहा जब 133 पत्रकारों की हत्या की गई थी.

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