UCC: शादी से तलाक तक, गोद लेने से हलाला-इद्दत और संपत्ति के अधिकार तक सबकुछ बदल सकता है
यूनिफॉर्म सिविल कोड (यूसीसी) लागू होने से पूरे देश के हर नागरिक के लिए एक समान नागरिक कानून होगा। यानी इसके लागू होने से शादी, तलाक, उत्तराधिकार, संपत्ति का अधिकार और गोद लेने जैसै मामलों में सभी धर्म के लोगों के लिए एक ही व्यवस्था रहेगी। मौजूदा व्यवस्था की तरह इसमें धार्मिक आधार पर किसी तरह का भेदभाव नहीं होगा।
समान नागरिक संहिता के लागू होने से विभिन्न धर्मों के इस संबंध में जो पर्सनल लॉ हैं, वह प्रभावी नहीं रह पाएंगे। अभी देश में अलग-अलग धर्मों के लिए इन मामलों में अलग-अलग व्यवस्था है। जबकि, भारतीय संविधान के आर्टिकल 44 में ही सरकार से यूसीसी लागू करने की अपेक्षा की गई है।

उत्तराखंड में यूसीसी का मसौदा लगभग तैयार
देश में बीजेपी शासित तीन राज्यों मध्य प्रदेश, गुजरात और उत्तराखंड ने यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू करने की घोषणा कर रखी है। लेकिन, इस मामले में उत्तराखंड बहुत आगे है, जिसके यूसीसी का ड्राफ्ट लगभग तैयार है और बहुत जल्द प्रदेश सरकार को सौंपी जाने वाली है।
यूसीसी पर पड़ सकता है उत्तराखंड की ड्राफ्ट का असर
उत्तराखंड में रिटायर्ड जस्टिस रंजना प्रसाद देसाई की अगुवाई में बनी एक्सर्ट कमेटी इस ड्राफ्ट को अंतिम रूप देने में लगी है, जो संभवत: अगले महीने की शुरुआत में पुष्कर सिंह धामी सरकार को सौंपी जा सकती है। जानकारी के मुताबिक इस ड्राफ्ट का इंतजार विधि आयोग से लेकर बाकी दोनों राज्य भी कर रहे हैं।
उत्तराखंड यूसीसी की पांच सदस्यीय एक्सपर्ट समिति जिस ड्राफ्ट को फाइनल कर रही है, उसको लेकर अबतक जो विभिन्न माध्यमों से जानकारी सामने आई हैं, उससे इसके परिणाम का अंदाजा लग सकता है।
बहुविवाह पर रोक: मुस्लिम समुदाय में कुछ परिस्थितियों में पुरुषों को बहुविवाह की छूट है। चार-चार शादियां होती हैं। यूसीसी के तहत इस पर रोक लगाई जा सकती है। यह हमेशा से एक विवादित मुद्दा रहा है।
विवाह की उम्र: देश में यूं तो लड़कियों की शादी की न्यूनतम उम्र 18 वर्ष है। लेकिन, कुछ पर्सनल लॉ और कुछ आदिवासी समाज में 18 वर्ष से कम की लड़कियों की भी शादी की अनुमति है। यूसीसी से इस उम्र को एक समान किया जा सकता है।
शादी का रजिस्ट्रेशन: अभी देश में शादी के लिए रजिस्ट्रेशन अनिवार्य नहीं है। लोक स्वेच्छा या निजी आवश्यकता से ही इसे करवाते हैं। लेकिन, यूसीसी लागू होने के बाद यह अनिवार्य हो सकता है।
हलाला और इद्दत की प्रथा पर ब्रेक: मुस्लिम महिलाओं के लिए हलाला और इद्दत जैसी प्रथाएं आज भी चल रही हैं। यूनिफॉर्म सिविल कोड के माध्यम से इसे पूरी तरह से रोका जा सकता है।
तलाक: शादी एक पुरुष और महिला के बीच होती है। लेकिन, देश में अलग-अलग धर्म के नागरिकों के लिए तलाक के नियम अलग-अलग है। यूसीसी के लागू होने के बाद इसे पूरी तरह से देश के कानून के दायरे में लाया जा सकता है।
गोद लेना: समान नागरिक संहिता के अमल में आने पर मुस्लिम महिलाओं को भी बच्चा गोद लेने का हक मिल सकता है।
निराश्रित माता-पिता को अधिकार: कई बार देखा जाता है कि पति की मौत के बाद विधवा मुआवजा लेकर दूसरी शादी कर लेती है। जबकि, मुआवजे की राशि से मृतक के निराश्रित माता-पिता को कुछ नहीं मिल पाता। समान नागरिक संहिता के माध्यम से मुआवजा लेने पर महिला को बुजुर्ग सास-ससुर के भरम-पोषण की जिम्मेदारी लेनी पड़ सकती है और अगर वह दूसरी शादी का फैसला करती है तो मुआवजा निराश्रित माता-पिता को दिया जा सकता है।
पैतृक संपत्ति में समान अधिकार: यूसीसी लागू होने के बाद मुस्लिम महिलाओं को भी पैतृक संपत्ति में बराबर का अधिकार मिल सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने हिंदू महिलाओं के लिए तो इस अधिकार को तय कर दिया है, लेकिन मुस्लिम पर्सनल लॉ की वजह से मुस्लिम महिलाओं को इससे वंचित रहना पड़ता है।












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