1300 साल से अपनी जगह पर टिका है ये ऐतिहासिक पत्थर, जानें 'कृष्णा बटर बॉल' का पूरा रहस्य

नई दिल्ली। भारत और चीन के बीच रिश्तों को और प्रगाढ़ बनाने के लिए दोनों ही देश लगातार कोशिशों में जुटे हुए हैं। इसी बीच चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग भारत के दौरे पर पहुंचे, जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनकी भव्य अगवानी की। एशिया के दो बड़े देशों के दोनों राष्ट्राध्यक्षों की ये मुलाकात तमिलनाडु के ममल्लापुरम हुई। ये वही जगह है जिसे महाबलीपुरम के नाम से भी जाना जाता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने न केवल चीन के राष्‍ट्रपति का भव्य स्‍वागत किया, बल्कि उन्‍हें यहां मौजूद हैरिटेज साइट्स को भी खुद दिखाने के लिए ले गए। इसी दौरान दोनों नेताओं की एक तस्‍वीर सोशल मीडिया पर काफी तेजी से वायरल होने लगी। जिस तस्‍वीर ने सुर्खियां बटोरीं उसमें पीएम मोदी और शी जिनपिंग एक बड़े सा पत्‍थर के सामने खड़े नजर रहे हैं। दोनों राष्ट्राध्यक्षों ने अपने हाथ उठा रखे हैं और उनके बिल्कुल पीछे ये बड़ा सा पत्थर नजर आ रहा है। इस बड़े भारी पत्थर को गौर से देखें तो ये बेहद खतरनाक तरीके से आगे की ओर झुका हुआ भी नजर आ रहा है। आपको जानकर हैरानी होगी कि सोशल मीडिया पर छा जाने वाला ये पत्थर को साधारण पत्थर नहीं है बल्कि ये एक ऐतिहासिक पत्थर है। इस पत्थर से जुड़ी कई खूबियां हैं जिनके बारे में शायद ही आपको पता होगा, तो चलिए आपको बताते हैं इस ऐतिहासिक पत्थर से जुड़े खास रहस्य...

250 टन का 'कृष्‍णा बटर बॉल', जहां मिले पीएम मोदी और जिनपिंग

250 टन का 'कृष्‍णा बटर बॉल', जहां मिले पीएम मोदी और जिनपिंग

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग जिस ऐतिहासिक पत्थर के आगे खड़े नजर आए, उसका नाम है- 'कृष्‍णा बटर बॉल'। इस पत्थर का वजन करीब 250 टन है। जानकारी के मुताबिक, पिछले करीब 1300 साल से ये पत्थर भूकंप, सुनामी, चक्रवात समेत विभिन्न प्राकृतिक आपदाओं को सहने के बाद भी अपनी जगह से हिला नहीं है। ये उसी खतरनाक तरीके से आगे की झुका हुआ है और इसे देखने से साफ नजर आ रहा कि उसे कहीं से कोई सपोर्ट भी नहीं मिल रहा। यही नहीं ऐसे कई मौके भी आए जब इस पत्‍थर को हटाने के लिए प्रयास भी किया गया। हालांकि, सारे प्रयास असफल ही रहे।

45 डिग्री के ढलान पर खतरनाक तरीके से आगे झुका है ये पत्थर

45 डिग्री के ढलान पर खतरनाक तरीके से आगे झुका है ये पत्थर

अपनी इसी खास खूबी की वजह से 'कृष्‍णा बटर बॉल' यहां आने वाले पर्यटकों के लिए आश्‍चर्य का केंद्र बना रहता है। इस पत्थर को लोग 'भगवान का पत्‍थर' भी कहते हैं। इस पत्थर की स्थिति के बारे में देखें तो ये एक पहाड़ी के ऊपर स्थित है। इसकी ऊंचाई करीब 20 फीट है और चौड़ाई 5 मीटर है। इस पत्‍थर का वजन करीब 250 टन है। यही नहीं ये पत्थर करीब 45 डिग्री के ढलान पर मौजूद है। ये भारी-भरकम पत्‍थर जिस तरह से पहाड़ी पर बेहद खतरनाक तरीके से खड़ा है उससे देखकर ऐसा लगता है कि ये कभी भी नीचे की लुढ़क सकता है, लेकिन पिछले 1300 साल से ये अपनी जगह से हिला भी नहीं है।

सूनामी, भूकंप, चक्रवात भी नहीं हिला सके ये पत्थर

सूनामी, भूकंप, चक्रवात भी नहीं हिला सके ये पत्थर

ऐसा नहीं है कि 'कृष्‍णा बटर बॉल' पत्थर को अपनी जगह से हटाने का प्रयास नहीं हुआ। बताया जाता है कि सन् 630 से 668 के बीच दक्षिण भारत पर राज करने वाले पल्‍लव वंश के राजा नरसिंह वर्मन ने इस पत्थर को हटवाने की बहुत कोशिश की थी। उनका मानना था कि ये पत्‍थर स्‍वर्ग से गिरा है, इसलिए कोई भी मूर्तिकार इससे कोई छेड़छाड़ नहीं कर सकें। हालांकि, पल्‍लव वंश के राजा नरसिंह वर्मन की कोशिश कामयाब नहीं हो सकी, क्योंकि इस पत्थर को कोई भी अपनी जगह से नहीं हिला सका।

हटाने की कोशिश रही नाकाम, 7 हाथी भी नहीं हिला पाए ये पत्थर

हटाने की कोशिश रही नाकाम, 7 हाथी भी नहीं हिला पाए ये पत्थर

साल 1908 में ब्रिटिश राज के दौरान मद्रास के गवर्नर आर्थर लावले ने भी इसे हटाने की कोशिश की थी। उन्हें डर था कि कहीं ये विशालकाय पत्‍थर लुढ़क कर इलाके में तबाही की वजह नहीं बन जाए। इसके लिए उन्होंने गवर्नर लावले ने सात हाथियों को भी इस पत्थर को हटाने के लिए उतारा लेकिन सात हाथी की मदद के बावजूद उनकी कोशिश भी नाकामयाब ही रही।

'स्‍वर्ग से लाया हुआ है ये पत्‍थर'

'स्‍वर्ग से लाया हुआ है ये पत्‍थर'

जानकारों के मुताबिक, इस पत्‍थर में कई विशेषताएं हैं, जैसे कि इस पर गुरुत्‍वाकर्षण का कोई असर नहीं पड़ता है। स्‍थानीय लोगों की मानें तो ये पत्थर खुद भगवान ने महाबलीपुरम में रखा था, वहीं कई इसे स्‍वर्ग से लाया हुआ पत्‍थर बताते हैं। वहीं 'कृष्‍णा बटर बॉल' को लेकर वैज्ञानिकों का मानना है कि ये पत्थर अपने प्राकृतिक स्‍वरूप में है। भूवैज्ञानिकों का मानना है कि धरती में आए प्राकृतिक बदलाव की वजह से इस तरह के असामान्‍य आकार के पत्‍थर का जन्‍म हुआ है। फिलहाल अभी तक ये स्पष्ट कारण पता नहीं चला है कि आखिर ये भारी-भरकम 250 टन का पत्‍थर आखिर कैसे एक पहाड़ी बिना की सपोर्ट के टिका हुआ है। इस ऐतिहासिक पत्थर का ये रहस्य अभी भी बरकरार है।

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