ये कहां पहुंच गई है शिवसेना, कभी मातोश्री में लगता था नेताओं का दरबार!
बेंगलुरू। महाराष्ट्र में कभी समानांतर सरकार चलाने वाले पूर्व शिवसेना प्रमुख दिवंगत बालासाहेब ठाकरे आज जीवित होते तो शिवसेना की हालत देखकर जरूर मायूस हो जाते। कभी महाराष्ट्र की राजनीति की धुरी रही मातोश्री आज वीरान पड़ी है, क्योंकि महाराष्ट्र में दशकों तक किंग मेकर की भूमिका निभाने वाली शिवसेना अब किंग बनने की होड़ में कुछ भी नया कर गुजरने पर अमादा है। वर्तमान समय की शिवसेना उस दौर के शिवसेना से बिल्कुल जुदा है, जिसकी दहलीज से नेता राजा बनकर निकलते थे।

बालासाहेब ठाकरे के देहांत के बाद शिवसेना के उत्तराधिकारी घोषित किए गए उद्धव ठाकरे के स्वभाव ही नहीं, चरित्र में भी पिता का अक्स नहींं दिखा। फोटोग्राफी और कला क्षेत्र में रूचि रखने वाले उद्धव को वर्ष 2004 में जब कट्टर हिंदुवादी पार्टी शिवसेना की कमान मिली तो बालासाहेब ठाकरे के अक्स ठहराए जा चुके भतीजे राज ठाकरे ने शिवसेना को ही छोड़ दिया और एक साल बाद वर्ष 2006 में महाराष्ट्र नवनिर्माण नाम से एक नई पार्टी बना ली।

महाराष्ट्र में शिवसेना प्रमुख बालासाहेब ठाकरे का निवास स्थान मातोश्री पिछले कई दशकों से सत्ता की धुरी रही है, लेकिन वर्ष 2004 बालासाहेब ठाकरे ने जब पार्टी की कमान उद्धव ठाकरे को सौंपी तो इसका कायापलट हो चुका था। उद्धव ठाकरे के हाथों में कमान आने के बाद पार्टी की चाल, चरित्र और उसकी दिशा बदल चुकी थी। वर्ष 1995 में बीजेपी और शिवसेना के गठजोड़ से बनी एनडीए सरकार वर्ष 1999 विधानसभा चुनाव में सत्ता से बाहर हो चुकी थी। अब उद्धव ठाकरे का पूरा फोकस सत्ता वापसी तक सिमट चुकी थी। यही वह दौर था जब शिवसेना किंग मेकर की भूमिका के बजाय किंग बनने की कतार में खड़ी थी।

वर्ष 1999 से वर्ष 2009 तक एक दशक लंबे इंतजार के बाद भी बीजेपी और शिवसेना महाराष्ट्र में बहुमत के आंकड़े तक नहीं पहुंच सके। उद्धव ठाकरे सरकार एक कुशल रणनीतिकार हैं, जो अभी तक बैकसीट पर बैठकर राजनीति कर रहे थे। वर्ष 2014 में हुए महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में मोदी लहर के बीच जब महाराष्ट्र की राजनीति में एनडीए गठबंधन की वापसी हुई और बीजेपी और शिवसेना गठबंधन सरकार वजूद में आई। गठबंधन सरकार में उद्धव ठाकरे को फ्रंट सीट नहीं मिली, क्योंकि फ्रंट सीट पर बीजेपी नेता देवेंद्र फडणवीस बैठे थे।

वर्ष 2014 विधानसभा चुनाव में बीजेपी नंबर एक पार्टी बनकर उभरी थी और शिवसेना दूसरे नंबर पर रही थी। बीजेपी और शिवसेना दोनों अलग-अलग चुनाव में उतरे थे। शिवसेना 284 सीटों पर लड़कर महज 62 सीटों पर जीत दर्ज कर सकी थी जबकि बीजेपी 260 सीटों पर लड़कर 122 सीट जीतकर बहुमत में महज 23 सीट दूर रह गई थी। दोनों दल पहले भी संयुक्त सरकार चला चुकी थी, इसलिए महाराष्ट्र में एक बार फिर बीजेपी-शिवसेना की साझा सरकार बन गई, लेकिन इस बार शिवसेना सरकार में शामिल होकर भी बीजेपी के खिलाफ विपक्षी दल की तरह बर्ताव कर रही थी।

पूरे पांच वर्ष तक शिवसेना चीफ और शिवसेना के कार्यकर्ता महाराष्ट्र में अपनी सरकार के खिलाफ बयानबाजी करते रहे, लेकिन एक बार भी सरकार से अलग होने की जहमत नहीं उठा पाई। बालासाहेब ठाकरे की शिवसेना और उद्धव ठाकरे की शिवसेना में यही अंतर था। पूरे पांच साल बीजेपी को गाली देने के बाद वर्ष 2019 विधानसभा चुनाव में एक बार शिवसेना एनडीए सहयोगी के रूप में चुनाव में उतरी। बीजेपी और शिवसेना में सीटों के बंटवारें को लेकर कुछ दिनों तक रस्साकसी चली, लेकिन दोनों दलों के बीच अंततः समझौता हुआ। अंततः बीजेपी 162 सीटों पर शिवसेना 124 सीटों पर चुनाव लड़ने पर तैयार हो गई।

बीजेपी को आशानुरूप में सीटें 2019 महाराष्ट्र विधानसभा में सीटें नहीं मिली। पिछले विधानसभा चुनाव में 122 सीट जीतने वाली बीजेपी 105 पर सिमट गई और 62 सीट जीतने वाली शिवसेना 56 सीटों पर सिमट चुकी थी। हालांकि दोनों दलों को मिलाकर एनडीए गठबंधन को सरकार बनाने के लिए जरूरी 145 से अधिक सीटें मिल चुकी थी, लेकिन शिवसेना चीफ उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री पद के लिए बीजेपी से भिड़ गए। करीब 18 दिनों तक चली माथापच्ची के बाद भी कोई हल नहीं निकला, क्योंकि शिवसेना बीजेपी से कम एनसीपी और निर्दलीय विधायकों से बात अधिक कर रही थी।

शिवसेना प्रवक्ता संजय राउत लगातार बयान दे रहे थे कि बीजेपी से चुनाव पूर्व 50-50 फार्मूले पर बात हुई थी। बीजेपी राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने गठबंधन धर्म के चलते मामले पर चुप्पी साधे रखी हुई थी, लेकिन 18 दिनो बाद भी जब कोई बात नहीं बनी तो राज्यपाल के निमंत्रण के बावजूद बीजेपी ने महाराष्ट्र में सरकार गठन से अपने हाथ खींच लिए। बीजेपी के हाथ खींचने के बाद मातोश्री वाली किंग मेकर शिवसेना महाराष्ट्र का किंग बनने के लिए बेताब हो गई।

शिवसेना को राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने सरकार गठन का प्रस्ताव दिया। सरकार बनाने की कवायद में जुटे शिवसेना प्रमुख संख्याबल के लिए मातोश्री से बाहर निकलकर हर उस जगह पर पहुंचे, जहां से सरकार गठन की संभावना बन सकती थी। यह ऐसा दौर था जब मातोश्री से निकलकर शिवसेना होटलों में कांग्रेस, एनसीपी नेताओं से गठजोड़ के लिए आधी रात को मुंबई में भटक रही थी।
एक वह दौर था जब बड़े-बड़े नेता पूर्व शिवसेना प्रमुख बालासाहेबा ठाकरे से मिलने मातोश्री आते थे और महाराष्ट्र में सरकार गठन के समीकरण बनाते थे। उद्धव ठाकरे को महाराष्ट्र का मुख्यमंत्री बनने की चाहत में न केवल मातोश्री के बाहर पैर रखना पड़ा बल्कि एनसीपी और कांग्रेस नेताओं के बगल में बैठकर गुणा-भाग करना पड़ा है।

मुख्यमंत्री बनने की चाहत लिए उद्धव ठाकरे होटल ताज लैंड में एनसीपी सुप्रीमो शरद पवार से मिले और फिर होटल ट्राइडेंट बांद्रा में कांग्रेस लीडर अहमद पटेल से भी मिले। यह दौर अलग है, शिवसेना अब किंग मेकर से किंग बनने की दौर में पहुंच चुकी है। इसलिए न शरद पवार मातोश्री पहुंचे और न ही अहमद पटेल ने मुलाकात के लिए मातोश्री को चुना।
चूंकि संख्याबल के बिना शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे को मुख्यमंत्री की कुर्सी मिल नहीं सकती थी, इसलिए उन्हें मातोश्री से बाहर निकलना पड़ा। इसी फेर में उसने पुराने साझीदार बीजेपी से नाता तोड़ने में गुरेज नहीं की और एनसीपी और कांग्रेस से गलबहियां करने से भी नहीं कतराई, जिसके खिलाफ चुनावी कैंपेन करके शिवसेना ने महाराष्ट्र की जनता के वोटों से विधानसभा पहुंची थी।

हालांकि अभी किंग की कुर्सी तक पहुंचने की राह शिवसेना के लिए आसान नहीं है, क्योंकि कांग्रेस और एनसीपी शिवसेना के साथ अगर मिलकर सरकार का गठन कर भी लेती हैं तो 6 महीने से अधिक सरकार चला पाना मुश्किल हो जाएगा। कहा जा रहा है कि शिवसेना, एनसीपी और कांग्रेस के बीच एक कॉमन मिनिमम प्रोग्राम बन चुका है, लेकिन शिवसेना और बाकी दिलों के बीच 50-50 फार्मूले को लेकर खींचतान लंबी हो सकती है, क्योंकि गठबंधन की महत्वपूर्ण कड़ी बन चुकी कांग्रेस सरकार में अपने लिए महत्वपूर्ण भूमिका जरूर तलाश रही होगी।
गुरूवार को तीनों पार्टियों की हुई संयुक्त बैठक में साझा सरकार बनाने पर तीनों दलों में आम सहमति बनती दिख रही है। यह पहली होगा जब तीनों परस्पर विरोधी पार्टियां सरकार में शामिल होंगी। इस महामंथन में कॉमन मिनिमम प्रोग्राम का ड्राफ्ट तैयार किया गया। यही नहीं, सरकार गठन के फॉर्मूले में कौन सी पार्टी को कितने मंत्रालय मिल सकते हैं इस पर भी विचार-विमर्श हुआ है।

महाराष्ट्र में तीनों दलों की नई सरकार का गठन होता है तो इसमें शिवसेना के कोटे से 16 मंत्री होंगे। वहीं, एनसीपी से 14 और कांग्रेस पार्टी से 12 को मंत्री पद दिया जा सकता है। यह भी चर्चा है कि मुख्यमंत्री का पद शिवसेना को मिलेगा, वहीं एनसीपी और कांग्रेस की तरफ से एक-एक डिप्टी सीएम बनाए जा सकते हैं। विधानसभा अध्यक्ष के पद पर शुरू से ही कांग्रेस दावेदारी कर रही है, ऐसे में ये उन्हें दिया जा सकता है। इसके अलावा डिप्टी स्पीकर का पद शिवसेना के हिस्से में जा सकता है।

वहीं, अगर कॉमन मिनिमम प्रोग्राम की बात करें तो इसमें तीन मुद्दे बेहद अहम हैं। तीनों पार्टियों की ओर से जो कॉमन मिनिमम प्रोग्राम का ड्राफ्ट तैयार किया गया है इसमें किसानों का मुद्दा प्रमुखता उठाया गया है। खास तौर से किसानों की कर्ज माफी, फसल बीमा का मुद्दा बेहद अहम है। बताया जा रहा कि शनिवार 3 बजे शनिवार को तीनों पार्टियों के नेता राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी से मुलाकात के लिए भी जाने वाले हैं और महाराष्ट्र में सरकार बनाने का दावा पेश कर सकते हैं।
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