UCC : भारत की राजनीति में अब नयी खलबली, बदल सकती है सियासी तस्वीर
समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code) विधेयक बनने से पहले ही पुरजोर चर्चा में है। इसके समर्थन और विरोध में उठ रही आवाजों ने भारतीय राजनीति का तापमान बढ़ा दिया है। अगले कुछ महीनों तक यह मुद्दा भारतीय राजनीति का निर्णायक तत्व बन सकता है। इससे विपक्षी एकता की मुहिम पर भी असर पड़ सकता है। संसद का मानसून सत्र 20 जुलाई से शुरू हो रहा है। यह सत्र संसद के नये भवन में चलेगा। चर्चा है कि मोदी सरकार मानसून सत्र में ही यूसीसी विधेयक संसद में पेश करने वाली है। संसद में विधेयक पेश होने के बाद चर्चा के दौरान भारतीय राजनीति की एक नयी झलक देखने को मिल सकती है।
UCC पर 13 जुलाई तक रायशुमारी
समान नागरिक संहिता का मतलब है देश के सभी नागरिकों के लिए एक कानून। ऐसा कानून जिसमें जाति और धर्म की कोई सीमा न हो। यानी सभी धर्मों के नागरिकों के लिए एक समान नागरिक कानून। विधि आयोग 14 जून से इस विषय पर रायशुमारी कर रहा है। दो सप्ताह में ही साढ़े आठ लाख लोगों ने अपनी प्रतिक्रिया भेज दी थी। आम जनता, सार्वजिनक संस्थानों और धार्मिक संस्थानों से उनकी राय मांगी गयी है ताकि आयोग किसी निष्कर्ष पर पहुंच सके। यह रायशुमारी 13 जुलाई तक चलेगी। संविधान के अनुच्छेद 44 में कहा गया है कि देश के सभी निवासियों के लिए एक समान नागरिक कानून बनाना सरकार का दायित्व है। इस मुद्दे पर अब आम लोगों की राय अहम होगी।

आप का लीक से हट कर फैसला
27 जून को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने समान नागरिक संहिता के पक्ष में जोरदार भाषण दिया था। वैसे तो आम आदमी पार्टी भाजपा और नरेन्द्र मोदी की कट्टर विरोधी है लेकिन उसने यूसीसी का समर्थन कर सभी को चौंका दिया। हालांकि उसका यह समर्थन सैद्धांतिक है और उसने कुछ शर्तें भी रखी है। आगे क्या होगा, अभी पता नहीं लेकिन आप का यह फैसला लीक से हट कर है जो विपक्षी एकता की कोशिश में खलल डाल सकता है।
विपक्षी एकता की कोशिश पर खतरा
समान नागरिक संहिता के मुद्दे पर विपक्ष के दल दो गुटों में बंटते नजर आ रहे हैं। आप ने इसे शर्तों के साथ सैद्धांतिक समर्थन दिया है। इस मुद्दे पर शरद पवार की पार्टी एनसीपी फिलहाल तटस्थ नजर आ रही है। शिवसेना के संस्थापक बाला साहेब ठाकरे समान नागरिक संहिता को लागू करने के पक्के समर्थक थे। इसलिए कांग्रेस के साथ चल रहे उद्धव ठाकरे के लिए इसका विरोध संभव नहीं था। आखिरकार उन्होंने की पीएम मोदी की पहल को समर्थन दे दिया है। नीतीश कुमार से जब यूसीसी पर उनकी प्रतिक्रिया पूछी गयी तो वे सवाल को टाल गये। अगर यूसीसी के मुद्दे पर विपक्ष दो फाड़ हो गया तो 2024 के महाअभियान का क्या होगा ?
विपक्षा ने कहा, यह भाजपा का चुनावी एजेंडा
विपक्षी दलों का आरोप है कि समान नागरिक संहिता का मुद्दा भाजपा का चुनावी एजेंडा है। कांग्रेस ने कहा कि केन्द्र सरकार ने ज्वलंत मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए यह (यूसीसी) मुद्दा उछाला है। मणिपुर 50 दिनों से हिंसा की आग में जल रहा है लेकिन प्रधानमंत्री चुप हैं। महंगाई और बेरोजगारी के मुद्दे पर भी वे नहीं बोल रहे। तृणणमूल ने इसे विभाजनकारी राजनीति बताया है। डीएमके ने भी इसका विरोध किया है। एआइएमआइएम के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने इस मुद्दे को देश की विविधता पर हमला करार दिया है। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड यूससी के खिलाफ है।
उत्तराखंड सरकार ने यूसीसी का मसौदा तैयार किया
उत्तराखंड की भाजपा सरकार अपने राज्य में समान नागरिक संहिता लागू करने के लिए सबसे ज्यादा सक्रिय है। जस्टिस रंजना देसाई की अगुआई वाली ड्राफ्ट कमेटी ने इसका मसौदा तैयार कर दिया है जिसे जल्द ही राज्य सरकार को भेजा जाएगा। ड्राफ्ट कमेटी ने मसौदा बनाने से पहले सभी राजनीतिक दलों से बात की थी। सभी वर्ग के नागरिकों से चर्चा के बाद इस मुद्देपर उनकी राय ली गयी थी। जस्टिस रंजना देसाई ने एक सवाल के जवाब में कहा था, ऐसा नहीं है कि अल्पसंख्यक वर्ग के सभी लोग यूसीसी का विरोध कर रहे हैं। इस वर्ग के कई लोगों ने इसका समर्थन किया है।
गोवा में पहले से समान नागरिक संहिता
गोवा भारत का पहला राज्य है जहां बहुत पहले यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू है। गोवा पहले पुर्तगाली शासन के अधीन था। पुर्तगालियों ने यहां करीब 450 साल तक राज किया था। पुर्तगाल ने 19वीं शताब्दी में यहां पुर्तगिज सिविल कोड लागू किया था। 1961 में जब गोवा पुर्तगाल से आजाद हो कर भारत का राज्य बना तो पुर्तगिज सिविल कोड भी वजूद में बना रहा। भारतीय राज्य बनने के बाद इस कानून को गोवा सिविल कोड के नाम से जाना जाता है। इस कानून के तहत गोवा में ईसाई, हिंदू, मुस्लिम या अन्य धर्म के लोगों के लिए एक ही नागरिक कानून है। यहां शादी की मान्यता के लिए कोर्ट की मंजूरी चाहिए और तलाक के लिए भी कोर्ट की मंजूरी चाहिए। वहां कोई तीन तलाक नहीं दे सकता। पति की सम्पत्ति में पत्नी का बराबर का अधिकार है। यहां किसी के लिए पर्सनल लॉ नहीं है। गोवा के राज्य बनने के बाद यहां कांग्रेस ने भी शासन किया लेकिन उसने इस कानून को बदलने की कोशिश नहीं की। यूसीसी के समर्थकों का कहना है, अगर गोवा में यह कानून सफलतापूर्वक लागू हो सकता है तो फिर देश में क्यों नहीं ?












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