उषा मेहता: 'सीक्रेट कांग्रेस रेडियो' का 1942 में कैसे किया संचालन ? खुद बयां कर गईं वह अद्भुत कहानी
नई दिल्ली, 24 जुलाई: भारत आजादी का अमृत महोत्सव मना रहा है। देश की आजादी में योगदान देने वाले अनगिनत नायक-नायिकों में हर एक की कहानी उस दौर को बयां करती है। सबकी कहानी अलग है और हर एक कहानी दुर्लभ तो है ही अपने आप में अद्भुत भी है। उन्हीं में से आज हम चर्चा कर रहे हैं, प्रसिद्ध गांधीवादी और सीक्रेट कांग्रेस रेडियो की संचालक और उद्घोषक उषा मेहता की। इनकी वजह से 1942 का आंदोलन देखते ही देखते जन-क्रांति बन गया था और ऐसा माहौल तैयार हुआ कि पांच साल बाद अंग्रेजी हुकूमत ने यहां से बोरिया-बिस्तर समेट लिया। ये बात अलग ही कि जाते-जाते अंग्रेजों ने देश में इतनी आग लगा दी, जो आज भी कभी-कभी बहुत ही भयावह रूप ले लेती है।

सीक्रेट कांग्रेस रेडियो की संचालक थीं उषा मेहता
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास अनगिनत गुमनाम नायक-नायिकाओं से भरा पड़ा है। उन्हीं में से एक हैं, उषा मेहता जो विशुद्ध गांधीवादी तो थी हीं, स्वाधीनता आंदोलन में उनका योगदान कभी भुलाया ही नहीं जा सकता। उनकी पहचान 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान अंडरग्राउंड रहकर सीक्रेट कांग्रेस रेडियो के संचालन को लेकर है। इसलिए उन्हें 'रेडियो वुमेन ऑफ इंडिया' के नाम से भी जाना जाता है। कांग्रेस रेडियो के संचालन में डॉक्टर उषा मेहता के सहयोगी थे, विट्ठल दास खाकड़, चंद्रकांत झावेरी और बाबू भाई ठक्कर। इसके लिए शिकागो रेडियो के ननका मोटवानी ने तकनीशियन और उपकरण उपलब्ध करवाए।

गांधी जी के आह्वान को जन-जन तक पहुंचाने का माध्यम बनीं
25 मार्च, 2020 को जन्मीं उषा मेहता को स्वतंत्रता आंदोलन में ख्याति तो अगस्त 1942 में रेडियो पर गूंजी उनकी आवाज से मिली है, लेकिन 1928 में जब वो सिर्फ आठ साल की थीं, तभी साइमन कमीशन के खिलाफ विरोध प्रदर्शन का हिस्सा बन चुकी थीं। उसके बाद उन्होंने कभी भी आंदोलन से रुख पीछे नहीं किया। 8 अगस्त, 1942 को कांग्रेस के बॉम्बे अधिवेशन में महात्मा गांधी ने संपूर्ण आजादी की मांग रखी और अंग्रेजों भारत छोड़ो का नारा दिया। इसके बाद कॉलेज की इस छात्रा ने मानो गांधी जी के आह्वान को जन-जन तक पहुंचाने की ठान ली।

कांग्रेस रेडियो से जुड़ीं कई बड़ी हस्तियां
एक दिन बाद ही कांग्रेस के सारे बड़े नेता या तो गिरफ्तार कर लिए गए थे या भूमिगत हो चुके थे। देश में बड़ा जन-आंदोलन शुरू हो चुका था। कई नेताओं ने वर्षों जेल में गुजारे और जनता के संपर्क से दूर हो गए। ठीक इसी समय में जन-जन को जगाए रखने और उनतक आंदोलन से जुड़ी हर खबर पहुंचाने के लिए कांग्रेस के खुफिया रेडियो ने कमान संभाली। यह भूमिगत रेडियो स्टेशन भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान करीब 3 महीने तक चलता रहा और यह कांग्रेस की आवाज बना रहा। राम मनोहर लोहिया, अच्युत राव पटवर्घन और पुरषोत्म टीकमदास जैसी हस्तियां भी कांग्रेस रेडियो से जुड़ी रहीं।

सारा जीवन गांधी जी के विचारों के प्रति समर्पित रहीं
यह रेडियो बॉम्बे के अलग-अलग जगहों से संचालित होता रहा, जिसकी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी संभाली उषा मेहता ने। महान स्वतंत्रता सेनानी उषा मेहता ने हैम रेडियो के ऑपरेटरों की सहायता से यह कमान संभाला था। 27 अगस्त, 1942 को कांग्रेस के खुफिया रेडियो का संचालन शुरू हुआ। उद्घोषक की आवाज भी थी उषा मेहता की-'ये कांग्रेस रेडियो है। 42.34 मीटर पर आप हमें भारत में किसी जगह से सुन रहे हैं।' उन्होंने आजादी के बाद अपनी बाकी की पढ़ाई पूरी की और बॉम्बे यूनिवर्सिटी से पीएचडी की डिग्री प्राप्त की। वह पूरा जीवन गांधीजी के विचारों के प्रचार-प्रसार के लिए समर्पित रहीं। उन्हें पद्म विभूषण के सम्मान से नवाजा जा चुका था।

खुद बयां कर गईं वह अद्भुत कहानी
11 अगस्त, 2000 को देहांत से पहले उन्होंने एकबार आकाशवाणी को दिए इंटरव्यू में कांग्रेस सीक्रेट रेडियो के प्रसारण के बारे में कहा था- 'मैं बॉम्बे में अंडरग्राउंड कांग्रेस रेडियो से जुड़ी थी.....बेशक हम कहते थे, यह कांग्रेस रेडियो है। जिसकी ब्रॉडकास्टिंग भारत में कहीं से हो रही है। लेकिन, दरअसल इसे हम बॉम्बे में कहीं से ऑपरेट कर रहे थे।' उन्होंने बताया था, 'जैसे ही महात्मा गांधी ने करो या मरोट का नारा दिया, हमने सोचा कि यह अच्छा होगा कि हमारा अपना ब्रॉडकास्टिंग स्टेशन हो। क्योंकि,जनता को स्वतंत्रता संघर्ष का समाचार देने के लिए और देश के हर कोने तक पहुंचने के लिए ट्रांसमीटर ही एक बेहतर तरीका था। इसी के लिए हमने एक सीक्रेट रेडियो स्टेशन शुरू करने के बारे में सोचा।'(पहली तस्वीर सौजन्य: विकिपीडिया, कुछ तस्वीरें सौजन्य: सोशल मीडिया)
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