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Indus Water Treaty Suspension: क्या थी सिंधु जल संधि? क्यों भारत के एक्शन से तिलमिलाया पाकिस्तान?

Indus Water Treaty Suspension Impact on Pakistan: कश्मीर में पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद भारत ने बेहद सख्त कदम उठाया है। मंगलवार को आतंकियों ने देश-विदेश से आए टूरिस्ट्स को निशाना बनाया था। इस हमले में 28 लोगों की मौत हो गई है जिसके बाद बुधवार को बड़ा फैसला लेते हुए भारत ने पाकिस्तान के साथ सिंधु जल संधि को निलंबित कर दिया।

यह फैसला भारत द्वारा पाकिस्तान के खिलाफ उठाए गए पांच बड़े सख्त कदमों में से एक है। इस निलंबन के बाद पाकिस्तान में पानी की कमी तो होगी ही साथ ही भारत को भी कुछ अहम बदलाव की जरूरत होगी।

Indus Water Treaty Suspension Impact on Pakistan

प्रदीप कुमार सक्सेना, जिन्होंने छह साल से अधिक समय तक भारत के सिंधु जल आयुक्त के रूप में कार्य किया है, उन्होंने बताया कि इस फैसले का दोनों देशों पर क्या असर हो सकता है। आइए आसान भाषा में समझते हैं सिंधु जल समझौता के निलंबन के बाद क्या होगा दोनों देशों पर असर...

भारत के इस फैसले का क्या हो सकता है असर?

सिंधु नदी प्रणाली में मुख्य नदी सिंधु और उसकी पांच बाईं ओर की सहायक नदियां रावी, ब्यास, सतलुज, झेलम और चिनाब शामिल हैं। जबकि काबुल नदी दाईं ओर से सिंधु में आकर मिलती है, लेकिन वह भारत से होकर नहीं गुजरती।रावी, ब्यास और सतलुज को मिलाकर पूर्वी नदियां कहा जाता है, जबकि चिनाब, झेलम और सिंधु को पश्चिमी नदियां कहलाती हैं। इन नदियों का पानी भारत और पाकिस्तान - दोनों के लिए बहुत जरूरी है।
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PTI की रिपोर्ट के अनुसार पूर्व जल आयुक्त प्रदीप कुमार सक्सेना ने बताया, "भारत, एक ऊपरी हिस्से वाला देश होने के नाते, कई विकल्प रखता है। यह कदम संधि को खत्म करने की दिशा में पहला कदम हो सकता है, अगर सरकार ऐसा चाहती है। संधि को खत्म करने का कोई साफ प्रावधान नहीं है, लेकिन वीयना कन्वेंशन ऑन लॉ ऑफ ट्रीटीज का अनुच्छेद 62 इस बात की इजाजत देता है कि अगर हालात पूरी तरह बदल जाएँ, तो संधि को खत्म किया जा सकता है।"

भारत और क्या कदम उठा सकता है?

पिछले साल भारत ने पाकिस्तान को एक औपचारिक नोटिस देकर संधि की समीक्षा और बदलाव की मांग की थी।सक्सेना के अनुसार, भारत पर अब किशनगंगा बांध और अन्य परियोजनाओं में reservoir flushing पर रोक मानने की कोई बाध्यता नहीं होगी।

उन्होंने बताया, "संधि के अनुसार यह मना है, लेकिन इससे भारत अपने बांधों की सिल्ट (गाद) निकाल सकता है। पहले बांध को फिर से भरना मानसून में ही करना होता था, लेकिन अब किसी भी समय किया जा सकता है।"

हालांकि, अगर यह काम पाकिस्तान में बुवाई के समय किया गया, तो यह वहां की खेती को नुकसान पहुंचा सकता है, क्योंकि पाकिस्तानी पंजाब का बड़ा हिस्सा सिंधु नदी पर निर्भर है।

बांधों के संचालन और पानी भरने के नियम अब नहीं होंगे लागू

संधि के तहत, भारत को बांध जैसे ढांचे बनाने पर डिजाइन की कुछ शर्तें माननी होती थीं, जिन पर पाकिस्तान अक्सर आपत्ति जताता आया है - जैसे सलाल, बगलीहार, उरी, चुतक, निमो बाजगो, किशनगंगा, पकल दुल इत्यादि। लेकिन अब यदि संधि लागू नहीं रही, तो भारत को आगे इन आपत्तियों को मानने की जरूरत नहीं होगी। साथ ही बांधों के संचालन और पानी भरने के नियम भी अब लागू नहीं होंगे।

भारत को घाटी में बाढ़ से मिल सकती है राहत

सक्सेना के अनुसार, भारत अब पाकिस्तान को बाढ़ की जानकारी देना भी बंद कर सकता है। उन्होंने कहा, "यह पाकिस्तान के लिए नुकसानदायक हो सकता है, खासकर मानसून में जब नदियां उफान पर होती हैं।" भारत अब पश्चिमी नदियों - खासकर झेलम - पर जल संग्रहण कर सकता है और बाढ़ नियंत्रण के उपाय कर सकता है, जिससे भारत को घाटी में बाढ़ से राहत मिल सकती है।

भारत-पाक सीमा और सिंधु नदी प्रणाली (Indo-Pak Border and Indus River System)

संधि के तहत पाकिस्तान के अधिकारियों के भारत दौरे अनिवार्य थे, जो अब बंद हो सकते हैं। आजादी के समय भारत और पाकिस्तान के बीच की सीमा सिंधु नदी प्रणाली को बीच से काटती हुई खींची गई थी, जिससे पाकिस्तान नीचे का और भारत ऊपर का देश बना।

उस समय दो अहम सिंचाई परियोजनाएं, एक रावी पर माधोपुर और दूसरी सतलुज पर फिरोजपुर में थीं, जिन पर पाकिस्तान की सिंचाई व्यवस्था काफी हद तक निर्भर थी - और ये दोनों अब भारत में हैं। इसी कारण पानी के उपयोग को लेकर दोनों देशों के बीच विवाद शुरू हुआ था।

प्राकृतिक चैनलों से प्रवाह जारी रहेगा

इस निर्णय का अर्थ है कि पश्चिमी नदियों - सिंधु, झेलम और चिनाब और उनकी सहायक नदियों - से पानी का प्रवाह तुरंत रोक दिया जाएगा, जहां भी इसे बांधों या इन नदियों पर भारत द्वारा बनाई गई छोटी संरचनाओं के माध्यम से नियंत्रित किया जाता है। हालांकि प्राकृतिक चैनलों से प्रवाह जारी रहेगा, लेकिन भारत के इस कदम से पाकिस्तान के चार में से दो प्रांतों में गर्मियों के चरम पर सिंचाई और पेयजल आपूर्ति पर कुछ हद तक असर पड़ेगा, जब उसे पानी की सबसे अधिक आवश्यकता होती है।

भारत को करना होगा जल भंडारण क्षमता का विस्तार

इसके बाद, भारत को अपनी जल भंडारण क्षमता बढ़ानी होगी और किशनगंगा और रतले जलविद्युत परियोजनाओं पर काम करना होगा, जिनका पाकिस्तान विरोध कर रहा है। तभी भारत का लंबे समय में पानी पर अधिक नियंत्रण हो सकेगा।

हालांकि, भारत को घरेलू उपयोग, सिंचाई और जलविद्युत उत्पादन के लिए पश्चिमी नदियों के पानी का उपयोग करने की अनुमति है। लेकिन भंडारण क्षमता की कमी के कारण भारत अपने कानूनी हिस्से का पूरा उपयोग नहीं कर रहा है।

IWT के अनुसार भारत को पश्चिमी नदियों पर 3.6 मिलियन एकड़ फीट तक जल भंडारण क्षमता बनाने का अधिकार है, लेकिन पर्याप्त भंडारण क्षमता नहीं बनाई गई है। इसके अलावा, पश्चिमी नदियों पर बिजली परियोजनाओं से प्राप्त की जा सकने वाली 20,000 मेगावाट की अनुमानित बिजली क्षमता में से केवल 3,482 मेगावाट क्षमता का निर्माण किया गया है।

पाकिस्तान पर सिंधु जल समझौता निलंबन के प्रभाव

सिंचाई पर प्रभाव

  • पाकिस्तान के पंजाब और सिंध प्रांत, जो पाकिस्तान की सिंचित भूमि का 40% हिस्सा कवर करते हैं, नदी-आधारित सिंचाई प्रणालियों पर बहुत अधिक निर्भर हैं, उन्हें इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा।
  • ये क्षेत्र कृषि-प्रधान हैं, विशेष रूप से पंजाब, और चरम गर्मियों में पानी की कम उपलब्धता फसल चक्र को बाधित कर सकती है, पैदावार को कम कर सकती है, और खाद्य सुरक्षा को प्रभावित कर सकती है।

पेयजल की कमी

  • कई शहर और कस्बे इन नदियों से निकलने वाली नहर प्रणालियों पर निर्भर हैं।
  • प्रवाह में कमी का मतलब है दैनिक उपयोग के लिए मीठे पानी की उपलब्धता में कमी, खासकर भीषण गर्मियों के दौरान जब पानी की मांग चरम पर होती है।

जलविद्युत उत्पादन

  • यदि जल प्रवाह कम हो जाता है, तो पाकिस्तान में जलविद्युत संयंत्र भी प्रभावित हो सकते हैं, जिससे उच्च मांग वाले गर्मियों के मौसम में बिजली की कमी हो सकती है।

राजनीतिक और कूटनीतिक तनाव

पानी एक संवेदनशील द्विपक्षीय मुद्दा है। भारत की ओर से इस तरह के कदम पाकिस्तान सरकार पर घरेलू राजनीतिक दबाव बढ़ा सकते हैं।
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