कोविड-19 की पहली और दूसरी लहर के लक्षणों में क्या है अंतर ?

नई दिल्ली, 20 अप्रैल: देश में कोरोना वायरस की दूसरी लहर ने डॉक्टरों और वैज्ञानिकों को भी चौंका दिया है। क्योंकि, इसबार वायरस के रूप बदलने की बात तो सामने आ ही रही है, उसने अपनी वजह से इंसानी शरीर में पैदा होने वाले लक्षणों को भी बदल दिया है। इसबार पिछले साल के मुकाबले उसके प्रभाव में भी बदलाव दिख रहा है। जैसे कि इसबार वेंटिलेटर की आवश्यकता की जगह ऑक्सीजन देने की ज्यादा जरूरत महसूस हो रही है। इसी तरह से डॉक्टरों को वैक्सीन लेने की योजना बना रहे लोगों को सलाह है कि अगर उन्हें कोविड का थोड़ा सा भी लक्षण महसूस हो तो वह इसमें जल्दीबाजी ना करें और थोड़ा इंतजार करें, क्योंकि इसके परिणाम नुकसान वाले हो सकते हैं।

पहली और दूसरी लहर के लक्षणों में क्या है अंतर ?

पहली और दूसरी लहर के लक्षणों में क्या है अंतर ?

इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) के डायरेक्टर जनरल डॉक्टर बलराम भार्गव ने कोरोना की पहली और दूसरी लहर के लक्षणों की गंभीरता और उसके अंतर की ठोस जानकारी दी है। उन्होंने बताया है कि, 'अगर आप लक्षणों को देखेंगे तो इसबार इसकी गंभीरता बहुत कम है। इसबार हम सांस की कमी के मामले ज्यादा देख रहे हैं, जबकि पिछली लहर में सूखी खांसी, जोड़ों का दर्द, सिरदर्द ज्यादा होते थे।। ' उनके मुताबिक टेस्टिंग के लिए आरटी-पीसीआर टेस्ट ही सर्वोत्तम है, 'हम दो या उससे ज्यादा जीन को देखते हैं, इसलिए किसी म्यूटेंट को नहीं देख पाने का कोई चांस ही नहीं है। 'गौरतलब है कि म्यूटेंट की वजह से इस टेस्ट के परिणामों को लेकर भी चिंताएं जताई जा रही हैं। उन्होंने यह भी बताया है कि एसिम्पटोमेटिक और मामूली रूप से बीमारों का घर पर ही उपचार हो सकता है। उन्हें एक बड़ी बात ये कही है कि दूसरी लहर में वेंटिलेटर की बहुत ज्यादा आवश्यता नहीं देखी जा रही है। जबकि, सांस की समस्या की वजह से इसबार ऑक्सीजन की डिमांड बहुत ज्यादा बढ़ी हुई है।

पहली और दूसरी लहर में मृत्यु दर में कितना अंतर ?

पहली और दूसरी लहर में मृत्यु दर में कितना अंतर ?

भार्गव के मुताबिक पहली और दूसरी लहर में मृत्यु दर में कोई अंतर नजर नहीं आ रहा है। यही नहीं दूसरी लहर में युवाओं के संक्रमित होने का अनुपात पिछली लहर से थोड़ा ही ज्यादा है। पहली लहर में संक्रमितों की औसत उम्र 50 साल थी, जबकि इसबार यह 49 साल है। यही नहीं इस लहर में ही अस्पताल में भर्ती होने वाले ज्यादातर अधिक उम्र वाले ही लोग हैं। शून्य से 19 साल की उम्र तक में यह अंतर 4.2 फीसदी के मुकाबले 5.8 फीसदी है और 20 से 40 साल की उम्र में यह अंतर 23 फीसदी के मुकाबले 25 फीसदी है। यह बहुत ही मामूली अंतर है। जबकि, 70 फीसदी से ज्यादा लोगों की उम्र 40 या उससे अधिक है। उन्होंने यह भी बताया है कि इस साल सांस की कमी वाले जितने मरीज अस्पतालों में भर्ती हुए हैं, उससे ज्यादा एसिम्पटोमेटिकों का दाखिला हुआ है।

दूसरी लहर में आरटी-पीसीआर टेस्ट भी दे रहे हैं धोखा

दूसरी लहर में आरटी-पीसीआर टेस्ट भी दे रहे हैं धोखा

एक और रिपोर्ट के मुताबिक दूसरी लहर की सबसे बड़ी चिंता ये है कि इसबार वायरस की फेफड़े के काफी अंदर तक मौजूदगी देखने को मिल रही है, जिसके चलते 15 से 20 फीसदी आरटी-पीसीआर टेस्ट निगेटिव होने की बात सामने आ रही है। गुजरात के डॉक्टरों ने इसका पता लगाने के लिए हाई रिजोल्यूशन सीटी स्कैन का इस्तेमाल करना शुरू किया है, जिसमें फेफड़ों के अंदर लाइट ग्रीन या ब्राउन कलर के पैच में कोरोना वायरस की मौजूदगी का पता चल पाता है। दिल्ली के कई अस्पतालों में भी ऐसे केस सामने आ रहे हैं, जिसमें आरटी-पीसीआर टेस्ट निगेटिव आ रही है, लेकिन मरीजों में बुखार, खांसी और सांस की कमी की शिकायत देखी जा रही है। इस लहर में एक और बदलाव ये है कि यह बच्चों को भी गंभीर बीमारी दे रहा है। पहली लहर में माना जा रहा था कि बच्चों में इसके लक्षण ज्यादा खतरनाक नहीं होते। दिल्ली के लोकनायक अस्पताल के मेडिकल डायरेक्टर डॉक्टर सुरेश कुमार ने टीओआई को बताया कि 'इस समय हमने कोविड-19 के गंभीर लक्षणों वाले 8 बच्चों को अस्पताल में एडमिट किया हुआ है। उनमें से एक तो आठ महीने का है। बाकी भी 12 साल से कम उम्र के हैं। उन्हें तेज बुखार, निमोनिया, डिहाइड्रेशन और स्वाद की कमी जैसे लक्षण हैं। '

क्या कोविड-19 के लक्षण हैं तो वैक्सीन लेनी चाहिए ?

क्या कोविड-19 के लक्षण हैं तो वैक्सीन लेनी चाहिए ?

अपोलो होम हेल्थकेयर के सीईओ डॉक्टर महेश जोशी के मुताबिक अगर किसी को कोविड के लक्षण हैं तो उन्हें वैक्सीनेशन की योजना जरूर टाल देनी चाहिए। सीएनबीसी-टीवी18 से उन्होंने कहा है, 'यह मुश्किल सवाल है। मुझे नहीं लगता कि इसको लेकर कोई खास गाइडलाइन है, लेकिन मैं इतना कह सकता हूं कि अगर कोविड के लक्षण दिख रहे हैं तो दूसरी खुराक को दो हफ्तों के लिए टाला जा सकता है और फिर देखिए कि क्या होता है।' वहीं मैक्स अस्पताल में पल्मोनोलॉजी के प्रिंसिपल डॉक्टर विवेक नांगिया भी इस बात से सहमत हैं कि हल्के लक्षण वालों को भी वैक्सीन लगवाने का इरादा टाल देना चाहिए। उनके मुताबिक, 'संक्रमित होते हुए वैक्सीन लगाने से बहुत ज्यादा दिक्कत हो सकती है। थोड़ा भी शक है तो कोई इमरजेंसी नहीं है। क्योंकि, शोध से पता चला है कि वैक्सीन में देरी से फायदा ही होता है। 12 हफ्तों तक वैक्सीन में देरी से बढ़िया इम्यून रेस्पॉन्स मिलता है। इसलिए, घबराने की आवश्यकता नहीं है।'

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