सबसे पहले भारत की इस जगह पर 1942 में ही फहराया तिरंगा, आजादी के दीवानों ने उखाड़ फेंका यूनियन जैक
97 साल के हरि प्रसाद मिश्र उस दौर की जीवंत गवाही हैं, जब देश आजादी पाने को मचल रहा था। असम में रहने वाले हरि प्रसाद आजादी के गुमनाम नायकों में एक हैं। unsung heroes freedom fighter har prasad mishra assam
नई दिल्ली, 07 अगस्त : भारत आजादी के 75 साल पूरे करने वाला है। इस मौके पर पूरा देश कृतज्ञ भाव वीर सपूतों को याद कर रहा है। इन सपूतों ने अंग्रेजों के चंगुल से भारत को आजाद कराने में अहम भूमिका निभाई। ऐसे समय में जब अंग्रेजी हुकूमत हर तरीके से भारतीय जनमानस का दमन करने में जुटी थी, मां भारती की कोख से जन्मे असंख्य सपूतों ने अंग्रेजी हुकूमत की चूलें हिलाने में भी जुटे थे। खुदीराम बोस भगत सिंह जैसे युवा अपने हौसले से अंग्रेजों को पस्त कर रहे थे। कई सपूत ऐसे भी हैं, जो भले ही गुमनामी में खो गए लेकिन उनकी भूमिका देश को आजाद कराने में उल्लेखनीय रही है। ऐसे ही एक सपूत का नाम है हरि प्रसाद मिश्रा। वन इंडिया हिंदी की स्पेशल पेशकश अनसंग हीरो की इस कड़ी में आज हरि प्रसाद के बारे में जानिए

17 साल की उम्र में आजादी का आंदोलन
हरि प्रसाद मिश्र का जन्म 22 अक्टूबर, 1925 को अविभाजित दरांग जिले के मेजर आति नेपाली गाँव में हुआ। अभी ये स्थान समर दलानी के नाम से जाना जाता है। स्वर्गीय गौरी कांता मिश्रा और लीलावती मिश्रा के यहां जन्मे हरि प्रसाद 1941 में स्कूली शिक्षा समर दलानी गवर्नमेंट जूनियर बेसिक स्कूल से पूरी करने के बाद महज 17 साल की उम्र में भारत छोड़ो आंदोलन की ओर आकर्षित हुए। शिक्षा को छोड़कर युवा हरि प्रसाद राष्ट्रव्यापी आंदोलन की ओर आकर्षित हुए।

कांग्रेस से जुड़े हरि प्रसाद मिश्र
भारत छोड़ो आंदोलन जैसे ऐतिहासिक मूवमेंट का प्रभाव भारत के अन्य भागों की तरह असम में भी बहुत अधिक महसूस किया गया। तत्कालीन असम प्रदेश कांग्रेस कमेटी ने जिला और क्षेत्रीय समितियों के साथ मिलकर लोगों को राष्ट्रीय आंदोलन के बारे में जागरूक करने के लिए कई कार्यक्रम शुरू किए। सदस्यता के लिए कई रणनीतियों का उपयोग किया गया। राज्य स्तर के नेताओं ने जिला लेवल के नेताओं के साथ केंद्रीय टीम के उद्देश्यों और निर्णयों को शेयर किया। पार्टी के स्वयंसेवकों को जनता के बीच संदेश फैलाने के लिए लगाया गया। इसी दौरान हरि प्रसाद मिश्र ने कांग्रेस पार्टी की प्राथमिक सदस्यता ग्रहण की।

हरि प्रसाद मृत्यु वाहिनी में शामिल हुए
भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान ज्योति प्रसाद अग्रवाल ने एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने लोगों को जागरूक करने और आम लोगों में देशभक्ति की भावना जगाने के लिए कई देशभक्ति गीतों की रचना की थी। अग्रवाल ने स्वयंसेवकों की भर्ती में उल्लेखनीय योगदान दिया। वॉलेंटियर्स की भर्ती पार्टी के साथ-साथ मृत्यु दस्ते के लिए भी हो रही थी। उन्होंने प्रशिक्षण शिविरों का भी इंतजाम किया। ज्योति प्रसाद अग्रवाल से प्रभावित होकर हरि प्रसाद मृत्यु वाहिनी (Death Squad) में शामिल हुए थे। इस समय असम प्रदेश कांग्रेस समिति (APCC) के अध्यक्ष हेम चंद्र बरुआ और सचिव ओमियो कुमार दास थे। हरि प्रसाद ने कांग्रेस के स्वयंसेवकों के साथ ट्रेनिंग भी ली थी। ज्योति प्रसाद अग्रवाल डेथ स्क्वॉड के जीनर ऑफिसर कमांडिंग (जीओसी) भी थे।

नायक नियुक्त हुए हरि प्रसाद
हरि प्रसाद को ट्रेनिंग के बाद 'नायक' के रूप में नियुक्त किया गया था। अपने पैतृक गांव के अन्य छह युवाओं के साथ ट्रेनिंग लेने वाले हरि प्रसाद ने भागनबाड़ी नेपाली गांव में प्रशिक्षण लिया था। मौत दस्ते के जीओसी और तेजपुर जिला कांग्रेस कमेटी के संयोजक बापराम गोगोई बरुआ ने हरि प्रसाद जैसे युवाओं को ट्रेनिंग दी थी। हरि प्रसाद के संबंध में अपनी राय देते हुए बापरम गोगोई बरुआ लिखते हैं, हरि प्रसाद मिश्रा को उस प्रशिक्षण शिविर में ट्रेनिंग देने के बाद स्वयंसेवकों के एक समूह का नायक नियुक्त किया गया।

'नायक' को सबसे जरूरी काम सौंपे गए
हरि प्रसाद जब नायक बने तो ये ऐसा समय था जब तत्कालीन कांग्रेस हाईकमान हर दिन और रात की समेकित रिपोर्ट देनी होती थी। ऐसे में हरि प्रसाद व अन्य स्वयंसेवकों को कुछ सबसे गोपनीय और जरूरी कर्तव्य सौंपे गए। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान वर्ष 1947 तक कांग्रेस डेथ स्क्वॉड का सबसे खतरनाक कार्यक्रम 'ठाणे दखल' और 'तेजपुर दरबार की अदालत की इमारत पर झंडा फहराना' था। कांग्रेस सेवा दल, तेजपुर के जीओसी बापराम गोगोई बरुआ ने हरि प्रसाद के संबंध में ये बात 9 जुलाई, 1976, को कही।

ग्रामीणों से जुड़े रहे हरि प्रसाद
स्थानीय स्तर पर कांग्रेस पार्टी ने हरि प्रसाद मिश्रा को जासूस का काम दिया। उन्होंने पार्टी के भूमिगत कार्यकर्ता के रूप में भी काम किया। गाँव में हरि प्रसाद के घनिष्ठ साथी तारानाथ सरमा और निधि प्रसाद शर्मा थे। उन्होंने ग्रामीण स्तर पर शांति और सद्भाव बनाए रखने के लिए काम किया। हरि प्रसाद मिश्र ने सूतिया (Sootea) और जमुगुरी समिति के साथ भी सौहार्दपूर्ण संबंध बनाए रखा।

लंबे समय तक अंडरग्राउंड रहे
गहन चंद्र गोस्वामी, बिजॉय चंद्र भगवती और चंद्र कांता भुइयां की गिनती हरि प्रसाद समय के साथियों में होती थी। बिजॉय चंद्र भगवती ने लिखा था, हरि प्रसाद ने 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लिया। वे अंडरग्राउंड हो गए और छह महीने से अधिक समय तक आंदोलन से जुड़े रहे। अक्टूबर, 1942 से अप्रैल 1943 तक फरार रहे हरि प्रसाद के बारे में भगवती ने 13 जुलाई 1984 के असम के तेजपुर में ये बात नोट की।

तिरंगा आजादी के पांच साल पहले फहराया
कांग्रेस कमेटी के एजेंडे के एक भाग के रूप में, 20 सितंबर, 1942 को सरकारी कार्यालयों, न्यायालय भवन और पुलिस स्टेशनों सहित सभी सरकारी संस्थानों में एक साथ तिरंगा फहराने का निर्णय लिया गया था। सूतिया समिति ने तिरंगा समय से पहले ही फहराने का फैसला ले लिया। सूतिया पुलिस स्टेशन पर निर्धारित समय से पहले, 20 अगस्त 1942 को ही तिरंगा फहरा दिया गया। कहा जाता है कि सूतिया पुलिस स्टेशन भारत का पहला और एकमात्र स्थान था जहां पहली बार यूनियन जैक को उखाड़ फेंका गया और तिरंगा फहराया गया। महेंद्र बरकाटाकी, बोलोरम बोरमुदोई, चंद्र बोरा, बीरेन बोरकाटाकी और अन्य स्वतंत्रता सेनानी इस ऐतिहासिक क्षण के कर्ता-धर्ता और साक्षी भी रहे। बाद में ब्रिटिश प्रशासन ने 22 अगस्त 1942 को भारतीय ध्वजारोहण को अवैध करार दिया। महेंद्र बरकाटाकी, समेत अन्य आजादी के दीवानों को गिरफ्तार कर सलाखों के पीछे भेज दिया गया।

तिरंगा 20 सितंबर को भी कई जगहों पर लहराया
देश के अन्य हिस्सों की तरह, गोहपुर, सूतिया और ढेकियाजुली के कांग्रेस कार्यकर्ता एक बार फिर जमा हुए। 20 सितंबर, 1942 को तिरंगा फहराने की योजना के तहत संबंधित पुलिस स्टेशनों की ओर मार्च शुरू हुआ। ब्रिटिश प्रशासन ने प्रदर्शनकारियों पर गोलियां भी चलाईं। इसमें कनकलता बारू और गोहपुर के मुकुंद काकाती के अलावा 13 लोगों की मौत हुई। ढेकियाजुली पुलिस स्टेशन में 13 लोगों ने सर्वोच्च बलिदान दिया। दमन की हरसंभव कोशिश हुई, लेकिन 20 सितंबर के ऐतिहासिक दिन सूतिया थाने में भी तिरंगा फहराया गया। शांतिपूर्वक तरीके से तिरंगा फहराने का श्रेय सूतिया डेथ स्क्वाड के तत्कालीन सेक्शन कमांडर गोलक सैकिया को जाता है। उन्होंने यूनियन जैक को नीचे कर तिरंगा फहराया था। इस दुर्लभ लेकिन ऐतिहासिक क्षण के प्रत्यक्षदर्शी हरि प्रसाद मिश्र आज भी जीवित हैं।

हरि प्रसाद कांग्रेस में रहे एक्टिव
1942 के जन आंदोलन के बाद भी हरि प्रसाद कांग्रेस के साथ सक्रिय रहे। उन्होंने समाज सेवा के अलावा ग्राम स्तर पर प्राथमिक कार्यकर्ता के रूप में भी कांग्रेस पार्टी की सेवा की। उन्होंने वृहत्तर नागशंकर क्षेत्र में अनेक सामाजिक-आर्थिक और शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना में भी विशिष्ट भूमिका निभाई। एक नजर हरि प्रसाद की भूमिका से तैयार हुए संस्थानों के नाम पर-
- नागशंकर हाई स्कूल, लखनगढ़ कीर्तन संघ। संघ को वर्तमान में लखनगढ़ समर दलानी गाँव उन्नयन समिति के रूप में जाना जाता है।
- समर दलानी एमई स्कूल
- श्री श्री लक्ष्मी नारायण मंदिर, बापूजी पुस्तकालय (वर्तमान में तारानाथ सरमा स्मृति पुस्तकालय)
- नागशंकर समाबाई समिति
- दखिन नागशंकर शामिल हैं हाई स्कूल

2016 में राष्ट्रपति ने किया सम्मानित
1947 में मिली बहुप्रतीक्षित स्वतंत्रता के बाद, हरि प्रसाद मिश्रा ऑल असम फ्रीडम फाइटर्स एसोसिएशन के संपर्क में आए। वे स्वतंत्रता सेनानी संघ की सोनितपुर जिला समिति के अध्यक्ष बने। स्वतंत्रता आंदोलन के गुमनाम नायक को 1994 में असम सरकार ने राजनीतिक पीड़ित पेंशन से सम्मानित किया। भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति, प्रणब मुखर्जी ने 9 अगस्त, 2016 को राष्ट्रपति भवन में स्वतंत्रता के अन्य नायकों के साथ सबसे वरिष्ठ नायक हरि प्रसाद को भी सम्मानित किया था।

97 साल के हरि प्रसाद 130 करोड़ नागरिकों की प्रेरणा
हरि प्रसाद मिश्रा, 97 साल की आयु में भी युवाओं के लिए प्रेरणा पुंज से कम नहीं। उम्र की इस दहलीज पर हरि प्रसाद शताब्दी पूरी करने से महज तीन साल दूर हैं। समर दलानी निवास पर परिवार के सदस्यों के साथ सामान्य और खुशहाल जीवन जी रहे हरि प्रसाद मिश्र समेत 130 करोड़ से अधिक देशवासियों को वनइंडिया हिंदी परिवार की ओर से आगामी 76वें स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं...
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