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Russia Oil Import: अमेरिका ने भारत पर लिया एक्शन, चीन बोला टैरिफ का दुरुपयोग गलत

US Action on India: वैश्विक कूटनीति और इंटरनेशलन ट्रेड में उस वक्त एक नया मोड़ आया है, जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत के खिलाफ बड़ा आर्थिक कदम उठाते हुए 25% अतिरिक्त टैरिफ लगाने का ऐलान किया। समाचार एजेंसी रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, यह कार्यकारी आदेश (Executive Order) भारत की रूस से कच्चे तेल (India Russia oil deal) की खरीद पर रोक लगाने के अमेरिकी दबाव का हिस्सा है।

वॉशिंगटन का मानना है कि रूस से ऊर्जा खरीदने (Russia Oil Import) वाले देश उसकी आय बढ़ाकर अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों को कमजोर करते हैं। इस फैसले के बाद भारत-अमेरिका व्यापार संबंध (India US trade tensions) और तनावपूर्ण हो सकते हैं, जबकि वैश्विक ऊर्जा बाजार और तेल की कीमतों पर भी इसका सीधा असर पड़ने की आशंका है।

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पूरे मामले पर चीन ने क्या कहा?

अमेरिका लंबे समय से रूस पर आर्थिक प्रतिबंध लागू कर रहा है, खासकर यूक्रेन युद्ध के बाद। वॉशिंगटन का मानना है कि रूस से तेल खरीदने वाले देश अप्रत्यक्ष रूप से उसके राजस्व में योगदान दे रहे हैं, जिससे रूस की युद्ध क्षमता बनी रहती है।

इसी के तहत, राष्ट्रपति ट्रंप ने भारत पर यह अतिरिक्त टैरिफ लगाया है, जिसे वे "राष्ट्रीय सुरक्षा और वैश्विक स्थिरता" के लिए जरूरी मानते हैं। इस फैसले पर चीन ने स्पष्ट रूप से अपनी आपत्ति जताई है। चीन के विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता गुओ जियाकुन (Guo Jiakun) ने कहा -"टैरिफ का दुरुपयोग करने के खिलाफ चीन की स्थिति हमेशा से स्पष्ट और सुसंगत रही है।"

चीन का कहना है कि एकतरफा आर्थिक दबाव और टैरिफ लगाना न केवल अंतरराष्ट्रीय व्यापार के नियमों के खिलाफ है, बल्कि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला और आर्थिक स्थिरता को भी नुकसान पहुंचाता है।

भारत ने क्या दी प्रतिक्रिया?

भारत ने अभी तक इस पर आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है, लेकिन पहले भी भारत ने यह रुख अपनाया है कि वह अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं और रणनीतिक हितों के अनुसार किसी भी देश से तेल खरीदने का अधिकार रखता है। भारत का तर्क है कि सस्ता कच्चा तेल आयात करने से घरेलू महंगाई पर नियंत्रण रखने और ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने में मदद मिलती है।

Russia Oil Import: : रूस के साथ क्या है समझौता ?

भारत रूस से कच्चा तेल खरीदता है और बदले में भुगतान करता है। यह कोई एक बार का सौदा नहीं, बल्कि एक लगातार चलने वाला ऊर्जा व्यापार है। यह समझौता दरअसल भारत और रूस के बीच कच्चे तेल की खरीद-बिक्री को लेकर है। यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी देशों द्वारा रूस पर लगाए गए कड़े आर्थिक प्रतिबंधों के बावजूद भारत ने रूस से सस्ता कच्चा तेल खरीदना जारी रखा है।

ये डील इतनी खास क्यों है?

सस्ता तेल: रूस भारत को अंतरराष्ट्रीय बाजार से कम दाम पर कच्चा तेल बेचता है।

ऊर्जा सुरक्षा: भारत अपनी ऊर्जा ज़रूरतों का लगभग 80% आयात करता है, और रूस इसके लिए एक बड़ा स्रोत बन गया है।

जियोपॉलिटिकल असर: पश्चिमी देशों, खासकर अमेरिका, ने यूक्रेन युद्ध के बाद रूस पर प्रतिबंध लगाए हैं। इसके बावजूद भारत रूस से तेल खरीद जारी रखता है, जिससे वैश्विक राजनीति में यह मुद्दा संवेदनशील हो गया है।

आंकड़ों के अनुसार, रूस भारत को अंतरराष्ट्रीय बाजार की तुलना में काफी कम कीमत पर तेल उपलब्ध कराता है। इसका फायदा भारत को अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने और महंगाई पर काबू पाने में मिलता है। भारत अपनी कुल ऊर्जा जरूरतों का लगभग 80% आयात करता है, ऐसे में रूस एक अहम सप्लायर बन चुका है।

India Russia oil deal पर विवाद क्यों हैं?

हालांकि, यही डील अमेरिका और यूरोपीय देशों के साथ भारत के संबंधों में खटास भी पैदा करती है। पश्चिमी देशों का आरोप है कि रूस से तेल खरीदने से उसे आर्थिक मदद मिलती है, जो यूक्रेन युद्ध को लंबा खींच सकती है। अमेरिका और यूरोपीय संघ का कहना है कि रूस से तेल खरीदने पर उसकी आय बढ़ती है, जो युद्ध जारी रखने में मदद कर सकती है।

इस वजह से भारत पर दबाव डाला जाता है कि वह रूस से तेल आयात कम करे। इसके बावजूद भारत ने साफ किया है कि यह फैसला उसकी ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक हितों को ध्यान में रखकर लिया गया है।

अमेरिका के इस कदम से न केवल भारत-अमेरिका व्यापार संबंध प्रभावित हो सकते हैं, बल्कि यह वैश्विक ऊर्जा बाजार में भी अस्थिरता ला सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव तेज हो सकता है, साथ ही भारत के निर्यात-आयात संतुलन पर भी असर पड़ेगा।

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