राहुल और मोदी के लिए कर्नाटक चुनाव के संकेत क्या हैं?

नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी
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नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी

कर्नाटक के विधानसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी के 'जादू' और 'हिंदुत्व कार्ड' के प्रभाव ने चुनावों को जीतने में अपना महत्व साबित कर दिया है.

बीजेपी ने जिस तरह उस राज्य में कांग्रेस को मात दी है जहां उसके स्थानीय नेता भ्रष्टाचार के मामले में लिप्त हैं और सत्ताविरोधी लहर भी साफ़ नहीं थी तो क्या इसे कांग्रेस मुक्त भारत का संकेत माना जाना चाहिए?

कर्नाटक के रोमांचक चुनावी मुकाबले में पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने कहा था कि '21वीं शताब्दी में वह 7वीं शताब्दी के शासक पुलकेशिन द्वितीय की तरह हैं और जिस तरह पुलकेशिन द्वितीय ने उत्तर भारत के ताकतवर राजा हर्षवर्धन को मात दी थी वह भी ठीक ऐसा ही करेंगे.

राहुल
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लेकिन दुर्भाग्य से 21वीं शताब्दी के हर्षवर्धन ने पुलकेशिन द्वीतीय को मात दे दी है और दिल्ली की सत्ताधारी पार्टी सिद्धारमैया के गढ़ में उनसे आगे निकल गई है.

वोट शेयर कम, लेकिन सीटें ज़्यादा

मोदी के नेतृत्व वाली बीजेपी ने कर्नाटक के चुनाव में शानदार प्रदर्शन करते हुए 100 सीटों के मनोवैज्ञानिक आंकड़े को पार कर लिया है.

हालांकि, वह बहुमत से थोड़ा पीछे रह गई है. बीजेपी और कांग्रेस के बीच मत प्रतिशत क्रमश: 37% और 38% है.

लेकिन मत प्रतिशत में जिस तरह कांटे की टक्कर है वो बताती है कि बीजेपी कांग्रेस की अपेक्षा अपने वोट शेयर को वोटों में बदलने में ज़्यादा माहिर है.

क्योंकि बीजेपी के वोट जहां पर हैं, एकजुट हैं. ऐसे में वह ज़्यादा सीटों पर जीत हासिल कर लेती है जबकि उसका वोट प्रतिशत कम रहता है.

जनता दल सेक्युलर बनी तीसरी ताकत

इस चुनाव में तीसरी सबसे बड़ी ताकत जनता दल सेक्युलर की कमान पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा और उनके बेटे एचडी कुमारस्वामी के हाथों में है.

सिद्धारमैया
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सिद्धारमैया

जेडीएस की मज़बूत स्थिति बताती है कि वोक्कालिगा क्षेत्र में जाति आधारित क्षेत्रीय राजनीति में परिवर्तन नहीं हुआ है और इस क्षेत्र में जेडीएस ने न सिर्फ़ कांग्रेस की चुनौती का सामना करके उसे मात दी है, बल्कि यह पार्टी कर्नाटक की क्षेत्रीय पहचान का समर्थन करने वाली प्रमुख पार्टी के रूप में भी सामने आई है.

इस चुनाव से कांग्रेस को ये सबक लेना चाहिए कि कांग्रेस बीजेपी को सीधे टक्कर देकर चुनाव नहीं जीत सकती है और उसे क्षेत्रीय दलों के साथ गठजोड़ करना पड़ेगा.

बीजेपी ने क्या और क्यों किया?

इस चुनाव में कांग्रेस ने कड़ी मेहनत की, लेकिन बीजेपी ने उससे भी ज़्यादा मेहनत की.

मुख्यमंत्री सिद्धारमैया पिछड़ी जातियों का एक गठबंधन बनाने में सफल हुए, कर्नाटक राज्य का झंडा फहराया, मेट्रो स्टेशनों के नाम हिंदी से बदलकर कन्नड़ में किए और लोक कल्याण से जुड़ी तकरीबन 11 भाग्य योजनाएं भी शुरू कीं.

इन योजनाओं में चावल और दूध बांटा जाता था जिससे ग़रीब मतदाताओं को अपनी ओर लाया जा सके.

लेकिन बीजेपी ने इस रणनीति के जवाब में, विशेषकर तटीय कर्नाटक में हिंदुत्व कार्ड खेला.

मोदी
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यही नहीं बीजेपी ने उन जातियों के साथ रणनीतिक गठजोड़ किया जो कांग्रेस की पहुंच से बाहर थीं. इसके बाद 21 रैलियों के साथ नरेंद्र मोदी का प्रभावशाली प्रचार अभियान शुरू किया गया.

मोदी की रैलियों का प्रभाव

मोदी की रैलियों में रॉक कंसर्ट जैसा माहौल होता है, ऊंची आवाज़ में भाषण होते हैं और सुनने वालों के बीच से ऊंची आवाज़ों में जय श्री राम के नारे सुनाई देते हैं.

इन रैलियों में जब मोदी सामने आते हैं तो वह एक ऐसे नेता और गुरु के रूप में सामने आते हैं जिन्हें देखकर-सुनकर दिल को राहत मिलती हो.

और स्टेज पर भावनाएं उद्देलित करने वाला संगीत बज रहा होता है जिससे उन्हें देखने आई भीड़ अपनी जगह पर खड़े हुए तालियां बजाती रह जाती है.

ये रियलटी टीवी और इंदिरा गांधी के दौर में होने वाली राजनीति जैसी दिखती है, लेकिन इसकी आक्रामकता बहुत ज़्यादा है.

इस चुनाव में मोदी ने 20 से ज़्यादा रैलियां कीं तो वहीं पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने 62 रैलियां कीं.

अमित शाह बीते तीन महीने से कर्नाटक को हर हफ़्ते में तीन दिन दे रहे थे. मैंने संघ पैदल सेना को अपनी आंखों से देखा है जो हर सुबह गांवों से लेकर कस्बों तक घर-घर जाकर मतदाताओं से मिलती थी. कई बार पूरे अभियान के दौरान चार-चार बार वह इन मतदाताओं से मुलाकात करते थे.

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कर्नाटक एक राज्य स्तरीय चुनाव ही है, लेकिन धारणा के आधार पर इसका महत्व बहुत ज़्यादा है क्योंकि इसके ठीक एक साल बाद 2019 के आम चुनाव होने वाले हैं.

2019 का चुनाव नहीं है बाएं हाथ का खेल

साल 2019 के आम चुनाव अभी भी मोदी के लिए बाएं हाथ का खेल नहीं हैं.

कांग्रेस की हार राहुल गांधी के नेतृत्व वाली पार्टी के लिए बहुत बड़ा झटका है क्योंकि अब कांग्रेस सिर्फ पंजाब, मिज़ोरम और पुडुच्चेरी में ही मौजूद है.

इस चुनाव में कांग्रेस की इतनी बड़ी हार हुई है कि इससे 2019 के लिए मनोबल में कमी आई है.

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लेकिन अगर सर्दियों में होने वाले राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ पर नज़र डालें तो बीजेपी आखिरी के दो राज्यों में सत्ताधारी पार्टी है और राजस्थान में उसे उप चुनाव में लगातार हार का सामना करना पड़ा है.

बीजेपी के प्रदर्शन की बात करें तो ये उस चुनाव में बेहतर प्रदर्शन करती है जहां ये सत्ताधारी पार्टी न होकर (गुजरात में ये देखा जा चुका है) चुनौती देने की स्थिति में होती है.

लेकिन कर्नाटक में मज़बूत नेता, अपने काम के लिए चर्चित मुख्यमंत्री और जातियों के मुफ़ीद गठबंधन की मौजूदगी में जीत हासिल करना कांग्रेस को भविष्य के लिए मज़बूती दे सकता है.

लेकिन उस चुनाव में जहां इसे जीतना चाहिए था, जीत सकती थी, जीतती हुई दिखी, लेकिन कांग्रेस ये चुनाव हार गई.

राहुल को थी एक जीत की दरकार

गुजरात में नैतिक जीत के बाद राहुल गांधी को एक असली जीत की ज़रूरत थी, लेकिन कोशिश करने के बावजूद वह ऐसा करने में सफल नहीं हो सके.

ऐसे में क्या उनके द्वारा कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व किए जाने पर सवाल उठेंगे? मोदी के नेतृत्व वाली बीजेपी के सामने इस समय एक तरह से किसी भी तरह का विपक्ष मौजूद नहीं है.

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मोदी अब 2019 के चुनाव को राष्ट्रपति चुनाव जैसा रंग देने की कोशिश करेंगे जो उनके व्यक्तित्व पर आधारित होगा और इंदिरा गांधी के 1971 वाले चुनावी नारे "मैं कहती हूं ग़रीबी हटाओ, वो कहते हैं इंदिरा हटाओ" जैसा कोई नारा लेकर आएंगे.

अगर किसी चुनाव में मोदी बनाम सभी का समीकरण होगा तो वह मोदी कल्ट को मज़बूत ही करेगा.

लेकिन मोदी कर्नाटक में मिशन 150 को हासिल करने में असफल हुए हैं जबकि कर्नाटक में जाति और समुदाय अभी भी उतने ही बंटे हुए हैं जैसे हमेशा से बंटे हुए थे.

भारत में असंख्य जाति और संस्कृतियों के समूह में स्थानीय राजनीतिक शक्तियों के लिए हमेशा जगह बनी रहेगी, चाहे नई दिल्ली में कितना भी शक्तिशाली राजनीतिक व्यक्ति राज करता रहे.

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