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कभी आडवाणी के खेमे में रहे अनंत कुमार मोदी के भी बने खास

नई दिल्‍ली। संसदीय कार्यमंत्री एच एन अनंत कुमार का सोमवार तड़के बैंगलुरू में निधन हो गया है। 59 साल के अनंत कुमार कर्नाटक में बीजेपी के दिग्गज नेता के रूप में जाने जाते थे। वे अपने पीछे अपनी पत्नी तेजस्वी और दो बेटियों को छोड़ गए हैं।

आनंत कुमार
Getty Images
आनंत कुमार

फेफड़ों के कैंसर से पीड़ित अनंत कुमार दो हफ़्ते पहले ही लंदन से इलाज कराकर बैंगलुरू लौटे थे। मई में विधानसभा चुनाव के कैंपेन के दौरान उन्हें खांसी की गंभीर समस्या हुई थी, जो सही नहीं हो रही थी। जिसके इलाज के लिए वे कुछ महीने पहले ही लंदन और न्यूयॉर्क गए थे।

अनंत कुमार के कार्यालय द्वारा जारी एक बयान में कहा गया है कि कैंसर और संक्रमण के चलते अनंत कुमार का रात दो बजे निधन हो गया है। वे पिछले कुछ दिनों से आईसीयू में भर्ती थे और वेंटिलेंटर पर थे। वे बैंगलुरू दक्षिण से 1996 से लोकसभा के सदस्य थे। उन्हें बीजेपी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी का करीबी माना जाता था, लेकिन 2014 में मोदी कैबिनेट में रसायन और उर्वरक मंत्री के रूप में शामिल होने के बाद वो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भी 'प्रिय' बन गए थे।

अनंत कुमार का हिंदी जानना उनके लिए फ़ायदेमंद साबित हुआ। भारत के उत्तरी राज्यों में चुनाव के दौरान पार्टी ने उन्हें कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां भी दीं। तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने उन्हें अपने दूसरे कार्यकाल में केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल किया था। वे केंद्रीय मंत्री और भाजपा नेता प्रमोद महाजन के करीबी भी रहे हैं।

https://twitter.com/narendramodi/status/1061784899802152960

उनकी मौत पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी दुख जाहिर किया है। मोदी ने ट्वीट किया कि अनंत कुमार एक बेहतरीन नेता थे जो अपने युवा काल में ही सार्वजनिक जीवन में उतर आए थे। उन्होंने पूरी निष्ठा और लगन के साथ समाज की सेवा की. उन्हें उनके अच्छे कार्यों के कारण हमेशा याद किया जाएगा।

मोदी और अनंत कुमार
Getty Images
मोदी और अनंत कुमार

अनंत के सकारात्मक काम

मोदी सरकार के सत्ता में आने के तुरंत बाद ही उन्होंने किसानों तक सुनिश्चित समय पर खाद पहुँचाने के लिए कई सकारात्मक कदम उठाए। केंद्रीय मंत्री सदानंद गौड़ा ने एक ट्वीट में कहा कि उन्हें अनंत कुमार की मौत से धक्का लगा है। सदानंद लिखते हैं, ''यकीन नहीं हो रहा. मेरे दोस्त, मेरे भाई अनंत कुमार नहीं रहे।''

अनंत कुमार ने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत 1985 में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) का सदस्य बनकर की। अनंत कुमार तभी से कर्नाटक में बीजेपी से जुड़े रहे. उन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री और बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष बीएस येदियुरप्पा और पूर्व प्रदेश पार्टी अध्यक्ष केएस ईश्वरप्पा के साथ मिलकर पार्टी की सबसे शक्तिशाली तिकड़ी बनाई।

येदियुरप्पा

लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री येदियुरप्पा के साथ नेतृत्व की रस्साकशी की वजह से कर्नाटक बीजेपी में दो कैंप बन गए। यही वजह थी कि येदियुरप्पा ने कर्नाटक जनता पक्ष यानी केजेपी नाम की अपनी पार्टी भी बनाई। साल 2011 में अवैध खनन पर लोकायुक्त की रिपोर्ट के बाद येदियुरप्पा को मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़नी पड़ी थी।

इस्तीफ़े से पहले येदियुरप्पा ने कई बार सार्वजनिक तौर पर आडवाणी और अनंत कुमार को टार्गेट किया और आरोप लगाया कि ऐसे हालात पैदा किए जा रहे हैं कि उन्हें इस्तीफ़ा देना पड़े। 2013 में हुए चुनावों में केजेपी ने दस फ़ीसदी वोट हासिल कर भाजपा के वोटबैंक में बड़ी सेंध मारी थी। इस चुनाव में कांग्रेस को जीत मिली थी।

साल 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले मोदी ने ख़ुद को पार्टी के भीतर प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर पोजीशन करना शुरू किया था। उस दौरान अनंत कुमार ने सबसे पहले येदियुरप्पा को वापस पार्टी में लाने का काम किया था।

इसकी वजह लिंगायत समुदाय में येदियुरप्पा के लिए भारी समर्थन था। लेकिन इसके बावजूद येदियुरप्पा ख़ुश नहीं थे क्योंकि उनके समर्थकों को पार्टी में कोई ख़ास तवज्जो नहीं दी गई क्योंकि सभी अहम पदों पर अनंत कुमार के समर्थक बैठे हुए थे।

मौजूदा कर्नाटक गठबंधन सरकार के एक वरिष्ठ नेता ने अपना नाम न बताने की शर्त पर कहा कि बीजेपी के भीतर प्रतिस्पर्द्धा से पार्टी को नुकसान भी हुआ है।

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