क्या है Indus Water Treaty का इतिहास? पहले भी हुए विवाद पर नहीं आई ऐसी नौबत! समझिए संधि के सारे नियम
What is Indus Water Treaty: कश्मीर के पहलगाम में 22 अप्रैल को हुए आतंकी हमले ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। आधुनिक हथियारों से लैश आतंकियों ने अलग-अलग क्षेत्रों से आए टूरिस्ट्स को निशाना बनाया। इस हादसे में 28 लोगों की जान चली गई और कई गंभीर रूप से घायल हैं। इस हमले की जिम्मेदारी लश्कर-ए-तैयबा की शाखा द रेजिस्टेंस फ्रंट (TRF) ने ली है।
हमले के बाद पीएम मोदी की अगुआई में हुई कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्यूरिटी (CCS) की बैठक में कई अहम फैसले लिए गए हैं। उन्हीं फैसलों में से एक है सिंधु जल संधि (Indus Water Treaty) को सस्पेंड़ करना। आजादी के बाद जब भारत-पाक का बंटवारा हुआ तब नदियों को लेकर चल रहे विवाद को विराम देने के लिए यह समझौता किया गया था। आइए समझते हैं इस समझौते के बारे में विस्तार से...

सिंधु जल समझौता (Indus Water Treaty)
1947 में भारत-पाकिस्तान के बंटवारे के बाद एक बड़ा सवाल सामने आया-सिंधु नदी प्रणाली का पानी किसका होगा? पाकिस्तान की खेती इस पानी पर निर्भर थी, और नदियां भारत से होकर बहती थीं। इससे दोनों देशों के बीच टकराव की आशंका बढ़ गई।
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विश्व बैंक की मदद से बना समाधान
सिंधु जल संधि (IWT) भारत और पाकिस्तान के बीच जल-बंटवारे का एक समझौता है, जिस पर 1960 में विश्व बैंक के तत्वावधान में हस्ताक्षर किए गए थे। इसे दुनिया की सबसे सफल जल-बंटवारे संधियों में से एक माना जाता है और अक्सर अंतरराष्ट्रीय जल कानून की चर्चाओं में इसका हवाला दिया जाता है।
1950 के दशक की शुरुआत में विश्व बैंक ने मध्यस्थ की भूमिका निभाई और कई सालों की बातचीत के बाद 19 सितंबर 1960 को कराची में 'सिंधु जल संधि' पर हस्ताक्षर हुए। भारत की ओर से प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू, पाकिस्तान की ओर से राष्ट्रपति अयूब खान और विश्व बैंक ने इस संधि को मंजूरी दी।
Sindhu Water Treaty: कौन-सी नदी किसके पास?
सिंधु नदी प्रणाली में कुल छह बड़ी नदियां हैं। संधि के तहत इन्हें इस तरह बांटा गया:
पूर्वी नदियां (सतलुज, ब्यास, रावी) - भारत को दी गईं।
संधि के अनुसार, भारत इन नदियों का पूरा इस्तेमाल कर सकता है - खेती, बिजली और जल संग्रहण के लिए।
पश्चिमी नदियां (सिंधु, झेलम, चिनाब) - पाकिस्तान को दी गईं।
संधि के अनुसार, भारत इन नदियों का सीमित इस्तेमाल कर सकता है - जैसे पानी का गैर-खपत उपयोग और 'रन-ऑफ-द-रिवर' हाइड्रो प्रोजेक्ट।
संधि की खास बातें
भारत को पश्चिमी नदियों पर पनबिजली परियोजनाएं बनाने की इजाजत है, लेकिन इसके लिए तय डिजाइन और भंडारण नियमों का पालन जरूरी है ताकि पाकिस्तान को नुकसान न हो।
- सिंधु: 0.4 मिलियन एकड़ फीट (MAF)
- झेलम: 1.25 MAF
- चिनाब: 1.6 MAF
दोनों देशों को रोजाना नदी बहाव के आंकड़े साझा करने होते हैं और किसी भी बड़े निर्माण से पहले एक-दूसरे को जानकारी देनी होती है।
विवाद सुलझाने का तरीका
संधि में विवादों को लेकर भी बात की गई थी। इसके अनुसार अगर कोई विवाद होता है, तो उसे तीन स्तरों पर सुलझाया जाता है:
- दोनों देशों के 'इंडस कमिश्नर' तकनीकी बैठकें करते हैं
- जरूरत पड़ने पर 'न्यूट्रल एक्सपर्ट' (विश्व बैंक द्वारा नियुक्त) को बुलाया जाता है
- कानूनी मामलों में 'कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन' भी बिठाई जा सकती है
Sindhu Water Treaty :अब तक के बड़े विवाद
भारत की कुछ परियोजनाओं पर पाकिस्तान ने आपत्ति जताई:
बगलीहार डैम (चिनाब पर) - विवाद हुआ, लेकिन न्यूट्रल एक्सपर्ट ने भारत की डिजाइन को मंजूरी दी, बस कुछ छोटे बदलाव किए गए।
किशनगंगा प्रोजेक्ट (झेलम की सहायक नदी पर) - अदालत ने भारत को प्रोजेक्ट पूरा करने की इजाजत दी, पर शर्त रखी कि पाकिस्तान की तरफ न्यूनतम बहाव बनाए रखना होगा।
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