जब संजय गांधी बदल देना चाहते थे संविधान, चुनाव की प्रक्रिया खत्म करने की थी तैयारी
जिस तरह से देश में इंदिरा गांधी की सरकार में आपातकाल लगा था उसके बाद कई विपक्षी नेताओं को जेल में डाल दिया गया था। उस वक्त एक ऐसा समय भी आया था जब संजय गांधी ने देश का संविधान बदलने तक का फैसला ले लिया था।
उनका मामनना था कि भारत में भी अमेरिका की तर्ज पर राष्ट्रपति को ही सरकार का मुखिया होना चाहिए। यही नहीं संजय गांधी देश के संविधान को भी बदल देना चाहते थे।

इंडियन एक्सप्रेस की खबर के अनुसार 1976 में इंदिरा गांधी ने कांग्रेस नेता डीके बरुआ, रजनी पटेल, सिद्धार्थ शंकर से इस बाबत राय मांगी थी। तीनों ही नेताओं ने एक दस्तावेज इंदिरा गांधी को सौंपा था जिसमे उन्होंने सुझाव दिया था कि देश में राष्ट्रपति शासन की प्रणाली लाने का प्रस्ताव लाया जाए।
इसके लिए नई संविधान की नई संविधान सभा में इसे भेजा जाए। रिपोर्ट की मानें तो इस दस्तावेज को एआर एंटुले ने तैयार किया था, लेकिन उनके नाम को गोपनीय रखा गया था।
नीरजा चौधरी ने अपनी किताब हाउ प्राइम मिनिस्टर्स डिसाइड में इस घटना का जिक्र किया है। उन्होंने अपनी किताब में लिखा है कि इस दस्तावेज को डीके बरुआ ने लीक कर दिया था, जिसके बाद यह दस्तावेज संजय गांधी के हाथ लग गया था।
संजय गांधी और उनके करीबी संविधान सभा में इस प्रस्ताव को लाने के पक्ष में थे, वह चाहते थे कि राष्ट्रपति का चुनाव सीधे हो और उसके पास अमेरिका के राष्ट्रपति से अधिक शक्तियां हों। यही नहीं राष्ट्रपति से किसी भी तरह की पूछताछ और जांच की किसी भी तरह की व्यवस्था के भी वह पक्ष में नहीं थे।
नीरजा चौधरी की किताब के अनुसार संजय गांधी और उनके करीबियों ने इंदिरा सरकार पर इसको लेकर दबाव बनाना शुरू कर दिया था। उत्तर प्रदेश, हरियाणा, बिहार और पंजाब में इसके पक्ष में प्रस्ताव को भी पारित करा लिया गया था। ऐसे में अगर सबकुछ सही रहता तो संजय गांधी खुद देश के राष्ट्रपति बन जाते। संजय गांधी चुनाव से ही छुटकारा पा लेना चाहते थे।
देश में जिस वक्त संविधान को बदलने की बात चल रही थी, उस वक्त बंसीलाल जोकि संजय गांधी के करीबी थे उन्होंने इंदिरा गांधी के चचेरे भाई बीके नेहरू से कहा था कि चुनाव से छुटकारा पा लेना चाहिए, यह बेवकूफी है, हमारी बहन इंदिरा गांधी को जीवनभर के लिए राष्ट्रपति बना दीजिए। गौर करने वाली बात है कि आपातकाल के बाद हुए चुनाव में इंदिरा गांधी को हार का मुंह देखना पड़ा था।












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