महाराष्ट्र में शिवसेना विधायकों को लेकर क्या है उद्धव ठाकरे का डर ?

नई दिल्ली- शिवसेना को पार्टी के बागी विधायकों और समान विचारधारा वाली छोटी पार्टियों के विधायकों का समर्थन भले ही मिल गया है, लेकिन फिर भी पार्टी सुप्रिमो उद्धव ठाकरे फूंक-फूंक कर कदम रख रहे हैं। उन्होंने पार्टी विधायकों से जो कुछ भी कहा है, उससे साफ जाहिर होता है कि उनके मन में कहीं न कहीं ये डर बैठा हुआ है कि कहीं सत्ता सुख भोगने की लालच में कुछ एमएलए पाला बदलकर भाग न जाएं। इसलिए, वे अभी से अपने विधायकों को तरह-तरह से आगाह करने और समझाने-बुझाने की कोशिशों में भी जुटे हुए हैं। शिवसेना को लगता है कि बीजेपी उसी के दम पर राज्य में सबसे बड़ी सियासी ताकत बनकर उभरी है। लेकिन, पिछले पांच वर्षों में वही बड़े भाई की भूमिका में आ चुकी है। ऐसे में अगर वह अभी भी सचेत नहीं हुई तो उसके राजनीतिक भविष्य के लिए बहुत बड़ी चुनौती खड़ी हो सकती है। इसलिए, उद्धव ठाकरे इसबार भाजपा के दवाब में आसानी से हथियार डालते तो नहीं ही दिख रहे हैं, इसके साथ ही वह इस बात को लेकर भी संभल कर कदम बढ़ा रहे हैं कि कहीं ज्यादा सौदेबाजी के चक्कर में उन्हें अपने विधायकों से ही हाथ न धोना पड़ जाए? उद्धव के बयान से उनके मन में बैठे इस भय को आसानी से समझा जा सकता है।

उद्धव को है विधायकों के पाला बदलने की आशंका ?

उद्धव को है विधायकों के पाला बदलने की आशंका ?

शनिवार को शिवसेना के नव-निर्वाचित 56 विधायकों को संबोधित करते हुए पार्टी अध्यक्ष उद्धव ठाकरे ने जो कुछ भी कहा है उसका साफ मतलब यही निकलता है कि उनके मन में ये बात भी बैठी हुई है कि कहीं भाजपा से ज्यादा हासिल करने के चक्कर में उन्हें अपने विधायक ही न गंवाने पड़ जाएं। यही वजह है कि उन्होंने अपने विधायकों को पाला बदलने के संभावित खतरों को लेकर आगाह करने की भी कोशिश शुरू कर दी है। इसके लिए उन्होंने पूर्व सांसद उदयन राजे का हवाला दिया है, जो 2019 के लोकसभा चुनाव में एनसीपी के टिकट पर जीते थे। बाद में वे एनसीपी छोड़कर भाजपा में शामिल हो गए, लेकिन इसबार उन्हें सतारा लोकसभा सीट पर उपचुनाव में बीजेपी के टिकट पर हार का मुंह देखना पड़ गया। उन्हीं का उदाहरण देकर उद्धव ने पार्टी विधायकों से कहा कि, 'अगर चार महीने के भीतर महाराज (उदयन शिवाजी महाराज के वंशज हैं।) हार सकते हैं तो कोई भी हार सकता है।' जाहिर है कि उद्धव अपने विधायकों को चेतावनी देना चाहते हैं कि अगर उन्होंने शिवसेना का साथ छोड़ा तो उनका सियासी भविष्य भी खतरे में पड़ सकता है।

अपने लिए समर्थन भी जुटा रही है शिवसेना

अपने लिए समर्थन भी जुटा रही है शिवसेना

उद्धव एक तरफ बीजेपी से बेहतर डील के लिए उसके सामने कड़ी चुनौती पेश कर रहे हैं तो दूसरी ओर वह अपनी संख्या बल बढ़ाकर भी बीजेपी पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने की कोशिशों में जुटे हुए हैं। शिवसेना को मुख्यमंत्री की कुर्सी की मांग करने वाले विधायकों की संख्या अबतक 56 से बढ़कर 60 तक पहुंच चुकी है। पार्टी अबतक छोटी पार्टियों और अपने बागियों को रिझाकर अपनी संख्या बल में 4 विधायकों की बढ़ोतरी करने में कामयाब हो चुकी है। शनिवार को ही पीजेपी के विधायक ओमप्रकाश उर्फ बच्चु काडु और राजकुमार पटेल ने शिवसेना को शर्तों के आधार पर समर्थन देने की पेशकश की है। इससे पहले गुरुवार को चुनाव परिणाम आने के तत्काल बाद ही पार्टी के दो बागी विधायकों आशीष जायसवाल और नरेंद्र भोंडेकर ने उद्धव से मिलकर समर्थन की घोषणा की थी, जो निर्दलीय के रूप में चुने गए हैं।

हर हाल में भाजपा के दबाव से निकलना चाहती है शिवसेना

हर हाल में भाजपा के दबाव से निकलना चाहती है शिवसेना

2014 के विधानसभा चुनाव में अलग-अलग चुनाव लड़ने के बाद से महाराष्ट्र में भाजपा, उद्धव की पार्टी की बिग बॉस बन गई है। इस दौरान शिवसेना ने मुंबई से लेकर दिल्ली तक बीजेपी नेतृत्व पर लाख दबाव बनाने का प्रयास किया, लेकिन पार्टी टस से मस नहीं हुई और अपनी शर्तों पर आगे बढ़ती गई। विधानसभा चुनावों में सीट बंटवारे के दौरान भी देवेंद्र फडणवीस, उद्धव पर भारी पड़े और उसके चलते ठाकरे को पार्टी कैडर के विरोध का भी सामना करना पड़ा। शिवसेना, बीजेपी के साथ गठबंधन की शुरुआत से ये माने बैठी थी कि दिल्ली में भारतीय जनता पार्टी बड़े भाई की भूमिका में होगी और महाराष्ट्र में सिर्फ मातोश्री की ही चलेगी। लेकिन, पिछले पांच वर्षों में बीजेपी ने जिस तरह से महाराष्ट्र में अपना जनाधार बढ़ाया है और हर बार सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है, उसकी लगाम कसने का शिवसेना यही बेहतर मौका देख रही है। उद्धव को लगता है कि अभी नहीं तो शायद कभी नहीं। इसलिए, वह बालासाहेब ठाकरे वाला रसूख हासिल करने के लिए हर दांव लगा देना चाहते हैं।

बीएमसी चुनाव को लेकर भी अभी से सचेत हैं उद्धव

बीएमसी चुनाव को लेकर भी अभी से सचेत हैं उद्धव

शिवसेना के डर की एक वजह यह भी है कि वह किसी भी सूरत में बीएमसी पर अपना कब्जा गंवाने को तैयार नहीं है। उसे लगता है कि जिस दिन केरल जैसे राज्य से भी बड़े बजट वाली इस संस्था पर उसकी पकड़ ढीली पड़ गई तो फिर पार्टी को संभाल पाना ठाकरे के लिए नामुमकिन हो जाएगा। उद्धव वह बात भूले नहीं हैं कि अगर पिछले बीएमसी चुनाव में बीजेपी 2 सीट भी ज्यादा ले आती तो उनका सियासी किस्सा हमेशा के लिए खत्म भी हो सकता था। पार्टी किसी भी हाल में एशिया के सबसे अमीर निगमों में से एक बीएमसी को बीजेपी के हाथों में नहीं देना चाहती। इसलिए, मंत्रालय के लिए दबाव बनाकर बीएमसी की कुर्सी अभी से रिजर्व कर लेना चाहती है। क्योंकि, 2022 में बीएमसी के चुनाव होने वाले हैं और मुंबई के विधानसभा सीटों के चुनाव परिणाम बताते हैं कि फिलहाल वहां भी भाजपा उसपर भारी पड़ती दिख रही है। मुंबई में विधानसभा की कुल 36 सीटें हैं, जिसमें से 15 बीजेपी और 14 शिवसेना के खाते में गई हैं।

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